भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्ति के अंगों का विशद विवेचन [ ७३ करता हुआ आनन्दाश्रुओं से रुद्ध नेत्रों वाला मैं भावोन्मत्त होकर यमुना तट पर नाचूँगा ?” वह भी लालसामयी का उदाहरण है। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु का उद्गार है-“हे प्राणनाथ ! आपके विरह में मुझे क्षण भर युग जैसा भारी लगता है और सारा जगत् शून्य हुआ प्रतीत होता है।” भक्त को इस प्रकार भावमय प्रार्थना करते हुए अपनी सेवा का अर्पण करने के लिए उत्कण्ठित रहना चाहिए; सभी महाभागवतों का, विशेषतः श्रीचैतन्य महाप्रभु का यह उपदेश है। भाव यह है कि श्रीभगवान् के लिए रोने की कला सीखनी चाहिए; किसी न किसी प्रकार की भगवत्सेवा में लगने के लिए वास्तव में उत्कण्ठा- पूर्वक रोये । इस भाव का नाम ‘लौल्य’ है और ऐसा अश्रुविमोचन ही परम संसिद्धि (स्वरूपसिद्धि) का मूल्य है। यदि किसी में भगवत्-सांनिध्य और भगवत्सेवा या लौल्य उदित हो जाय तो उसका वैकुण्ठ प्रवेश निश्चित है। नहीं तो, लौकिक दृष्टि से तो वैकुण्ठ-प्रवेश के शुल्क की गणना ही नहीं हो सकती । इसका एकमात्र मूल्य है लौल्य और लालसामयी । स्तवपाठ मनीषियों के मत में भगवद्गीता अनेक प्रामाणिक स्तवों से परिपूर्ण है, विशेषतः ग्यारहवाँ अध्याय, क्योंकि उसमें अर्जुन ने भगवान् के विश्वरूप का स्तव किया है। इसी प्रकार ‘गौतमीयतन्त्र’ के सभी श्लोक स्तव हैं। श्रीमद्भागवत में तो श्रीभगवान् के शत-शत स्तव हैं ही। भक्त को अपने नित्यपाठ के हेतु इनमें से श्लोकों का चयन करना चाहिए। ‘स्कन्दपुराण’ में कहा है-“जिनकी जिह्वा निरन्तर श्रीकृष्ण के स्तवरत्नों से विभूषित रहती है, वे मुनियों और ऋषियों के लिए नमस्कार के योग्य और देवों के भी आराध्य हैं।” अल्पज्ञ लोग श्रीकृष्ण को भजने के स्थान पर भोगों की इच्छा से नाना देवताओं को पूजना चाहते हैं। परन्तु यह उल्लेख है कि निरन्तर श्रीभगवान् का स्तवन करने वाला भक्त स्वयं देवताओं का भी वन्दनीय है। शुद्धभक्तों को किसी भी देवता से कुछ नहीं चाहिए; वरन् सब के सब देवता ही शुद्धभक्तों की आराधना के उत्कण्ठित रहते हैं। ‘नृसिंहपुराण’ में कहा है, “भगवान् श्रीकृष्ण की मूर्ति के सामने स्तोत्र और स्तवपाठ करने वाला तत्काल सब पापों से छूट कर वैकुण्ठगमन के योग्य हो जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है।”