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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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६६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु में 'पद्मपुराण' में उल्लेख है, "जो कण्ठ में तुलसी धारण करते हैं, जिनके शरीर पर विष्णुचिह्न—शंख, चक्र, गदा और पद्म के साथ द्वादश विष्णु- मन्दिर अंकित हैं; जो मस्तक पर विष्णु तिलक धारण करते हैं, वे ही जगत् में विष्णुभक्त अर्थात् वैष्णव हैं। इन वैष्णवों के सांनिध्य से जगत् पवित्र हो जाता है। वे जहाँ रहते हैं, वह स्थान वैकुण्ठ बन जाता है।" 'स्कन्दपुराण' में इसी प्रकार कहा है, "जो तिलक अथवा गोपी- चन्दन से विभूषित हैं, सम्पूर्ण शरीर पर भगवन्नाम धारण किए हुए हैं तथा जिनके कण्ठ और वक्षः स्थल पर तुलसी-माला रहती है, यमदूत उन वैष्णवों के पास भी नहीं फटक सकते।" पापियों को दण्ड का विधान करने वाले यम के दूतों की वैष्णवों पर एक नहीं चलती। श्रीमद्भागवत के अजामिल- उद्धार आख्यान में यमराज ने अपने दूतों को वैष्णवों के निकट कभी न जाने का आदेश दिया है। वैष्णव यमराज की अधिकार परिधि में नहीं आते। 'पद्मपुराण' में यह भी उल्लेख है, "चन्दन और कृष्णनाम से विभूषित मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है और साक्षात् कृष्णलोक में प्रविष्ट होकर भगवान् श्रीकृष्ण के सांनिध्य में रहता है।" पुष्पमाला ग्रहण अगला आदेश श्रीमूर्ति को अर्पित माला धारण करने के सम्बन्ध में है। इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत (११.६.४६) में श्रीकृष्ण से उद्धव का वाक्य है, "हे गोविन्द ! आपके द्वारा प्रयुक्त माला, गन्ध, वस्त्र, और अलंकार को धारण करने वाला तथा आपका उच्छिष्ट भोजन करने वाला मैं आपका दास माया को जीत लूँगा, ऐसा विश्वास है।" तात्पर्य यह है कि जो गोपीचन्दन अथवा चन्दन का तिलक लगाता है और श्रीकृष्ण के निर्माल्य (माला, आदि) को धारण करता है, वह माया के वश में कभी नहीं होता। मृत्युकाल में ऐसे पुरुष के लिए यमदूत नहीं आ सकते। जो सम्पूर्ण वैष्णव आचार का पालन नहीं करता, पर कृष्णप्रसाद खाता है, वह भी शनैः-शनैः पूर्ण वैष्णव बन जायगा। स्कन्दपुराण में ब्रह्माजी नारद से कहते हैं, "हे नारद ! श्रीकृष्ण के विग्रह से उतरी हुई माला जिसके शरीर का स्पर्श करती है, वह सब पापों और रोगों से मुक्त होकर क्रमशः जड़ प्रकृति के बन्धन से छूट जाता है।" श्रीमूर्ति के सामने नाचना 'द्वारकामाहात्म्य' में श्रीमूर्ति के सामने नाचने की महिमा को