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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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६८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु फिर बाद में नामजप से पापों को नष्ट कर दूँगा। यह विचार बड़ा ही भयंकर अपराध है, अतः इससे बचे); ८. हरेकृष्ण जप को वैदिक कर्मकाण्ड में वर्णित पुण्यकर्मों के समान समझना; ६. अश्रद्धालु को कृष्णनाम की महिमा का उपदेश करना (भगवन्नाम का जप कोई भी कर सकता है, परन्तु प्रारम्भ में उसे भगवन्नाम की दिव्य शक्ति का उपदेश नहीं करना चाहिए, क्योंकि जो अत्यन्त पापी हैं, वे भगवत्-महिमा को धारण नहीं कर सकते। इसलिए उनको यह न सुनाना ही अच्छा है); १०. भगवन्नाम के जप में पूर्ण विश्वास न होना और इसकी इतनी अगाध महिमा सुनने पर भी विषयासक्ति बनाए रखना। अपने को वैष्णव समझने वाले प्रत्येक भक्त को इन सब अपराधों से बचना चाहिए, जिससे शीघ्र अभीष्ट-सिद्धि हो।