भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
भक्ति के अंगों का विशद विवेचन [ ६७ श्रीकृष्ण ने इस प्रकार कहा है, "जो पुरुष प्रसन्न होकर भक्तिपूर्वक मेरे सामने नाचता हुआ शरीर की भंगियों से विविध भावों को अभिव्यक्त करता है, वह करोड़ों जन्मान्तरों से संचित पापों को नष्ट कर देता है।" इसी ग्रन्थ में नारद का वचन है, "करताल और नाना भाव-भंगिमाओं के साथ श्रीकृष्ण के सामने नृत्य करने वाले के शरीर से सभी पातकरूपी पक्षी उड़ जाते हैं।" जैसे ताली बजाने से बहुत से पक्षी उड़ने लगते हैं, वैसे ही कृष्णमूर्ति के आगे नाचने और ताली बजाने मात्र से शरीर में रहने वाले सारे पातकरूप पक्षी उड़ाए जा सकते हैं। श्रीमूर्त्ति के सम्मान में दण्डवत् प्रणाम और अभ्युत्थान 'नारदीयपुराण' का वाक्य है, "श्रीकृष्ण को किया एक प्रणाम भी दस अश्वमेध यागों से बढ़कर है।" याज्ञिक को पुण्यफल मिलेगा, परन्तु अन्त में पुण्य क्षीण होने पर उसे संसार में फिर जन्म लेना पड़ेगा, जबकि एक बार भी श्रीमूर्त्ति को प्रणाम करने वाला सीधा कृष्णलोक को चला जायगा। उसका कभी पुनर्जन्म नहीं होगा। 'ब्रह्माण्डपुराण' में कहा गया है, "भगवान् की रथयात्रा को सामने आते हुए देखकर उठकर अगवानी करने वाला अपने सब पापों को नष्ट कर देता है।" श्रीमूर्त्ति का अनुगमन 'भविष्यपुराण' में आया है, "भगवान् के रथ के साथ आगे-पीछे चलने वाले चाण्डाल तक श्रीविष्णु के ऐश्वर्य को प्राप्त हो जाते हैं।" विष्णु मन्दिर अथवा तीर्थ गमन पुराणों में कहा है, "वृन्दावन, मथुरा, द्वारका आदि तीर्थों को जाने वाले धन्य हैं। वे संसाररूप मरुभूमि से पार हो जाते हैं।" 'हरिभक्तिसुधोदय' में भगवान् श्रीकृष्ण के मन्दिर को जाने का माहात्म्य कहा गया है। जैसा कह आए हैं, वृन्दावन, मथुरा तथा द्वारका में यह पद्धति है कि भक्तजन इन पावन तीर्थों में स्थिति मन्दिरों में जाकर लाभान्वित होते हैं। एक श्लोक का आशय है, "कृष्णभावनाभावित शुद्ध भक्तिभाव से हरिमन्दिर में प्रवेश करने वाला फिर मातृगर्भरूप कारागार में नहीं जाता।" यद्यपि गर्भ का वास बद्धजीव के लिए बड़ा ही भयंकर और कष्टदायक होता है, परन्तु जन्म के समय वह उसे भूल जाता है। इस बद्धदशा से सदा-सदा के लिए मुक्ति के अभिलाषी को भक्तिभावित
६८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु हृदय से विष्णुमन्दिर में जाना चाहिए। तब संसार में जन्म की दुःखमय अवस्था का सामना नहीं करना पड़ेगा । विष्णु मन्दिर की परिक्रमा ‘हरिभक्तिसुधोदय’ में कहा है, "जो विष्णुमूर्ति की परिक्रमा करता है, वह बारम्बार जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट जाता है ।" भवरोग के कारण बद्धजीव पुनः पुनः जन्म-मृत्यु में भ्रमायमान् है । विष्णुमन्दिर की प्रदक्षिणा से इस आवर्तन का निवारण हो सकता है। चातुर्मास्य में कृष्णभावना के प्रसारण के लिए स्थान-स्थान पर परिव्राजन करने वाले साधुजन एक स्थान पर (जो प्रायः तीर्थ होता है) रहते हैं। इस काल में कुछ विशेष नियमों का पालन अनिवार्य है। स्कन्द- पुराण के अनुसार इस समय विष्णुमन्दिर की चार परिक्रमा करने से चराचर सम्पूर्ण जगत् की परिक्रमा हो जाती है।" ऐसी परिक्रमा करने वाले ने उन सभी तीर्थों की यात्रा कर ली है, जहाँ गंगा प्रवाहित है तथा चातुर्मास्य के विधान का पालन करने से भक्तियोग की प्राप्ति बहुत शीघ्र हो सकती है । अर्चना मन्दिर में श्रीमूर्त्ति की आराधना को अर्चना कहते हैं। इस पद्धति के द्वारा देह से परे अपने आत्मस्वरूप का बोध हो जाता है। श्रीमद्भागवत (१०.८१.१६) में एक ब्राह्मण के यहाँ जाते हुए श्रीकृष्ण के अन्तरंग सखा सुदामा ने कहा है, "श्रीकृष्ण के चरणकमलों की अर्चना करने मात्र से स्वर्ग, मोक्ष, लोकों का आधिपत्य, पृथ्वी की सार्वभौम सम्पदा और योगसिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं।" सुदामा के इस कथन की पृष्ठभूमि इस प्रकार है। श्रीकृष्ण ने सखा सुदामा से किसी ब्रह्माण्ड के घर से अन्न की भिक्षा लाने को कहा था। ब्राह्मण एक महायज्ञ कर रहे थे, अतः श्रीकृष्ण ने सुदामा से कहलवाया कि कृष्ण-बलराम भूखे हैं, उन्हें कुछ भोजन चाहिए। जब सुदामा वहाँ गया तो ब्राह्मणों ने तो कुछ नहीं दिया, परन्तु यह सुनने पर कि श्रीकृष्ण भोजन माँगते हैं, ब्राह्मण-पत्नियां तत्काल अनेक नैवेद्य उन्हें अर्पण करने गयीं । ‘विष्णुरहस्य’ में भी उल्लेख है, "पृथ्वी पर जो मनुष्य भगवान् विष्णु की अर्चना करते हैं, वे नित्य आनन्दमय वैकुण्ठधाम को प्राप्त होते हैं।" भगवान् की परिचर्या (सेवा) 'विष्णुरहस्य' में उल्लेख है, सेवक जैसे राजा की सेवा करते हैं.
भक्ति के अंगों का विशद विवेचन [ ६६ वैसे ही जो भगवत्सेवा की व्यवस्था करता है, वह निश्चित रूप से देह त्याग कर कृष्णलोक को जाता है। "आज भी बहुत से मन्दिर वास्तव में राजप्रासाद जैसे हैं। वे साधारण भवन नहीं हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण का अर्चन उसी प्रकार होना चाहिए जैसे अपने महल में राजा सेवित होता है। वृन्दा- वन के हजारों मन्दिरों में श्रीमूर्त्ति की राजोचित परिचर्चा की व्यवस्था है। 'नारदीयपुराण' में कथन है, "जो कोई क्षणभर के लिए भी भगवान् के मन्दिर में रहे, वह भी परमपद पा जाता है।" निष्कर्षस्वरूप कहा जा सकता है कि समाज के धनाढ्य सदस्यों को सुन्दर मन्दिरों का निर्माण करके विष्णु के अर्चन की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे लोग वहाँ आकृष्ट हों और इस प्रकार उन्हें श्रीमूर्त्ति के सामने नाचने तथा भगवन्नाम के श्रवणकीर्तन का अवसर मिले । इससे सभी भगवद्धाम में प्रवेश कर सकेंगे । पूर्णतः कृष्णभावनाभावित होकर निरन्तर भगवत्सेवा के परायण भक्तों का कहना ही क्या, विष्णुमन्दिर में जाने से तो साधारण मनुष्यों को भी परम लाभ सुलभ हो जायगा । इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत के चौथे स्कन्ध (२१.३१) में महाराज पृथु अपनी प्रजा से कहते हैं, "हे प्रजाजनो ! भगवान् श्रीहरि सभी के लिए पतितपावन हैं। किसी भी देवता में यह सामर्थ्य नहीं है क्योंकि वे तो स्वयं ही बन्धन में हैं। एक बद्धजीव दूसरे बद्धजीव का त्राण कैसे कर सकता है । श्रीकृष्ण अथवा उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि में ही किसी का उद्धार करने की शक्ति है। श्रीविष्णु के पैर के अँगूठे से निकली गंगा पृथ्वी आदि लोकों में प्रवाहित होती हुई सारे पापात्मा बद्धजीवों का त्राण कर रही है। फिर निरन्तर भगवत्सेवापरायण रहने वाले के सम्बन्ध में क्या कहना है। जन्म-जन्मान्तरों के संचित पापों के होते हुए भी उनकी मुक्ति निश्चित है ।" भाव यह है कि जो श्रीमूर्त्ति की अर्चना करता है, उसके करोड़ों जन्मों से संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। अर्चनपद्धति का विवरण दिया जा चुका है; साधक को इन विधि-विधानों का गंभीरता से पालन करना चाहिए । गान 'लिंगपुराण' में भगवत्कीर्ति के गान के सम्बन्ध में कहा है, "भगवान् की कीर्ति को निरन्तर गाने वाला ब्राह्मण श्रीकृष्ण के लोक को प्राप्त हो जाता है। भगवान् श्रीकृष्ण को यह गान शिव की स्तुति से भी अधिक प्रिय है।"
७० ] भक्तिरसामृतसिन्धु संकीर्तन भगवान् के नाम, गुण, लीला, आदि का उच्च स्वर से कथन करना संकीर्तन कहलाता है । जनसमूह के भगवन्नाम के कीर्तन को भी संकीर्तन कहते हैं । ‘विष्णुधर्म’ में नामसंकीर्तन की महिमा इस प्रकार है, “हे राजन् ! यह कृष्णनाम इतना पावन है कि जिसकी जिह्वा पर आ जाता है, वह तत्काल करोड़ों जन्म के पापों से मुक्त हो जाता है ।” यह वास्तव में सत्य है । चैतन्यचरितामृत का वाक्य है, “जो एक बार भी कृष्णनाम का उच्चा- रण कर लेता है, वह उतने पापों का नाश कर देता है, जितने पाप वह कर भी नहीं सकता ।” पापी बहुत पाप करता है, परन्तु वह इतना पाप नहीं कर सकता, जिसे एक बार कृष्णनाम पुकारने से नष्ट न किया जा सके । श्रीमद्भागवत (७.६.१८) में प्रह्लाद महाराज भगवान् की स्तुति करते हैं, “हे नृसिंहदेव ! यदि मैं आपके चरणकमलों का दास बन जाऊँ तो आपकी लीलासुधा का श्रवण कर सकूँ गा । हे नाथ ! आप परम सुहृद एव परम आराध्य हैं । आपकी दिव्य लीला को सुनने मात्र से सम्पूर्ण पाप दूर हो जाते हैं । इसलिए मुझे उन पापकर्मों का भय नहीं है, क्योंकि आपके कथामृत का श्रवणपुटों से पान करता हुआ मैं शीघ्र ही भवसागर के सम्पूर्ण दुर्गुणों से तर जाऊँगा ।” श्रीभगवान् की लीलाओं से सम्बन्धित अनेक गीत हैं, जैसे ब्रह्मा की ब्रह्मसंहिता, नारद द्वारा गाया गया नारदपंचरात्र और शुकदेव गोस्वामी द्वारा गाई श्रीमद्भागवत । यदि कोई इन गीतों को सुने तो सहज ही भवबन्धन से छूट जाय । भगवान् के गीतों का श्रवण बड़ा सरल है । ये करोड़ों वर्षों से प्रचलित हैं और आज तक लोग इनसे लाभ उठा रहे हैं । अतः अब क्यों न इनका पूरा लाभ उठाकर संसार-जंजाल से मुक्त हो जाय ? गुणकीर्तन श्रीमद्भागवत (१.५.२२) में नारद मुनि अपने शिष्य व्यासदेव से कहते हैं, “हे व्यासजी ! तप-त्याग, वेदाध्ययन, यज्ञानुष्ठान वैदिकमन्त्र- उच्चारण, ज्ञान और दान आदि पुण्यकर्मों का एकमात्र परम फल यही है कि भक्तों के संग में भगवान् की कीर्ति का गान किया जाय ।” यहाँ संकेत है कि भगवान् का गुणकीर्तन जीव की आत्यन्तिकी क्रिया है ।
भक्ति अंगों का विशद विवेचन [ ७१ जप मन्त्र का धीरे-धीरे मन्द स्वर से उच्चारण करना जप कहलाता है। उसी मन्त्र की उच्च ध्वनि करना कीर्तन है। जब महामन्त्र ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे’ का उच्चारण केवल अपने सुनने के लिए धीरे से किया जाय तो वह जप है और दूसरे उसे सुन सकें तो वह कीर्तन है। महामन्त्र का जप-कीर्तन दोनों किए जा सकते हैं। जप से केवल अपने को लाभ होता है; परन्तु कीर्तन को सुनने वाले अन्य सब का कल्याण हो जाता है। ‘पद्मपुराण’ का वाक्य है—“कृष्णनाम का जप-कीर्तन करने वाले के लिए स्वर्गसुख और मोक्ष का मार्ग तत्काल प्रशस्त हो जाता है।” विज्ञप्ति (निवेदन) ‘स्कन्दपुराण’ में भगवच्चरणकमलों में विज्ञप्ति के सम्बन्ध में एक वाक्य है, जिसमें उल्लेख है कि धीर भक्त श्रीकृष्ण के प्रति तीन प्रकार से विज्ञप्ति निवेदन कर सकते हैं : १. संप्रार्थनात्मिका (बड़ी भावमय प्रार्थना); २. दैन्यबोधिका (दीनताज्ञापन) तथा ३. लालसामयी (संसिद्धि की अभिलाषा)। परमार्थ में संसिद्धि की ऐसी अभिलाषा करना इन्द्रिय- तृप्ति जैसा नहीं है। जब जीव को श्रीभगवान् से अपने स्वरूपभूत सम्बन्ध का थोड़ा-बहुत बोध होता है तो वह अपने मूल यथार्थ स्वरूप को जान जाता है और श्रीकृष्ण के दास, सखा, माता-पिता अथवा प्रेयसी के रूप में स्थिति को फिर प्राप्त हो जाना चाहता है। इसी का नाम लालसामयी है। विज्ञप्ति की यह लालसामयी अवस्था पूर्ण मुक्ति अर्थात् स्वरूपसिद्धि होने पर प्राप्त होती है—जब पूर्ण आत्मविद्या और तत्त्वज्ञान के द्वारा जीव भगवान् से अपने आदिसम्बन्ध को जान जाता है। पद्मपुराण में भक्त की संप्रार्थनात्मिका विज्ञप्ति है, “हे नाथ ! आपके चरणकमलों में निवेदन है कि युवतियों का मन युवकों में और युवकों का मन युवतियों में जिस प्रकार रमा करता है, उसी भाँति मेरा मन भी सहज रूप में आपमें रमण करे।” दृष्टान्त समीचीन है। युवकयुवतियों में एक दूसरे को देखने पर परिचय के बिना सहज आकर्षण हो जाता है। यह सीखना नहीं पड़ता, कामविकार के कारण अपनेआप स्फुरित हो जाता है। यह एक लौकिक उदाहरण है। भक्त का उद्गार है कि उसका भगवान् में ऐसा ही राग हो जाय, जो सर्वथा हेतुरहित और अनन्य हो। भगवान् के लिए इस प्रकार की रागानुगा आसक्ति स्वरूप-साक्षात्कार की परम संसिद्धि है।
७२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु पद्मपुराण में दैन्यबोधिका विज्ञप्ति का भी विवरण है, "मेरे समान न तो कोई पापी है और न कोई अपराधी ही है। क्या कहूँ, आपके सामने आत्मनिवेदन करने के लिए आने में भी लज्जा आती है।" यह भक्त की स्वाभाविक स्थिति है। यह कोई आश्चर्य नहीं कि बद्धजीव का कुछ संचित पाप हो। उसे भगवान् से अपनी दीनता ज्ञापित करनी चाहिए। ऐसा करते ही भगवान् सच्चे भक्त को क्षमा कर देते हैं। परन्तु इस का अर्थ यह नहीं कि भगवान् की अहैतुकी करुणा की आड़ में पाप करता जाय और यह आशा करे कि प्रभु क्षमा कर देंगे। ऐसा विचार निर्लज्ज व्यक्तियों के ही योग्य है। यहाँ स्पष्ट कहा है, "आपसे अपने पापों का निवेदन करने में भी मुझे लज्जा आती है।" अतः यदि किसी को पाप करने में लज्जा नहीं आती, अपितु वह समझता है कि भगवान् उसे क्षमा कर देंगे तो ऐसी युक्ति सर्वथा अनर्थ है। वैदिक शास्त्रों में कहीं भी इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। यह सत्य है कि कृष्णनाम के जप से पूर्वजन्मों के सब पापों का धावन हो जाता है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि बार-बार पाप करे और फिर आशा करे कि वे दूर हो जायेंगे। भक्तिपथ में यह अनर्थकारी धारणा ग्राह्य नहीं है। "पूरे सप्ताह पाप करूँगा और अन्त में मन्दिर जाकर उन्हें धो डालूँगा, जिससे फिर पाप कर सकूँ" - इस विचार को भक्तिरसामृतसिन्धुकार ने अस्वीकार किया है, क्योंकि यह परम अनर्थमय अपराध है। 'नारदपंचरात्र' में लालसामयी विज्ञप्ति का विवरण है। भक्त कहता है, "हे नाथ ! लक्ष्मी के साथ विराजमान आप चमर डुलाने में लगे हुए मुझ को अपनी गम्भीर वाणी से 'ऐसा करो' यह आदेश कब देंगे ?" श्लोक का भाव यह है कि भक्त श्रीभगवान् के श्रीविग्रह को चमर से हवा करना चाहता है, अर्थात् प्रभु का निजी पार्षद बनने का अभिलाषी है। निःसन्देह दास, सखा अथवा प्रेमी के रूप में प्रत्येक भक्त सदा श्रीभगवान् के सान्निध्य में रहता है। निजी रुचि के अनुसार वह किसी एक प्रकार के रस-सम्बन्ध की अभिलाषा रखता है। यहाँ यह भक्त भगवान् का दास बनकर उनकी अन्तरंगा शक्ति लक्ष्मीजी के समान उन्हें चमर डुलाना चाहता है। उसकी यह भी अभिलाषा है कि श्रीभगवान् प्रसन्न होकर 'चमर ऐसे डुलाओ' इस प्रकार उसे आदेश दें। यह लालसामयी विज्ञप्ति स्वरूप-साक्षात्कार की परम अवधि है। 'नारदपंचरात्र' में ही भक्त की एक अन्य विज्ञप्ति है - "हे नाथ ! हे कमलनयन ! अहो ! वह दिन कब आयगा जब आपके नामों का कीर्तन
भक्ति के अंगों का विशद विवेचन [ ७३ करता हुआ आनन्दाश्रुओं से रुद्ध नेत्रों वाला मैं भावोन्मत्त होकर यमुना तट पर नाचूँगा ?” वह भी लालसामयी का उदाहरण है। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु का उद्गार है-“हे प्राणनाथ ! आपके विरह में मुझे क्षण भर युग जैसा भारी लगता है और सारा जगत् शून्य हुआ प्रतीत होता है।” भक्त को इस प्रकार भावमय प्रार्थना करते हुए अपनी सेवा का अर्पण करने के लिए उत्कण्ठित रहना चाहिए; सभी महाभागवतों का, विशेषतः श्रीचैतन्य महाप्रभु का यह उपदेश है। भाव यह है कि श्रीभगवान् के लिए रोने की कला सीखनी चाहिए; किसी न किसी प्रकार की भगवत्सेवा में लगने के लिए वास्तव में उत्कण्ठा- पूर्वक रोये । इस भाव का नाम ‘लौल्य’ है और ऐसा अश्रुविमोचन ही परम संसिद्धि (स्वरूपसिद्धि) का मूल्य है। यदि किसी में भगवत्-सांनिध्य और भगवत्सेवा या लौल्य उदित हो जाय तो उसका वैकुण्ठ प्रवेश निश्चित है। नहीं तो, लौकिक दृष्टि से तो वैकुण्ठ-प्रवेश के शुल्क की गणना ही नहीं हो सकती । इसका एकमात्र मूल्य है लौल्य और लालसामयी । स्तवपाठ मनीषियों के मत में भगवद्गीता अनेक प्रामाणिक स्तवों से परिपूर्ण है, विशेषतः ग्यारहवाँ अध्याय, क्योंकि उसमें अर्जुन ने भगवान् के विश्वरूप का स्तव किया है। इसी प्रकार ‘गौतमीयतन्त्र’ के सभी श्लोक स्तव हैं। श्रीमद्भागवत में तो श्रीभगवान् के शत-शत स्तव हैं ही। भक्त को अपने नित्यपाठ के हेतु इनमें से श्लोकों का चयन करना चाहिए। ‘स्कन्दपुराण’ में कहा है-“जिनकी जिह्वा निरन्तर श्रीकृष्ण के स्तवरत्नों से विभूषित रहती है, वे मुनियों और ऋषियों के लिए नमस्कार के योग्य और देवों के भी आराध्य हैं।” अल्पज्ञ लोग श्रीकृष्ण को भजने के स्थान पर भोगों की इच्छा से नाना देवताओं को पूजना चाहते हैं। परन्तु यह उल्लेख है कि निरन्तर श्रीभगवान् का स्तवन करने वाला भक्त स्वयं देवताओं का भी वन्दनीय है। शुद्धभक्तों को किसी भी देवता से कुछ नहीं चाहिए; वरन् सब के सब देवता ही शुद्धभक्तों की आराधना के उत्कण्ठित रहते हैं। ‘नृसिंहपुराण’ में कहा है, “भगवान् श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने स्तोत्र और स्तवपाठ करने वाला तत्काल सब पापों से छूट कर वैकुण्ठगमन के योग्य हो जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है।”
७४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु नैवेद्य-आस्वादन पद्मपुराण में स्पष्ट वचन है—"श्रीमूर्ति के सामने से हटकर जो पुरुष तुलसी और चरणामृत से युक्त नैवेद्य का अन्न नित्य नियमित रूप से खाता है, वह अविलम्ब करोड़ों यज्ञों के पुण्य को प्राप्त करता है।" चरणामृत-पान चरणामृत की प्राप्ति प्रातःकाल वस्त्र-अलंकरण से पूर्व भगवान् की मूर्ति को स्नान कराने पर होती है। सुगन्धी और पुष्पों से युक्त जल श्रीचरणों से नीचे गिरता है। उसे एकत्रित कर दही के साथ मिलाया जाता है। इस प्रकार यह चरणामृत अतिशय आस्वाद्य तो होता ही है, इसका प्रबल पारमार्थिक माहात्म्य भी है। पद्मपुराण के अनुसार, जिस मनुष्य ने कभी दान, यज्ञ, स्वाध्याय, अर्चन, आदि कुछ भी पुण्य न किया हो, वह भी मन्दिर के चरणामृत का पान करके परमधाम के योग्य हो जाता है। मन्दिरों में चरणामृत को बड़े से पात्र में रखने की प्रथा है। श्रीमूर्त्ति का दर्शन-अभिवादन करने आया भक्त विनम्रभाव से इस चरणामृत के तीन विन्दु का पान करके परमानन्द सुख पाता है। अर्पित धूप और पुष्पों की सौरभ का आघ्राण 'हरिभक्तिसुधोदय' में उल्लेख है—"श्रीहरि को अर्पित धूप को सूंघने से संसाररूपी सर्प से डसे हुओं का विष समाप्त हो जाता है।" कुशल पुरुषों द्वारा वनों में पायी जाने वाली एक प्रकार की जड़ी सुंघाये जाने पर सर्प का विष उतर जाता है और चेतना लौट आती है। इसी भाँति जो मन्दिर में मूर्ति को अर्पित धूप सूंघता है, उसका सम्पूर्ण भवरोग तत्काल दूर हो जाता है। मन्दिर में जाने पर भक्त को फल, फूल, धूप आदि किसी न किसी पदार्थ का भगवान् को अवश्य अर्पण करना चाहिए। यदि धन की सामर्थ्य न हो तो कुछ और चढ़ाये। प्रायः प्रातः काल मन्दिर जाने वाले नर-नारी बहुत-सी भेंट ले जाते हैं। अधिक नहीं, एक अन्नकण का भी अर्पण किया जा सकता है। यह विधि है कि सन्त अथवा मन्दिर में मूर्ति के दर्शनों के लिए किसी भेंट के बिना नहीं जाना चाहिए। अर्पण अति तुच्छ हो चाहे अमूल्य हो। फल, फूल, जल आदि जो कुछ भी थोड़ा सा मिल सके, अवश्य अर्पण करना चाहिए। जब कोई भक्त प्रातः मन्दिर में भेंट चढ़ाने जायगा, तो वह धूप का आघ्राण भी करेगा और परिणाम में भवरोग के विष से मुक्ति पा जायगा।
भक्ति के अंगों का विशद विवेचन [ ७५ तन्त्रशास्त्र में उल्लेख है, “हरि के निर्माल्य की सौरभ के नासिका में प्रवेश करते ही पाप के बन्धन नष्ट हो जाते हैं । जो पापात्मा नहीं है, वह भी सौरभ-आंघ्राण करके मायावादी से भक्त हो जाता है ।” इसके अनेक उदाहरण हैं, जिनमें सनकादि के उत्थान की कथा मुख्य है। वे मायावादी थे, परन्तु मन्दिर में पुष्पों और धूप की सौष्ठव के आघ्राण से परम भक्त बन गए । उपरोक्त वाक्यों से ज्ञात होता है कि मायावादी शुद्ध नहीं होते, वरन् दूषित रहते हैं । श्रीमद्भागवत में प्रमाण है, “जिसने सम्पूर्ण पापों का मार्जन नहीं किया है, वह शुद्ध भक्त नहीं हो सकता । शुद्धभक्त को श्रीभगवान् के परमेश्वरत्व में कोई सन्देह नहीं रहता, इसलिए वह निरन्तर कृष्णभावना और भक्तियोग के परायण रहता है ।” ‘अगस्त्यसंहिता’ में सदृश वाक्य है—“अपनी घ्राणेन्द्रिय की विशुद्धि के लिए हमें मन्दिर में श्रीकृष्ण को अर्पित पुष्पों को सूंघना चाहिए ।” श्रीमूर्ति का स्पर्श विष्णुधर्मोत्तर में श्रीमूर्ति के चरणकमलों का स्पर्श करने के सम्बन्ध में कथन है—“जो पुरुष वैष्णवदीक्षा से युक्त है तथा कृष्णभावनाभावित भक्तियोग के परायण है, वही श्रीमूर्ति का स्पर्श करने का अधिकारी है ।” गांधी द्वारा चलाए गए राजनीतिक आन्दोलन के काल में उस वैदिक पद्धति का विरोध किया गया था, जिसके अनुसार शूद्र, चाण्डाल आदि अधम श्रेणी के लोगों का मन्दिर-प्रवेश निषिद्ध है। यह निषेध उनके अशुद्ध आचरण के कारण है । परन्तु साथ में उन्हें अन्य सुविधायें प्राप्त हैं जिनसे वे शुद्धभक्तों के संग में भक्तियोग के चरम संसिद्धि को प्राप्त कर सकते हैं। किसी भी जाति में जन्मे मनुष्य का बहिष्कार नहीं है, पर सब के लिए पवित्र होना आवश्यक है । उस शुद्धि-पद्धति को अंगीकार करना होगा । परन्तु गांधी केवल ‘हरिजन’ नाम की मोहर लगाकर उन्हें शुद्ध सिद्ध करना चाहते थे, अतः मन्दिर के व्यवस्थापकों और गांधी में गम्भीर संघर्ष चला । जो कुछ हो, वर्तमान नियम सब शास्त्रों का विधान है—कोई भी शुद्ध व्यक्ति मन्दिर में प्रवेश कर सकता है । वास्तविक स्थिति यही होनी चाहिए । जो विधिपूर्वक दीक्षित है और विधि-विधान का पालन करता है, वही प्रवेश और श्रीमूर्ति का स्पर्श कर सकता है, सब नहीं । विधि के साथ मूर्ति-स्पर्श करने वाला तत्काल पापपुंज से छूट जाता है और उसकी सर्वाभीष्ट सिद्धि भी हो जाती है ।
७६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु 'वराहपुराण' में श्रीकृष्णमूर्ति के स्पर्श की महिमा है। कोई भक्त कहता है, “हे वसुन्धरे ! वृन्दावन में जो श्रीगोविन्ददेव का दर्शन कर लेता है, वह यमपाश में नहीं पड़ता, वरन् देवगति को जाता है।” भाव यह है कि यदि कोई साधारण व्यक्ति भी कुतूहलवश वृन्दावन जाकर दैववश गोविन्दजी का दर्शन कर ले तो उसके लिए वैकुण्ठ नहीं तो कम से कम उच्च लोकों की प्राप्ति तो निश्चित है। अतः वृन्दावन में गोविन्द मूर्ति के दर्शन मात्र से महान् पुण्य होता है। आरति दर्शन 'स्कन्दपुराण' में मूर्ति की आरति दर्शन का यह माहात्म्य है— “आरति के समय भगवान् के मुखारविन्द का दर्शन करने वाले के करोड़ों वर्षों से संचित पापपुंज भस्म हो जाते हैं। उसके ब्रह्महत्या जैसे जघन्य पाप भी नहीं ठहर पाते।” उत्सवों का आयोजन जैसा पूर्वकथन है, श्रीकृष्णजन्माष्टमी, रामनवमी, प्रमुख वैष्णवों की जन्मतिथि, झूलनयात्रा, दोलयात्रा आदि महोत्सवों को अवश्य मनाना चाहिए। उत्सव में भगवान् को रथ पर विराजमान किया जाता है और फिर नगर के विभिन्न मार्गों पर उनकी शोभायात्रा निकाली जाती है, जिससे लोगों को मन्दिर में दर्शन का लाभ सुलभ हो जाय। 'भविष्यपुराण' कहता है—“जो चाण्डाल आदि कौतुक में भी रथ पर विराजमान श्रीभगवान् को देख लेते हैं, वे विष्णु-पार्षद बन जाते हैं।” 'अग्निपुराण' का वाक्य है, “जो मन्दिर में श्रीमूर्र्ति की पूजा को देखकर प्रसन्न होता है, वह पंचरात्र में वर्णित क्रियायोग के फल को प्राप्त करता है।” क्रियायोग प्रायः भक्तियोग जैसी अभ्यास की पद्धति है। परन्तु वह विशेष रूप से ध्यानयोगियों के लिए विहित है। भाव यह है कि इस क्रमिक पद्धति से ध्यानयोगी अन्त में भगवद्भक्ति के स्तर पर आरूढ़ हो जाते हैं।
अध्याय १० श्रवण-स्मरण की कला श्रवण कृष्णभावना और भक्तियोग का आरम्भ श्रवण से होता है। सभी मनुष्यों को यह अवसर दिया जाना चाहिए कि वे भक्तिगोष्ठी में आकर श्रवण करें। कृष्णभावना के पथ पर उन्नति के लिए यह परम अनिवार्य है। जब कोई शब्दब्रह्म को सुनने में कर्णविवरों का योग करता है तो वह शीघ्र ही हृदय से शुद्ध और परिष्कृत हो जाता है। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने श्रवण के माहात्म्य पर बड़ा बल दिया है। यह बद्धजीव के हृदय को पवित्र कर देता है, जिससे वह द्रुतगति से भक्तियोग में लगने और कृष्णभावना को समझने का अधिकारी बन जाता है। 'गरुडपुराण' श्रवण की महिमा का अतिशय सुन्दर दिग्दर्शन है, "प्राकृत जगत् में बद्धजीव की अवस्था सर्प से कटे अचेतन मनुष्य जैसी है, क्योंकि इन दोनों को ही मन्त्रध्वनि से फिर चेतन किया जा सकता है।" सर्प द्वारा दष्ट मनुष्य तुरन्त नहीं मरता, वरन् पहले अचेतन होकर कुछ समय उसी अवस्था में पड़ा रहता है। प्राकृत-जगत् में जीव निद्रा- मग्न है, क्योंकि वह अपने यथार्थ स्वरूप और कर्तव्य को तथा श्रीभगवान् से अपने सम्बन्ध को नहीं जानता। अतः विषयी जीवन का अर्थ है कि माया- रूपी सर्प का काटना और इस प्रकार कृष्णभावना के अभाव में जीव का मृतप्राय हो जाना। सर्प से कटे हुए मुमूर्षु को मन्त्रोच्चारण से फिर जीवन- दान किया जा सकता है। इस मन्त्रविद्या के अनेक विशारद हैं। इसी प्रकार महामन्त्र हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे को सुनाकर मृयमाण अचेतन पुरुष को वापस कृष्णभावना की अवस्था में लाया जा सकता है। श्रीमद्भागवत (४.२६.४०) में भगवच्चरित-श्रवण की महिमा के सम्बन्ध में शुकदेव गोस्वामी महाराज परिक्षित से कहते हैं, "हे राजन ! वही स्थान निवास के योग्य है जहाँ महान् आचार्य भगवान् के दिव्य चरित
७८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु की वार्ता करते हैं। वहाँ रहकर उन महापुरुषों के मुखचन्द्र से निस्यन्दित कृष्णलीलारससुधा की धाराओं का कर्णपुटों से अहर्निश पान करता रहे । जो अतृप्त होकर निरन्तर इस अमृत का पान करते हैं, उनको भूख-प्यास, भय-शोक और भव-मोह स्पर्श नहीं कर पाते ।" भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने भी श्रवण को वर्तमान कलियुग में स्वरूप-साक्षात्कार का साधन बतलाया है। इस काल में पूर्व युगों के विधि- विधानों और वेद-स्वाध्याय का ठीक-ठीक अनुष्ठान सम्भव नहीं रहा है। फिर भी यदि कोई महाभागवतों और आचार्यचरणों द्वारा उच्चरित शब्द- ब्रह्म का श्रवण करे तो केवल इतने से भवरोग शान्त हो जायगा। अतएव भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु की आज्ञा है कि उन्हीं अधिकारी पुरुषों से श्रवण करे, जो भगवद्भक्त हों। व्यवसायी कथा वाचकों से सुनने का कोई लाभ नहीं। आत्मज्ञानी पुरुषों से सुनने पर चन्द्रमा से निस्यन्दित सुधाधारा जैसी अमृत की कल्लोलिनी नदियां हमारे कर्णरन्ध्रों में प्रविष्ट होंगी। उपरोक्त श्लोक चन्द्रमा के इस अलंकार से युक्त है। जैसा भगवद्गीता में कहा गया है, "कृष्णभावनाभावित हो जाने पर ही विषयी अपनी विषयवासना को लात मार सकता है।" जब तक वह किसी उत्तम कार्य में नहीं लग जाता, तब तक जीव अपने तुच्छ कार्य से विरत नहीं हो सकता। प्राकृत-जगत् में जीव प्रकृति की मायिक क्रियाओं में फँसा पड़ा है, परन्तु श्रीकृष्ण की दिव्य क्रियाओं के आस्वादन का अवसर मिलने पर वह दूसरे सब अल्प सुखों को भूल जाता है। जब श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र के युद्धप्रांगण में बोलते हैं तो विषयी इसे केवल दो मित्रों का साधारण वार्तालाप समझता है, जबकि वास्तव में तो श्रीकृष्ण के मुखचन्द्र से अमृत की कल्लोलिनी सी झरती है। अर्जुन ने इस दिव्यनाद का श्रवण किया और परिणाम में भवरोग के सम्पूर्ण मोह से मुक्त हो गया । श्रीमद्भागवत (१२.३.१५) में उल्लेख है, "उत्तमश्लोक भगवान् श्रीकृष्ण की शुद्धभक्ति के अभिलाषी को नित्य-निरन्तर उनके दिव्य गुणों और चरित का श्रवण करना चाहिए, जिससे हृदय के सारे अमंगल का नाश होता है।" भगवत्कृपा की बाट देखना श्रीमद्भागवत (१०.१४.८) में ही कहा है—"हे नाथ ! जो निरन्तर आपकी अहैतुकी कृपा की प्रतीक्षा में अपने पूर्वकृत पापों को भोगता हुआ
श्रवण-स्मरण की कला [ ७६ हृदय से, वाणी से और शरीर से निरन्तर आपको प्रणाम करता रहता है, वह मुक्ति का अधिकारी हो जाता है।" श्रीमद्भागवत का यह वाक्य सब भक्तों का मार्गदर्शक है। भक्त को अपने पूर्वपापों के दुःख से तुरन्त मुक्त होने की आशा नहीं करनी चाहिए। कोई भी बद्धजीव इस कर्मभोग से मुक्त नहीं है, क्योंकि पूर्वकर्मों से निरन्तर सुख-दुःख की प्राप्ति का नाम ही संसार है। यदि कोई प्राकृत क्रियाओं से विरत हो गया है तो उसका फिर जन्म नहीं होगा। यह तभी सम्भव है कि जब वह कृष्णभावनाभावित कर्म के परायण हो जाय, क्योंकि ऐसे कर्मों का फल नहीं होता। अतः कृष्णभावनाभावित क्रियाओं में सिद्ध होते ही जन्म-मृत्यु का चक्र समाप्त हो जाता है। ऐसा पुरुष फिर प्राकृत- जगत् में जन्म नहीं लेगा। इसलिए जो भक्त कर्मफल से पूर्णतः मुक्त नहीं हुआ है, वह गम्भीरता से कृष्णभावनाभावित कर्म करता रहे, मार्ग में कितने ही व्यवधान क्यों न आयें। किसी बाधा की स्थिति में वह केवल श्रीकृष्ण का चिन्तन-स्मरण करता हुआ उनकी कृपा की बाट देखता रहे। यही उसका अवलम्बन है। यदि भक्त इस भाव से दिन बिताता है तो उसका वैकुण्ठगमन निश्चित समझना चाहिए। इन क्रियाओं के द्वारा वह भगवद्धाम में प्रविष्ट होने का दायभाक् अधिकार पा जाता है। दायभाक् पैतृक सम्पत्ति में पुत्र के कानूनी अधिकार को कहते हैं। इसी प्रकार शुद्धभक्त, जो अपने कृष्णभावना सम्बन्धी कर्तव्य के निर्वाह में सब प्रकार के कष्ट सहने को सन्नद्ध रहता है, भगवद्धाम का योग्य अधिकारी हो जाता है। स्मृति जिस किसी प्रकार से यदि कोई चित्त में श्रीकृष्ण से अपने नित्य सम्बन्ध को बसा लेता है तो इस का नाम स्मृति है। स्मृति के विषय में विष्णुपुराण का एक सुन्दर वाक्य है, "जिन भगवान् के स्मरणमात्र से सम्पूर्ण जीव समग्र कल्याण के भाजन बन जाते हैं, मैं उन्हीं अजन्मा और नित्य परम पुरुष की शरण हूँ।" पद्मपुराण में इसी स्मृति की विवेचना है—"मृत्युकाल में अथवा जीवनकाल में जिनके नाम का स्मरण करने से मनुष्यों के पापपुंज तत्काल भस्म हो जाते हैं, उन चित्स्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण को नमस्कार है।" ध्यान मन से भगवान् के रूप, चिद्गुण, क्रीड़ा, सेवा, आदि का चिन्तन
८० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
करना ध्यान कहलाता है। ध्यान का किसी निर्विशेष अथवा शून्य से कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार ध्यान सदा विष्णुरूप का ही किया जाता है। 'नृसिंहपुराण' में भगवान् के रूप के ध्यान का वर्णन है—"भगवान् के चरणकमलों का ध्यान दिव्य और प्राकृत सुख-दुःख की अनुभूति से सर्वथा परे है। इस ध्यान से परम पापात्मा भी जीवनभर के पापों से छूट सकते हैं।" 'विष्णुधर्म' में भगवद्गुणों के ध्यान के सम्बन्ध में कहा है—"निरन्तर कृष्णभावनाभावित रहकर भगवान् के दिव्य गुणों का स्मरण करने वाले जन सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर वैकुण्ठ-गमन के योग्य बन जाते हैं।" भाव यह है कि शुद्ध हुए बिना कोई भगवद्धाम में प्रवेश नहीं पा सकता और भगवान् के चिद्गुण, रूप, लीला, आदि का स्मरण रखने मात्र से सब प्रकार के पापों से बचा जा सकता है। 'पद्मपुराण' में क्रीड़ाध्यान का उल्लेख है—"सर्वमाधुर्य सार, परम अद्भुत और ललित हरिचरित्रका जो निरन्तर ध्यान करता है, वह भव- बन्धन से छूट जाता है।" सेवाध्यान कतिपय शास्त्रों में प्रमाण हैं कि जो मनुष्य केवल सेवाध्यान भी करता है, उसकी भी सर्वाभीष्ट सिद्धि होती है और वह अपने नेत्रों से भगवान् का साक्षात्कार करता है। इस सन्दर्भ में ब्रह्मवैवर्त पुराण के अन्तर्गत एक सुन्दर कथा है। दक्षिण भारत के प्रतिष्ठानपुर में एक ब्राह्मण रहता था। वह सम्पन्न तो नहीं था परन्तु यह सोचकर सदा आत्मतृप्त रहता था कि पूर्वजन्म के पाप और श्रीकृष्ण की इच्छा के कारण ही उसे पर्याप्त धन- वैभव नहीं मिला। अतः उसे अपनी दरिद्रता की लेशमात्र भी ग्लानि नहीं थी; वह बड़ी शान्ति से रहता था। वह परम उदार था और कभी-कभी महान् आत्मज्ञानियों के प्रवचन सुनने जाता। ऐसी ही एक सभा में, जहाँ वह बड़ी श्रद्धा से वैष्णव आचार का श्रवण कर रहा था, उसने सुना कि ये क्रियायें मानससेवा के रूप में भी की जा सकती हैं। तात्पर्य यह है कि यदि कोई प्रकट रूप में वैष्णव क्रियाओं को न कर सके तो वह सेवा का ध्यान ही करे। ऐसा करने से वही फल प्राप्त होगा । ब्राह्मण अकिंचिन था, इसलिए उसने निश्चय किया कि वह बड़े भारी ऐश्वर्य के साथ भगवान् की सेवा करने का ध्यान ही करेगा। वह इस प्रकार करने लगा। कभी वह
श्रवण-स्मरण की कला [ ८१
गोदावरी में स्नान करता । स्नान के बाद एकान्त नदी तट पर आसन लगाकर प्राणायाम के अभ्यास से मन को एकाग्र करता । प्राणायाम का यह अभ्यास चित्त को यन्त्र के समान किसी एक वस्तु पर केन्द्रित करने के लिए है। प्राणायाम और आसनों का यही लाभ है। पूर्वकाल में साधारण मनुष्य भी भगवान् के स्मरण में मन को एकाग्र करना जानते थे; ब्राह्मण ने भी ऐसा अभ्यास किया । मन में भगवान् का रूप बस जाने पर वह ध्यान में भगवान् को बहुमूल्य वस्त्रों, अलंकारों, मुकुटों आदि से विभूषित करने लगा । फिर उसने भगवान् को दण्डवत् प्रणाम किया । इसके बाद मन्दिर-मार्जन का ध्यान करने लगा । मन्दिर-मार्जन करके वह बहुत से स्वर्ण और चाँदी के पात्रों में नदी का पवित्र जल लाने गया । गोदावरी से ही नहीं, अपितु गंगा, यमुना, नर्मदा और कावेरी से भी जल लाया । वैष्णवजन सामान्यतः भगवत्-अर्चन करते हुए मन्त्रों के द्वारा इन नदियों के जल का आह्वान करते हैं। मन्त्रोच्चारण के स्थान पर इस ब्राह्मण ने ध्यान किया है कि वह स्वयं स्वर्णपात्रों में भर-भर कर सब नदियों का जल ला रहा है । तत्पश्चात् उसने फल, फूल, धूप आदि अर्चन के सब पदार्थ जुटाए और उन्हें श्रीमूर्त्ति के सामने रखा । श्रीमूर्त्ति की प्रसन्नता के लिए जल, पुष्प, धूप आदि इन सब पदार्थों का सुन्दर रीति से अर्पण किया । फिर आरति की । इस प्रकार पूर्ण विधि से अर्चना सम्पन्न हुई । वह नित्य नियमित रूप से इसी प्रकार अर्चन करता था और यह क्रम वर्षों तक चलता रहा । फिर एक दिन ब्राह्मण ध्यान कर रहा था कि उसने श्रीमूर्त्ति के लिए कुछ खीर बनायी है; परन्तु वह इस भोग से प्रसन्न नहीं हुआ क्योंकि खीर बहुत गरम थी । इसलिए वह हाथ से छू कर देखना चाहता कि खीर भगवान् के खाने योग्य है या नहीं । जैसे ही उसने अपनी अंगुलो से खीर पात्र को स्पर्श किया कि वह जल गयी और उसका ध्यान भंग हो गया । अब वह क्या देखता है कि उसकी अंगुली वास्तव में जल गयी है। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ । वह तो खीर को स्पर्श करने का केवल ध्यान ही कर रहा था, उसे यह आशा नहीं थी कि उसकी अंगुली सचमुच जल जायगी । जब वह इस प्रकार विचारमग्न था, तभी लक्ष्मीसहित वैकुण्ठ में विराजमान भगवान् नारायण हँस पड़े । उनकी हँसी को देखकर उनकी परिचर्या में तत्पर सभी लक्ष्मी देवियाँ उत्कण्ठावश इसका कारण पूछने लगीं। श्रीभगवान् ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया, वरन् तत्काल ब्राह्मण को बुला भेजा । वैकुण्ठ का एक विमान ब्राह्मण को लेकर तत्क्षण भगवान्
८२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु नारायण के सान्निध्य में पहुँच गया। तब भगवान् ने सारा वृत्तान्त कह सुनाया। इस प्रकार बड़भागी ब्राह्मण को भगवान् और लक्ष्मीगण के सांनिध्य में नित्य वैकुण्ठवास प्राप्त हुआ। इस कथा से प्रकट होता है कि अपने धाम में विराजमान होने पर भी श्रीभगवान् सर्वव्यापी हैं। वैकुण्ठ में ही नहीं, अर्चन का ध्यान करते हुए ब्राह्मण के हृदय में भी वे बैठे थे । अतएव हम जान सकते हैं कि भगवान् भक्तों द्वारा ध्यान में अर्पित पदार्थों को भी ग्रहण करते हैं और इससे भक्त की अभीष्टसिद्धि हो जाती है।
अध्याय ११ भगवत्सेवा के नाना रूप दास्यभाव कर्मियों के मत में कर्मफल का अर्पण दास्य है; परन्तु रूप गोस्वामी आदि वैष्णव आचार्यों के अनुसार किसी-न-किसी रूप में भगवत्सेवा में निरन्तर संलग्न रहना दास्य का स्वरूप है। 'स्कन्दपुराण' में कहा है कि कर्मकाण्ड और वर्णाश्रम का आचरण करने वाले भक्त हैं। परन्तु जो यथार्थ में प्रत्यक्ष रूप से भगवत्सेवा में लगे रहते हैं, वे भागवत, अर्थात् शुद्धभक्त हैं। सकाम कर्मी अथवा वर्णाश्रमधर्म का पालन करने वाले शुद्धभक्त नहीं हो सकते । फिर भी, भगवान् को कर्मफल का अर्पण करते हैं, इस कारण उन्हें भी भक्त मान लिया है। जब अन्य कोई अभिलाषा नहीं रहती और वह भगवत्प्रेम से भरकर स्वाभाविक रागानुगा भगवत्सेवा करता है, तब उसे शुद्धभक्त समझना चाहिए। प्राकृत-जगत् के संसर्ग में आए सभी बद्धजीव न्यूनाधिक रूप में माया पर प्रभुत्व करना चाहते हैं। वर्णाश्रम पद्धति और तत्सम्बन्धी कर्तव्य इस विधि से निर्धारित हैं कि बद्धजीव स्वेच्छानुसार प्राकृत-जगत् को भोग सके, पर साथ ही शनैः-शनैः पारमार्थिक ज्ञान को भी प्राप्त हो जाय। वर्णाश्रमधर्म के अन्तर्गत ऐसे अनेक कर्तव्य हैं, जो कृष्णभावनाभावित भक्तियोग के अंग हैं। गृहस्थ भक्त वैदिककर्म और भक्ति के कर्तव्य, दोनों का आचरण करते हैं क्योंकि ये दोनों ही श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए हैं। गृहस्थ भक्त किसी वैदिककर्म का अनुष्ठान श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए ही करते हैं। पूर्व- वर्णन किया जा चुका है कि जिस भी क्रिया का लक्ष्य श्रीकृष्ण की तृप्ति करना हो, वह भक्ति है। श्रीरूप गोस्वामी भक्ति करने के योग्य पुरुष का वर्णन करते हैं। जिनमें थोड़ा कुछ भगवत्प्रेम का उदय हो गया है, वे कनिष्ठ अधिकारी अपनी भक्ति के विकास के अनुसार इन्द्रियतृप्ति से अरुचि अनुभव करते हैं। यदि इन्द्रियतृप्तिकारक क्रियाओं में कुछ भी आसक्ति शेष हो तो इन क्रियाओं
८४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु के फल का श्रीकृष्ण को अर्पण करना चाहिए । इसी का नाम दास्यभाव है, अर्थात् भगवान् स्वामी और भक्त उनका दास । ‘नारदीयपुराण’ में इस दास्यभाव को दिव्य बताया गया है। वहाँ उल्लेख है कि जो पुरुष मन, वचन और कर्म से निरन्तर भगवद्भक्ति के परायण है अथवा जो केवल इसकी अभिलाषा भी करता है, वह सब अवस्थाओं में जीवन्मुक्त है। सख्य सख्यभक्ति के दो भेद हैं—एक विश्वासवृत्ति और दूसरा मित्रवृत्ति । भगवद्भक्ति में विश्वास रखनेवाला क्रम से विधि-विधान का पालन करता है क्योंकि उसे यह दृढ़ श्रद्धा रहती है कि वह शुद्धसत्त्व में अवश्य स्थित हो जायगा । दूसरे प्रकार का सखाभाव श्रीभगवान् का हितैषी (सुहृद) बन जाना है। भगवद्गीता में कहा है कि प्रचारक भगवान् का परम प्रिय प्रेमपात्र है। गीता का गोपनीय सन्देश जनसाधारण में प्रसारित करने वाला श्रीकृष्ण का इतना प्यारा है कि जगत् में कोई भी उसकी तुलना नहीं कर सकता । महाभारत में द्रौपदी कहती है, “हे गोविन्द ! आपकी प्रतिज्ञा है कि मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता । मुझे इस पर विश्वास है, इसलिए महान् विपत्तियों में भी इसे याद कर-कर के प्राणधारण किए हुए हूँ।” द्रौपदी और उसके पति पाँचों पाण्डवों को दुर्योधन आदि बान्धवों ने बड़े- बड़े दुःख दिए । उनके दुःख इतने भयंकर थे कि महान् पराक्रमी और नैष्ठिक ब्रह्मचारी भीष्मदेव भी उनका विचार करके कभी-कभी रो पड़ते थे। उन्हें विस्मय होता कि यद्यपि पाण्डव इतने धर्मात्मा थे, द्रौपदी साक्षात् लक्ष्मी जैसी थी और स्वयं श्रीकृष्ण उनके बन्धु थे, फिर भी उन्हें इतना दुःख उठाना पड़ा । ऐसे अपार दुःख में भी द्रौपदी विचलित नहीं हुई । वह जानती थी कि श्रीकृष्ण उनके सुहृद हैं, अतः अन्त में विजय उन्हीं की होगी । श्रीमद्भागवत (११.२.५३) में भगवान् ऋषभ के पुत्र हवि राजा निमि से कहते हैं, “हे राजन् ! जो त्रिभुवन के ऐश्वर्य के लिए भी श्रीभगवान् के चरणकमलों की सेवा से जो देवताओं की भी चिर अभिलाषा है, विचलित नहीं होता, इसी को परम, आराध्य मानने के दृढ़ निश्चय से युक्त रहता है, वह उत्तम भक्त है ।’’ श्रीरूप गोस्वामी ने कनिष्ठ भक्त की सामान्य श्रद्धा को भगवान्
भगवत्सेवा के नाना रूप [ ८५ की भक्ति में अधिकार का कारण तथा भक्ति में दृढ़ विश्वास को भक्ति का का अंग कहा गया है । कभी-कभी अन्तरंग सखा की भाँति भगवान् के सेवन के लिए शुद्ध- भक्त मन्दिर के भीतर ही सो जाते हैं। भक्त के इस सख्य-व्यवहार को रागानुगा कहा जा सकता है। यद्यपि यह विधि है कि भगवत्-मन्दिर में कोई नहीं सो सकता, फिर भी यह रागानुगाभक्ति सख्य के वर्ग में मानी जा सकती है। आत्मनिवेदन आत्मनिवेदन के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (११.२६.३४) में भगवान् का सुन्दर कथन है—“जो पुरुष मेरे चरणों में पूर्ण समर्पण करके अन्य सब कर्मों को त्याग देता है, उसकी लोक-परलोक में मैं स्वयं रक्षा करता हूँ । आत्मनिवेदन के पथ पर उत्तरोत्तर आगे बढ़ने में मैं उसकी सहायता करता हूँ । ऐसा पुरुष साष्टि को प्राप्त हो चुका है।” भगवद्गीता में भी प्रमाण है कि जैसे ही कोई श्रीकृष्ण के चरणसरोज की शरण लेता है, श्रीकृष्ण उसकी बागडोर अपने हाथों में पकड़ लेते हैं और सम्पूर्ण पापों से मुक्ति का वचन देते हैं। वे अन्तरतर से उपदेश भी करते हैं जिससे वह परमार्थ के पथ पर शीघ्र अग्रसर हो सके । पूर्ण शरणागति का नाम ही आत्मनिवेदन है। प्रसंग के अनुसार ‘आत्म शब्द के विभिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं। इसका प्रयोग कभी ‘आत्मा’ के अर्थ में होता है तो कभी यह शरीर अथवा मन का निर्देश करता है । अतः पूर्ण आत्मनिवेदन का अर्थ अपने आत्मा, अपने मन और शरीर को भगवान् की सेवा में समर्पित कर देना है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने इस सम्बन्ध में अतिशय सुन्दर भजन गाया है। भगवच्चरणों में पूर्ण आत्मनिवेदन करते हुए वे कहते हैं, “मेरा मन, मेरा घर-परिवार, मेरा शरीर—जो कुछ भी मेरा है, हे नाथ ! वह सब आपकी सेवा में समर्पित है। अब आप जो चाहें उनके साथ वैसा ही करें । आप स्वामी हैं, मैं नित्यदास हूँ, इसलिए चाहें तो मुझे मार डालें अथवा इच्छा हो तो मेरी रक्षा करें । आपका पूर्ण अधिकार है, मेरा अपना कुछ नहीं ।” श्रीयामुनाचार्य ने भी भगवत्स्तवन में यही उद्गार अभिव्यंजित किए हैं—‘शरीर से मैं मनुष्य, देवता आदि जो कोई भी हूँ और जिस किसी गुण से युक्त हूँ, मुझे चिन्ता नहीं, क्योंकि यह सब त्रिगुणमयी माया का कार्य है, मैंने तो अपने-आपको आपके चरणकमलों में समर्पित कर दिया है ।' .
८६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु 'हरिभक्तिविवेक' में शरीर के समर्पण का प्रकार कहा गया है। भक्त कहता है, 'हे स्वामिन् ! बिका हुआ पशु अपने शरीर की रक्षा के लिए चिन्ता नहीं करता । मेरा शरीर-आत्मा आपको समर्पित हो गया है, इसलिए अपने रक्षण की चिन्ता से विरत हो गया हूँ।' भाव यह है कि अपने अथवा परिवार के रक्षण-मरण की चिन्ता न करे । यदि कोई वास्तव में शरीर-आत्मा से समर्पित हो गया है तो सदा स्मरण रखे कि उसका एकमात्र कार्य भगवत्सेवा के परायण रहना है । श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि सख्य और आत्मनिवेदन, भक्ति के ये दोनों अंग दुष्कर हैं, बहुत कम पाये जाते हैं और केवल उत्तर भक्तों के लिए ही साधना में सुखसाध्य हैं। भाव यह है कि शुद्ध भावभक्ति से युक्त आत्मनिवेदन बड़ा ही दुर्लभ है। यह तभी होगा जब पूर्ण रूप से भगवान् की इच्छा के परायण (शरणागत) हो जाय । निज प्रिय वस्तु का समर्पण श्रीमद्भागवत (११.११.४१) में भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, "हे सखे ! अपने पास जो-जो परम श्रेष्ठ वस्तु हो या संसार में जो प्रिय हो, उसे मेरे अर्पण करने से अनन्त लाभ होता है ।" भगवान् की प्रीति के लिए सब चेष्टा करना भगवान् के लिए सब चेष्टा करने का दृष्टान्त 'नारदपंचरात्र' में है । उल्लेख है कि भक्ति के अभिलाषी को भगवान् की सेवा के लिए सब लौकिकी-वैदिकी क्रियायें करनी चाहियें । तात्पर्य यह है कि भक्ति के शास्त्रविहित विधान का पालन करने के साथ-साथ भक्त को अपने व्याव- हारिक जीवन के कर्त्तव्यों का आचरण भी कृष्णभावनाभावित होकर ही करना चाहिए । जैसे किसी भक्त का कोई बड़ा उद्योग हो, तो वह इस लौकिक सम्पत्ति के फलों को भगवान् की सेवा में लगा सकता है। शरणापत्ति हरिभक्तिविलास' का वचन है, "जिस शरणागत भक्त को यह दृढ़ विश्वास है कि मैं भगवान् का हूँ और जो इस भाव के अनुरूप वास्तव में मन, वचन और कर्म से क्रिया भी करता है, वह यथार्थ दिव्य आनन्दमय का आस्वादन करता है।" नृसिंहपुराण में भगवान् नृसिंह कहते हैं—"हे देवदेव ! जनार्दन ! मैं आप की शरण में आया हूँ, इस प्रकार कहकर जो