भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्ति के अंगों का विशद विवेचन [ ६६ वैसे ही जो भगवत्सेवा की व्यवस्था करता है, वह निश्चित रूप से देह त्याग कर कृष्णलोक को जाता है। "आज भी बहुत से मन्दिर वास्तव में राजप्रासाद जैसे हैं। वे साधारण भवन नहीं हैं, क्योंकि श्रीकृष्ण का अर्चन उसी प्रकार होना चाहिए जैसे अपने महल में राजा सेवित होता है। वृन्दा- वन के हजारों मन्दिरों में श्रीमूर्त्ति की राजोचित परिचर्चा की व्यवस्था है। 'नारदीयपुराण' में कथन है, "जो कोई क्षणभर के लिए भी भगवान् के मन्दिर में रहे, वह भी परमपद पा जाता है।" निष्कर्षस्वरूप कहा जा सकता है कि समाज के धनाढ्य सदस्यों को सुन्दर मन्दिरों का निर्माण करके विष्णु के अर्चन की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे लोग वहाँ आकृष्ट हों और इस प्रकार उन्हें श्रीमूर्त्ति के सामने नाचने तथा भगवन्नाम के श्रवणकीर्तन का अवसर मिले । इससे सभी भगवद्धाम में प्रवेश कर सकेंगे । पूर्णतः कृष्णभावनाभावित होकर निरन्तर भगवत्सेवा के परायण भक्तों का कहना ही क्या, विष्णुमन्दिर में जाने से तो साधारण मनुष्यों को भी परम लाभ सुलभ हो जायगा । इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत के चौथे स्कन्ध (२१.३१) में महाराज पृथु अपनी प्रजा से कहते हैं, "हे प्रजाजनो ! भगवान् श्रीहरि सभी के लिए पतितपावन हैं। किसी भी देवता में यह सामर्थ्य नहीं है क्योंकि वे तो स्वयं ही बन्धन में हैं। एक बद्धजीव दूसरे बद्धजीव का त्राण कैसे कर सकता है । श्रीकृष्ण अथवा उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि में ही किसी का उद्धार करने की शक्ति है। श्रीविष्णु के पैर के अँगूठे से निकली गंगा पृथ्वी आदि लोकों में प्रवाहित होती हुई सारे पापात्मा बद्धजीवों का त्राण कर रही है। फिर निरन्तर भगवत्सेवापरायण रहने वाले के सम्बन्ध में क्या कहना है। जन्म-जन्मान्तरों के संचित पापों के होते हुए भी उनकी मुक्ति निश्चित है ।" भाव यह है कि जो श्रीमूर्त्ति की अर्चना करता है, उसके करोड़ों जन्मों से संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। अर्चनपद्धति का विवरण दिया जा चुका है; साधक को इन विधि-विधानों का गंभीरता से पालन करना चाहिए । गान 'लिंगपुराण' में भगवत्कीर्ति के गान के सम्बन्ध में कहा है, "भगवान् की कीर्ति को निरन्तर गाने वाला ब्राह्मण श्रीकृष्ण के लोक को प्राप्त हो जाता है। भगवान् श्रीकृष्ण को यह गान शिव की स्तुति से भी अधिक प्रिय है।"