भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु पद्मपुराण में दैन्यबोधिका विज्ञप्ति का भी विवरण है, "मेरे समान न तो कोई पापी है और न कोई अपराधी ही है। क्या कहूँ, आपके सामने आत्मनिवेदन करने के लिए आने में भी लज्जा आती है।" यह भक्त की स्वाभाविक स्थिति है। यह कोई आश्चर्य नहीं कि बद्धजीव का कुछ संचित पाप हो। उसे भगवान् से अपनी दीनता ज्ञापित करनी चाहिए। ऐसा करते ही भगवान् सच्चे भक्त को क्षमा कर देते हैं। परन्तु इस का अर्थ यह नहीं कि भगवान् की अहैतुकी करुणा की आड़ में पाप करता जाय और यह आशा करे कि प्रभु क्षमा कर देंगे। ऐसा विचार निर्लज्ज व्यक्तियों के ही योग्य है। यहाँ स्पष्ट कहा है, "आपसे अपने पापों का निवेदन करने में भी मुझे लज्जा आती है।" अतः यदि किसी को पाप करने में लज्जा नहीं आती, अपितु वह समझता है कि भगवान् उसे क्षमा कर देंगे तो ऐसी युक्ति सर्वथा अनर्थ है। वैदिक शास्त्रों में कहीं भी इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। यह सत्य है कि कृष्णनाम के जप से पूर्वजन्मों के सब पापों का धावन हो जाता है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि बार-बार पाप करे और फिर आशा करे कि वे दूर हो जायेंगे। भक्तिपथ में यह अनर्थकारी धारणा ग्राह्य नहीं है। "पूरे सप्ताह पाप करूँगा और अन्त में मन्दिर जाकर उन्हें धो डालूँगा, जिससे फिर पाप कर सकूँ" - इस विचार को भक्तिरसामृतसिन्धुकार ने अस्वीकार किया है, क्योंकि यह परम अनर्थमय अपराध है। 'नारदपंचरात्र' में लालसामयी विज्ञप्ति का विवरण है। भक्त कहता है, "हे नाथ ! लक्ष्मी के साथ विराजमान आप चमर डुलाने में लगे हुए मुझ को अपनी गम्भीर वाणी से 'ऐसा करो' यह आदेश कब देंगे ?" श्लोक का भाव यह है कि भक्त श्रीभगवान् के श्रीविग्रह को चमर से हवा करना चाहता है, अर्थात् प्रभु का निजी पार्षद बनने का अभिलाषी है। निःसन्देह दास, सखा अथवा प्रेमी के रूप में प्रत्येक भक्त सदा श्रीभगवान् के सान्निध्य में रहता है। निजी रुचि के अनुसार वह किसी एक प्रकार के रस-सम्बन्ध की अभिलाषा रखता है। यहाँ यह भक्त भगवान् का दास बनकर उनकी अन्तरंगा शक्ति लक्ष्मीजी के समान उन्हें चमर डुलाना चाहता है। उसकी यह भी अभिलाषा है कि श्रीभगवान् प्रसन्न होकर 'चमर ऐसे डुलाओ' इस प्रकार उसे आदेश दें। यह लालसामयी विज्ञप्ति स्वरूप-साक्षात्कार की परम अवधि है। 'नारदपंचरात्र' में ही भक्त की एक अन्य विज्ञप्ति है - "हे नाथ ! हे कमलनयन ! अहो ! वह दिन कब आयगा जब आपके नामों का कीर्तन