भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्ति के अंगों का विशद विवेचन [ ६७ श्रीकृष्ण ने इस प्रकार कहा है, "जो पुरुष प्रसन्न होकर भक्तिपूर्वक मेरे सामने नाचता हुआ शरीर की भंगियों से विविध भावों को अभिव्यक्त करता है, वह करोड़ों जन्मान्तरों से संचित पापों को नष्ट कर देता है।" इसी ग्रन्थ में नारद का वचन है, "करताल और नाना भाव-भंगिमाओं के साथ श्रीकृष्ण के सामने नृत्य करने वाले के शरीर से सभी पातकरूपी पक्षी उड़ जाते हैं।" जैसे ताली बजाने से बहुत से पक्षी उड़ने लगते हैं, वैसे ही कृष्णमूर्ति के आगे नाचने और ताली बजाने मात्र से शरीर में रहने वाले सारे पातकरूप पक्षी उड़ाए जा सकते हैं। श्रीमूर्त्ति के सम्मान में दण्डवत् प्रणाम और अभ्युत्थान 'नारदीयपुराण' का वाक्य है, "श्रीकृष्ण को किया एक प्रणाम भी दस अश्वमेध यागों से बढ़कर है।" याज्ञिक को पुण्यफल मिलेगा, परन्तु अन्त में पुण्य क्षीण होने पर उसे संसार में फिर जन्म लेना पड़ेगा, जबकि एक बार भी श्रीमूर्त्ति को प्रणाम करने वाला सीधा कृष्णलोक को चला जायगा। उसका कभी पुनर्जन्म नहीं होगा। 'ब्रह्माण्डपुराण' में कहा गया है, "भगवान् की रथयात्रा को सामने आते हुए देखकर उठकर अगवानी करने वाला अपने सब पापों को नष्ट कर देता है।" श्रीमूर्त्ति का अनुगमन 'भविष्यपुराण' में आया है, "भगवान् के रथ के साथ आगे-पीछे चलने वाले चाण्डाल तक श्रीविष्णु के ऐश्वर्य को प्राप्त हो जाते हैं।" विष्णु मन्दिर अथवा तीर्थ गमन पुराणों में कहा है, "वृन्दावन, मथुरा, द्वारका आदि तीर्थों को जाने वाले धन्य हैं। वे संसाररूप मरुभूमि से पार हो जाते हैं।" 'हरिभक्तिसुधोदय' में भगवान् श्रीकृष्ण के मन्दिर को जाने का माहात्म्य कहा गया है। जैसा कह आए हैं, वृन्दावन, मथुरा तथा द्वारका में यह पद्धति है कि भक्तजन इन पावन तीर्थों में स्थिति मन्दिरों में जाकर लाभान्वित होते हैं। एक श्लोक का आशय है, "कृष्णभावनाभावित शुद्ध भक्तिभाव से हरिमन्दिर में प्रवेश करने वाला फिर मातृगर्भरूप कारागार में नहीं जाता।" यद्यपि गर्भ का वास बद्धजीव के लिए बड़ा ही भयंकर और कष्टदायक होता है, परन्तु जन्म के समय वह उसे भूल जाता है। इस बद्धदशा से सदा-सदा के लिए मुक्ति के अभिलाषी को भक्तिभावित