भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ भक्ति के अंगों का विशद विवेचन निन्दा भगवान् और उनके भक्तों की निन्दा को कभी सहन नहीं करना चाहिए। इस सन्दर्भ में श्रीमद्भागवत (१०.७०.४०) में शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराज से कहते हैं, "भगवान् और उनके भक्तों की निन्दा को सुनकर जो वहाँ से हट नहीं जाता, वह सम्पूर्ण पुण्यों से च्युत हो कर पतित हो जाता है।" भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने अपने शिक्षाष्टक में कहा है, "भक्त को वृक्ष से अधिक सहिष्णु और मार्ग के तिनके से भी विनम्र होना चाहिए। सब का सम्मान करे, परन्तु स्वयं मान न चाहे।" भक्त के रूप में इतने दीन और विनम्र होते हुए भी जब श्रीचैतन्य महाप्रभु को सूचना मिली कि श्रीनित्यानन्द के शरीर पर दुष्टों ने आघात किया है तो वे तत्काल उस स्थान पर दौड़ पड़े और अपराधी जगाई-मधाई को मारने के लिए उद्यत हो गए। भगवान् चैतन्य महाप्रभु का यह आचरण अतिशय महत्त्व- पूर्ण है। इससे प्रकट होता है कि भक्त निजी रूप से सर्वथा निरभिमान, सहिष्णु और विनीत हो सकता है, परन्तु जहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अथवा उनके भक्त के सम्मान पर कोई आँच आए तो वह उसे सहन नहीं करेगा। इस प्रकार के अपमान का तीन प्रकार से प्रतिकार किया जा सकता है। यदि कोई वाणी से निन्दा करता हो तो भक्त को इतना कुशल होना चाहिए कि प्रतिपक्षी को तर्क द्वारा निरस्त कर दे। यदि ऐसा न कर सके तो दीनभाव से वहाँ खड़ा न रहे, वरन् आत्महत्या कर ले। यदि यह भी सम्भव न हो तो उस स्थान को ही त्याग कर चला जाय। यदि इन तीनों में से किसी भी आचार का पालन नहीं करता, तो वह भक्तियोग से गिर जाता है। तिलक तथा तुलसी-कण्ठी वैष्णव द्वारा शरीर को तिलक-कण्ठी से विभूषित करने के सम्बन्ध