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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

७० ] भक्तिरसामृतसिन्धु संकीर्तन भगवान् के नाम, गुण, लीला, आदि का उच्च स्वर से कथन करना संकीर्तन कहलाता है । जनसमूह के भगवन्नाम के कीर्तन को भी संकीर्तन कहते हैं । ‘विष्णुधर्म’ में नामसंकीर्तन की महिमा इस प्रकार है, “हे राजन् ! यह कृष्णनाम इतना पावन है कि जिसकी जिह्वा पर आ जाता है, वह तत्काल करोड़ों जन्म के पापों से मुक्त हो जाता है ।” यह वास्तव में सत्य है । चैतन्यचरितामृत का वाक्य है, “जो एक बार भी कृष्णनाम का उच्चा- रण कर लेता है, वह उतने पापों का नाश कर देता है, जितने पाप वह कर भी नहीं सकता ।” पापी बहुत पाप करता है, परन्तु वह इतना पाप नहीं कर सकता, जिसे एक बार कृष्णनाम पुकारने से नष्ट न किया जा सके । श्रीमद्भागवत (७.६.१८) में प्रह्लाद महाराज भगवान् की स्तुति करते हैं, “हे नृसिंहदेव ! यदि मैं आपके चरणकमलों का दास बन जाऊँ तो आपकी लीलासुधा का श्रवण कर सकूँ गा । हे नाथ ! आप परम सुहृद एव परम आराध्य हैं । आपकी दिव्य लीला को सुनने मात्र से सम्पूर्ण पाप दूर हो जाते हैं । इसलिए मुझे उन पापकर्मों का भय नहीं है, क्योंकि आपके कथामृत का श्रवणपुटों से पान करता हुआ मैं शीघ्र ही भवसागर के सम्पूर्ण दुर्गुणों से तर जाऊँगा ।” श्रीभगवान् की लीलाओं से सम्बन्धित अनेक गीत हैं, जैसे ब्रह्मा की ब्रह्मसंहिता, नारद द्वारा गाया गया नारदपंचरात्र और शुकदेव गोस्वामी द्वारा गाई श्रीमद्भागवत । यदि कोई इन गीतों को सुने तो सहज ही भवबन्धन से छूट जाय । भगवान् के गीतों का श्रवण बड़ा सरल है । ये करोड़ों वर्षों से प्रचलित हैं और आज तक लोग इनसे लाभ उठा रहे हैं । अतः अब क्यों न इनका पूरा लाभ उठाकर संसार-जंजाल से मुक्त हो जाय ? गुणकीर्तन श्रीमद्भागवत (१.५.२२) में नारद मुनि अपने शिष्य व्यासदेव से कहते हैं, “हे व्यासजी ! तप-त्याग, वेदाध्ययन, यज्ञानुष्ठान वैदिकमन्त्र- उच्चारण, ज्ञान और दान आदि पुण्यकर्मों का एकमात्र परम फल यही है कि भक्तों के संग में भगवान् की कीर्ति का गान किया जाय ।” यहाँ संकेत है कि भगवान् का गुणकीर्तन जीव की आत्यन्तिकी क्रिया है ।