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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 380 में से

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पृष्ठ 108

श्रवण-स्मरण की कला [ ८१

गोदावरी में स्नान करता । स्नान के बाद एकान्त नदी तट पर आसन लगाकर प्राणायाम के अभ्यास से मन को एकाग्र करता । प्राणायाम का यह अभ्यास चित्त को यन्त्र के समान किसी एक वस्तु पर केन्द्रित करने के लिए है। प्राणायाम और आसनों का यही लाभ है। पूर्वकाल में साधारण मनुष्य भी भगवान् के स्मरण में मन को एकाग्र करना जानते थे; ब्राह्मण ने भी ऐसा अभ्यास किया । मन में भगवान् का रूप बस जाने पर वह ध्यान में भगवान् को बहुमूल्य वस्त्रों, अलंकारों, मुकुटों आदि से विभूषित करने लगा । फिर उसने भगवान् को दण्डवत् प्रणाम किया । इसके बाद मन्दिर-मार्जन का ध्यान करने लगा । मन्दिर-मार्जन करके वह बहुत से स्वर्ण और चाँदी के पात्रों में नदी का पवित्र जल लाने गया । गोदावरी से ही नहीं, अपितु गंगा, यमुना, नर्मदा और कावेरी से भी जल लाया । वैष्णवजन सामान्यतः भगवत्-अर्चन करते हुए मन्त्रों के द्वारा इन नदियों के जल का आह्वान करते हैं। मन्त्रोच्चारण के स्थान पर इस ब्राह्मण ने ध्यान किया है कि वह स्वयं स्वर्णपात्रों में भर-भर कर सब नदियों का जल ला रहा है । तत्पश्चात् उसने फल, फूल, धूप आदि अर्चन के सब पदार्थ जुटाए और उन्हें श्रीमूर्त्ति के सामने रखा । श्रीमूर्त्ति की प्रसन्नता के लिए जल, पुष्प, धूप आदि इन सब पदार्थों का सुन्दर रीति से अर्पण किया । फिर आरति की । इस प्रकार पूर्ण विधि से अर्चना सम्पन्न हुई । वह नित्य नियमित रूप से इसी प्रकार अर्चन करता था और यह क्रम वर्षों तक चलता रहा । फिर एक दिन ब्राह्मण ध्यान कर रहा था कि उसने श्रीमूर्त्ति के लिए कुछ खीर बनायी है; परन्तु वह इस भोग से प्रसन्न नहीं हुआ क्योंकि खीर बहुत गरम थी । इसलिए वह हाथ से छू कर देखना चाहता कि खीर भगवान् के खाने योग्य है या नहीं । जैसे ही उसने अपनी अंगुलो से खीर पात्र को स्पर्श किया कि वह जल गयी और उसका ध्यान भंग हो गया । अब वह क्या देखता है कि उसकी अंगुली वास्तव में जल गयी है। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ । वह तो खीर को स्पर्श करने का केवल ध्यान ही कर रहा था, उसे यह आशा नहीं थी कि उसकी अंगुली सचमुच जल जायगी । जब वह इस प्रकार विचारमग्न था, तभी लक्ष्मीसहित वैकुण्ठ में विराजमान भगवान् नारायण हँस पड़े । उनकी हँसी को देखकर उनकी परिचर्या में तत्पर सभी लक्ष्मी देवियाँ उत्कण्ठावश इसका कारण पूछने लगीं। श्रीभगवान् ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया, वरन् तत्काल ब्राह्मण को बुला भेजा । वैकुण्ठ का एक विमान ब्राह्मण को लेकर तत्क्षण भगवान्