भारतकोश
भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 126

अध्याय १४ भक्ति की योग्यता कुछ विद्वानों का कहना है कि ज्ञान-वैराग्य भक्ति के अंग हैं; परन्तु यह सत्य नहीं है। वास्तव में भक्ति में प्रवेश के लिए उपयोगी होने पर ज्ञान-वैराग्य को प्रारम्भ में स्वीकार किया जा सकता हैं; पर अन्त में वह अवस्था भी आती है जब उन्हें त्याग दिया जाता है। भक्ति की लालसा के अतिरिक्त भक्ति का और कोई हेतु नहीं है। इसके लिए केवल सरल हृदय चाहिए। दक्ष भक्तों के मत में मनोधर्म (ज्ञान) और योगाभ्यास के कृत्रिम वैराग्य का मार्ग भवबन्धन से मुक्ति के लिए उपयुक्त हो सकता है; परन्तु ये दोनों चित्त को उत्तरोत्तर कठोर बनाने वाले हैं। इनके द्वारा भक्तिभाव का बिल्कुल भी वर्धन नहीं हो सकता। अतः भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में प्रवेश पाने के लिए ये साधन अनुकूल नहीं हैं। वस्तुतः कृष्णभावना- भक्तियोग ही भक्तियोग में प्रगति का एकमात्र मार्ग है। भक्ति अद्वय है, वही कारण है और वही कार्य है। श्रीभगवान् सबके परम कारण हैं। उन अद्वय की प्राप्ति के लिए भक्ति का अद्वय मार्ग ही अंगीकार करना होगा । भगवद्गीता में स्वयं श्रीभगवान् इसकी पुष्टि करते हैं, "केवल भक्ति से ही मेरा तत्त्व जाना जा सकता है।" गीतोपदेश के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "तू मेरा भक्त है, इसलिए तेरे से यह सम्पूर्ण रहस्य कहूँगा।" वैदिकज्ञान का अन्तिम लाभ भगवान् के तत्त्व को जानना है और उनके वैकुण्ठ धाम में प्रवेश का पथ है भक्तियोग। सभी प्रामाणिक शास्त्र इसमें एकमत हैं। मनोधर्मी लोग भक्तिपथ का तिरस्कार करके दूसरों को दार्शनिक अन्वेषण में परास्त करने में ही लगे रहते हैं, इसलिए उनके हृदय में भक्तिभाव प्रकट नहीं होता। श्रीमद्भागवत (११.२०.३१) में श्रीकृष्ण कहते हैं, "हे उद्धव ! मेरे सच्चे भक्त के लिए ज्ञान-वैराग्य प्रायः श्रेयदायक नहीं होते। मेरा भक्त

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक) · पृष्ठ 126, कुल 380 में से · BharatKosha