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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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वर्जनीय अपराध | ६३ न करे; २८. मस्तक पर तीन रेखा का तिलक न लगाये; २६. हाथ-पैर धोये बिना मन्दिर में प्रवेश न करे। अन्य नियम इस प्रकार हैं—अवैष्णव द्वारा बनाए भोजन का अर्पण न करे; अभक्त के सामने मूर्ति-अर्चन न करे तथा प्रारम्भ में गणपति की उपासना करे, जिससे भक्ति के मार्ग में आनेवाले सब विघ्न दूर हो जाते हैं। 'ब्रह्मसंहिता' में उल्लेख है कि गणपति भगवान् नृसिंह के चरणकमलों के आराधक हैं। इसीलिए सम्पूर्ण अंतरायों को दूर करने में वे भक्तों के लिए मंगलकारी हो गए हैं। अतः सभी भक्तों को गणपति की पूजा करनी चाहिए। नखों अथवा उंगलियों के स्पर्श से दूषित जल में मूर्ति को स्नान नहीं कराना चाहिए। स्वेद-स्राव के समय भक्त अर्चन न करे। ऐसे अन्य अनेक निषेध हैं, जैसे मूर्ति को अर्पित पुष्पों का चरणों द्वारा उल्लंघन अथवा मर्दन न करे, भगवन्नाम की शपथ न खाये, इत्यादि। भक्तियोग के साधन में इन सब अपराधों से सावधानीपूर्वक बचना चाहिए। 'पद्मपुराण' में कहा है कि जीवनभर पाप करने वाले की भी भगवान् रक्षा करेंगे, यदि वह केवल उनके शरणागत हो जाय। अस्तु, सिद्ध होता है कि भगवान् का शरणागत मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है। यदि कोई स्वयं भगवान् का भी अपराध कर बैठे, तो 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे'—इस महामंत्र का आश्रय लेने पर उसका भी उद्धार हो सकता है। अर्थात् हरेकृष्ण महामन्त्र का जप सब पापों को नष्ट कर देता है। परन्तु यदि कोई पवित्र भगवन्नाम का अपराधी बन जाय, तो उद्धार नहीं हो सकता। नाम-अपराध ये हैं: १. भगवन्नाम के प्रचार में जीवन का समर्पण करने वाले महाभागवतों की निन्दा करना; २. शिव, ब्रह्मा, आदि देवों के नाम को भगवन्नाम के समान अथवा उससे स्वतन्त्र समझना (कभी-कभी अनीश्वरवादी लोग यह मान बैठते हैं कि कोई भी देवता भगवान् विष्णु के समान हो सकता है। परन्तु यथार्थ भक्त जानता है कि बड़े से बड़ा देवता भी भगवान् विष्णु के समान अथवा उनसे स्वतन्त्र नहीं हो सकता। इसलिए यदि कोई समझे कि दुर्गा-दुर्गा अथवा काली-काली कहना हरेकृष्ण कहने के समान है, तो यह सबसे बड़ा अपराध होगा); ३. गुरु की अवज्ञा; ४. वैदिक शास्त्रों अथवा प्रमाणों का खण्डन; ५. हरेकृष्ण महामन्त्र के जप की महिमा को काल्पनिक समझना; ६. भगवन्नाम में अर्थवाद का आरोप; ७. नाम के बल पर पाप करना (भगवन्नाम-जप से सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं—इससे यह नहीं समझना चाहिए कि पहले पाप कर लूँ और