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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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भक्ति अंगों का विशद विवेचन [ ७१ जप मन्त्र का धीरे-धीरे मन्द स्वर से उच्चारण करना जप कहलाता है। उसी मन्त्र की उच्च ध्वनि करना कीर्तन है। जब महामन्त्र ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे’ का उच्चारण केवल अपने सुनने के लिए धीरे से किया जाय तो वह जप है और दूसरे उसे सुन सकें तो वह कीर्तन है। महामन्त्र का जप-कीर्तन दोनों किए जा सकते हैं। जप से केवल अपने को लाभ होता है; परन्तु कीर्तन को सुनने वाले अन्य सब का कल्याण हो जाता है। ‘पद्मपुराण’ का वाक्य है—“कृष्णनाम का जप-कीर्तन करने वाले के लिए स्वर्गसुख और मोक्ष का मार्ग तत्काल प्रशस्त हो जाता है।” विज्ञप्ति (निवेदन) ‘स्कन्दपुराण’ में भगवच्चरणकमलों में विज्ञप्ति के सम्बन्ध में एक वाक्य है, जिसमें उल्लेख है कि धीर भक्त श्रीकृष्ण के प्रति तीन प्रकार से विज्ञप्ति निवेदन कर सकते हैं : १. संप्रार्थनात्मिका (बड़ी भावमय प्रार्थना); २. दैन्यबोधिका (दीनताज्ञापन) तथा ३. लालसामयी (संसिद्धि की अभिलाषा)। परमार्थ में संसिद्धि की ऐसी अभिलाषा करना इन्द्रिय- तृप्ति जैसा नहीं है। जब जीव को श्रीभगवान् से अपने स्वरूपभूत सम्बन्ध का थोड़ा-बहुत बोध होता है तो वह अपने मूल यथार्थ स्वरूप को जान जाता है और श्रीकृष्ण के दास, सखा, माता-पिता अथवा प्रेयसी के रूप में स्थिति को फिर प्राप्त हो जाना चाहता है। इसी का नाम लालसामयी है। विज्ञप्ति की यह लालसामयी अवस्था पूर्ण मुक्ति अर्थात् स्वरूपसिद्धि होने पर प्राप्त होती है—जब पूर्ण आत्मविद्या और तत्त्वज्ञान के द्वारा जीव भगवान् से अपने आदिसम्बन्ध को जान जाता है। पद्मपुराण में भक्त की संप्रार्थनात्मिका विज्ञप्ति है, “हे नाथ ! आपके चरणकमलों में निवेदन है कि युवतियों का मन युवकों में और युवकों का मन युवतियों में जिस प्रकार रमा करता है, उसी भाँति मेरा मन भी सहज रूप में आपमें रमण करे।” दृष्टान्त समीचीन है। युवकयुवतियों में एक दूसरे को देखने पर परिचय के बिना सहज आकर्षण हो जाता है। यह सीखना नहीं पड़ता, कामविकार के कारण अपनेआप स्फुरित हो जाता है। यह एक लौकिक उदाहरण है। भक्त का उद्गार है कि उसका भगवान् में ऐसा ही राग हो जाय, जो सर्वथा हेतुरहित और अनन्य हो। भगवान् के लिए इस प्रकार की रागानुगा आसक्ति स्वरूप-साक्षात्कार की परम संसिद्धि है।