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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

श्रवण-स्मरण की कला [ ८१

गोदावरी में स्नान करता । स्नान के बाद एकान्त नदी तट पर आसन लगाकर प्राणायाम के अभ्यास से मन को एकाग्र करता । प्राणायाम का यह अभ्यास चित्त को यन्त्र के समान किसी एक वस्तु पर केन्द्रित करने के लिए है। प्राणायाम और आसनों का यही लाभ है। पूर्वकाल में साधारण मनुष्य भी भगवान् के स्मरण में मन को एकाग्र करना जानते थे; ब्राह्मण ने भी ऐसा अभ्यास किया । मन में भगवान् का रूप बस जाने पर वह ध्यान में भगवान् को बहुमूल्य वस्त्रों, अलंकारों, मुकुटों आदि से विभूषित करने लगा । फिर उसने भगवान् को दण्डवत् प्रणाम किया । इसके बाद मन्दिर-मार्जन का ध्यान करने लगा । मन्दिर-मार्जन करके वह बहुत से स्वर्ण और चाँदी के पात्रों में नदी का पवित्र जल लाने गया । गोदावरी से ही नहीं, अपितु गंगा, यमुना, नर्मदा और कावेरी से भी जल लाया । वैष्णवजन सामान्यतः भगवत्-अर्चन करते हुए मन्त्रों के द्वारा इन नदियों के जल का आह्वान करते हैं। मन्त्रोच्चारण के स्थान पर इस ब्राह्मण ने ध्यान किया है कि वह स्वयं स्वर्णपात्रों में भर-भर कर सब नदियों का जल ला रहा है । तत्पश्चात् उसने फल, फूल, धूप आदि अर्चन के सब पदार्थ जुटाए और उन्हें श्रीमूर्त्ति के सामने रखा । श्रीमूर्त्ति की प्रसन्नता के लिए जल, पुष्प, धूप आदि इन सब पदार्थों का सुन्दर रीति से अर्पण किया । फिर आरति की । इस प्रकार पूर्ण विधि से अर्चना सम्पन्न हुई । वह नित्य नियमित रूप से इसी प्रकार अर्चन करता था और यह क्रम वर्षों तक चलता रहा । फिर एक दिन ब्राह्मण ध्यान कर रहा था कि उसने श्रीमूर्त्ति के लिए कुछ खीर बनायी है; परन्तु वह इस भोग से प्रसन्न नहीं हुआ क्योंकि खीर बहुत गरम थी । इसलिए वह हाथ से छू कर देखना चाहता कि खीर भगवान् के खाने योग्य है या नहीं । जैसे ही उसने अपनी अंगुलो से खीर पात्र को स्पर्श किया कि वह जल गयी और उसका ध्यान भंग हो गया । अब वह क्या देखता है कि उसकी अंगुली वास्तव में जल गयी है। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ । वह तो खीर को स्पर्श करने का केवल ध्यान ही कर रहा था, उसे यह आशा नहीं थी कि उसकी अंगुली सचमुच जल जायगी । जब वह इस प्रकार विचारमग्न था, तभी लक्ष्मीसहित वैकुण्ठ में विराजमान भगवान् नारायण हँस पड़े । उनकी हँसी को देखकर उनकी परिचर्या में तत्पर सभी लक्ष्मी देवियाँ उत्कण्ठावश इसका कारण पूछने लगीं। श्रीभगवान् ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया, वरन् तत्काल ब्राह्मण को बुला भेजा । वैकुण्ठ का एक विमान ब्राह्मण को लेकर तत्क्षण भगवान्

८२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु नारायण के सान्निध्य में पहुँच गया। तब भगवान् ने सारा वृत्तान्त कह सुनाया। इस प्रकार बड़भागी ब्राह्मण को भगवान् और लक्ष्मीगण के सांनिध्य में नित्य वैकुण्ठवास प्राप्त हुआ। इस कथा से प्रकट होता है कि अपने धाम में विराजमान होने पर भी श्रीभगवान् सर्वव्यापी हैं। वैकुण्ठ में ही नहीं, अर्चन का ध्यान करते हुए ब्राह्मण के हृदय में भी वे बैठे थे । अतएव हम जान सकते हैं कि भगवान् भक्तों द्वारा ध्यान में अर्पित पदार्थों को भी ग्रहण करते हैं और इससे भक्त की अभीष्टसिद्धि हो जाती है।

अध्याय ११ भगवत्सेवा के नाना रूप दास्यभाव कर्मियों के मत में कर्मफल का अर्पण दास्य है; परन्तु रूप गोस्वामी आदि वैष्णव आचार्यों के अनुसार किसी-न-किसी रूप में भगवत्सेवा में निरन्तर संलग्न रहना दास्य का स्वरूप है। 'स्कन्दपुराण' में कहा है कि कर्मकाण्ड और वर्णाश्रम का आचरण करने वाले भक्त हैं। परन्तु जो यथार्थ में प्रत्यक्ष रूप से भगवत्सेवा में लगे रहते हैं, वे भागवत, अर्थात् शुद्धभक्त हैं। सकाम कर्मी अथवा वर्णाश्रमधर्म का पालन करने वाले शुद्धभक्त नहीं हो सकते । फिर भी, भगवान् को कर्मफल का अर्पण करते हैं, इस कारण उन्हें भी भक्त मान लिया है। जब अन्य कोई अभिलाषा नहीं रहती और वह भगवत्प्रेम से भरकर स्वाभाविक रागानुगा भगवत्सेवा करता है, तब उसे शुद्धभक्त समझना चाहिए। प्राकृत-जगत् के संसर्ग में आए सभी बद्धजीव न्यूनाधिक रूप में माया पर प्रभुत्व करना चाहते हैं। वर्णाश्रम पद्धति और तत्सम्बन्धी कर्तव्य इस विधि से निर्धारित हैं कि बद्धजीव स्वेच्छानुसार प्राकृत-जगत् को भोग सके, पर साथ ही शनैः-शनैः पारमार्थिक ज्ञान को भी प्राप्त हो जाय। वर्णाश्रमधर्म के अन्तर्गत ऐसे अनेक कर्तव्य हैं, जो कृष्णभावनाभावित भक्तियोग के अंग हैं। गृहस्थ भक्त वैदिककर्म और भक्ति के कर्तव्य, दोनों का आचरण करते हैं क्योंकि ये दोनों ही श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए हैं। गृहस्थ भक्त किसी वैदिककर्म का अनुष्ठान श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए ही करते हैं। पूर्व- वर्णन किया जा चुका है कि जिस भी क्रिया का लक्ष्य श्रीकृष्ण की तृप्ति करना हो, वह भक्ति है। श्रीरूप गोस्वामी भक्ति करने के योग्य पुरुष का वर्णन करते हैं। जिनमें थोड़ा कुछ भगवत्प्रेम का उदय हो गया है, वे कनिष्ठ अधिकारी अपनी भक्ति के विकास के अनुसार इन्द्रियतृप्ति से अरुचि अनुभव करते हैं। यदि इन्द्रियतृप्तिकारक क्रियाओं में कुछ भी आसक्ति शेष हो तो इन क्रियाओं

८४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु के फल का श्रीकृष्ण को अर्पण करना चाहिए । इसी का नाम दास्यभाव है, अर्थात् भगवान् स्वामी और भक्त उनका दास । ‘नारदीयपुराण’ में इस दास्यभाव को दिव्य बताया गया है। वहाँ उल्लेख है कि जो पुरुष मन, वचन और कर्म से निरन्तर भगवद्भक्ति के परायण है अथवा जो केवल इसकी अभिलाषा भी करता है, वह सब अवस्थाओं में जीवन्मुक्त है। सख्य सख्यभक्ति के दो भेद हैं—एक विश्वासवृत्ति और दूसरा मित्रवृत्ति । भगवद्भक्ति में विश्वास रखनेवाला क्रम से विधि-विधान का पालन करता है क्योंकि उसे यह दृढ़ श्रद्धा रहती है कि वह शुद्धसत्त्व में अवश्य स्थित हो जायगा । दूसरे प्रकार का सखाभाव श्रीभगवान् का हितैषी (सुहृद) बन जाना है। भगवद्गीता में कहा है कि प्रचारक भगवान् का परम प्रिय प्रेमपात्र है। गीता का गोपनीय सन्देश जनसाधारण में प्रसारित करने वाला श्रीकृष्ण का इतना प्यारा है कि जगत् में कोई भी उसकी तुलना नहीं कर सकता । महाभारत में द्रौपदी कहती है, “हे गोविन्द ! आपकी प्रतिज्ञा है कि मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता । मुझे इस पर विश्वास है, इसलिए महान् विपत्तियों में भी इसे याद कर-कर के प्राणधारण किए हुए हूँ।” द्रौपदी और उसके पति पाँचों पाण्डवों को दुर्योधन आदि बान्धवों ने बड़े- बड़े दुःख दिए । उनके दुःख इतने भयंकर थे कि महान् पराक्रमी और नैष्ठिक ब्रह्मचारी भीष्मदेव भी उनका विचार करके कभी-कभी रो पड़ते थे। उन्हें विस्मय होता कि यद्यपि पाण्डव इतने धर्मात्मा थे, द्रौपदी साक्षात् लक्ष्मी जैसी थी और स्वयं श्रीकृष्ण उनके बन्धु थे, फिर भी उन्हें इतना दुःख उठाना पड़ा । ऐसे अपार दुःख में भी द्रौपदी विचलित नहीं हुई । वह जानती थी कि श्रीकृष्ण उनके सुहृद हैं, अतः अन्त में विजय उन्हीं की होगी । श्रीमद्भागवत (११.२.५३) में भगवान् ऋषभ के पुत्र हवि राजा निमि से कहते हैं, “हे राजन् ! जो त्रिभुवन के ऐश्वर्य के लिए भी श्रीभगवान् के चरणकमलों की सेवा से जो देवताओं की भी चिर अभिलाषा है, विचलित नहीं होता, इसी को परम, आराध्य मानने के दृढ़ निश्चय से युक्त रहता है, वह उत्तम भक्त है ।’’ श्रीरूप गोस्वामी ने कनिष्ठ भक्त की सामान्य श्रद्धा को भगवान्

भगवत्सेवा के नाना रूप [ ८५ की भक्ति में अधिकार का कारण तथा भक्ति में दृढ़ विश्वास को भक्ति का का अंग कहा गया है । कभी-कभी अन्तरंग सखा की भाँति भगवान् के सेवन के लिए शुद्ध- भक्त मन्दिर के भीतर ही सो जाते हैं। भक्त के इस सख्य-व्यवहार को रागानुगा कहा जा सकता है। यद्यपि यह विधि है कि भगवत्-मन्दिर में कोई नहीं सो सकता, फिर भी यह रागानुगाभक्ति सख्य के वर्ग में मानी जा सकती है। आत्मनिवेदन आत्मनिवेदन के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (११.२६.३४) में भगवान् का सुन्दर कथन है—“जो पुरुष मेरे चरणों में पूर्ण समर्पण करके अन्य सब कर्मों को त्याग देता है, उसकी लोक-परलोक में मैं स्वयं रक्षा करता हूँ । आत्मनिवेदन के पथ पर उत्तरोत्तर आगे बढ़ने में मैं उसकी सहायता करता हूँ । ऐसा पुरुष साष्टि को प्राप्त हो चुका है।” भगवद्गीता में भी प्रमाण है कि जैसे ही कोई श्रीकृष्ण के चरणसरोज की शरण लेता है, श्रीकृष्ण उसकी बागडोर अपने हाथों में पकड़ लेते हैं और सम्पूर्ण पापों से मुक्ति का वचन देते हैं। वे अन्तरतर से उपदेश भी करते हैं जिससे वह परमार्थ के पथ पर शीघ्र अग्रसर हो सके । पूर्ण शरणागति का नाम ही आत्मनिवेदन है। प्रसंग के अनुसार ‘आत्म शब्द के विभिन्न-भिन्न अर्थ होते हैं। इसका प्रयोग कभी ‘आत्मा’ के अर्थ में होता है तो कभी यह शरीर अथवा मन का निर्देश करता है । अतः पूर्ण आत्मनिवेदन का अर्थ अपने आत्मा, अपने मन और शरीर को भगवान् की सेवा में समर्पित कर देना है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने इस सम्बन्ध में अतिशय सुन्दर भजन गाया है। भगवच्चरणों में पूर्ण आत्मनिवेदन करते हुए वे कहते हैं, “मेरा मन, मेरा घर-परिवार, मेरा शरीर—जो कुछ भी मेरा है, हे नाथ ! वह सब आपकी सेवा में समर्पित है। अब आप जो चाहें उनके साथ वैसा ही करें । आप स्वामी हैं, मैं नित्यदास हूँ, इसलिए चाहें तो मुझे मार डालें अथवा इच्छा हो तो मेरी रक्षा करें । आपका पूर्ण अधिकार है, मेरा अपना कुछ नहीं ।” श्रीयामुनाचार्य ने भी भगवत्स्तवन में यही उद्गार अभिव्यंजित किए हैं—‘शरीर से मैं मनुष्य, देवता आदि जो कोई भी हूँ और जिस किसी गुण से युक्त हूँ, मुझे चिन्ता नहीं, क्योंकि यह सब त्रिगुणमयी माया का कार्य है, मैंने तो अपने-आपको आपके चरणकमलों में समर्पित कर दिया है ।' .

८६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु 'हरिभक्तिविवेक' में शरीर के समर्पण का प्रकार कहा गया है। भक्त कहता है, 'हे स्वामिन् ! बिका हुआ पशु अपने शरीर की रक्षा के लिए चिन्ता नहीं करता । मेरा शरीर-आत्मा आपको समर्पित हो गया है, इसलिए अपने रक्षण की चिन्ता से विरत हो गया हूँ।' भाव यह है कि अपने अथवा परिवार के रक्षण-मरण की चिन्ता न करे । यदि कोई वास्तव में शरीर-आत्मा से समर्पित हो गया है तो सदा स्मरण रखे कि उसका एकमात्र कार्य भगवत्सेवा के परायण रहना है । श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि सख्य और आत्मनिवेदन, भक्ति के ये दोनों अंग दुष्कर हैं, बहुत कम पाये जाते हैं और केवल उत्तर भक्तों के लिए ही साधना में सुखसाध्य हैं। भाव यह है कि शुद्ध भावभक्ति से युक्त आत्मनिवेदन बड़ा ही दुर्लभ है। यह तभी होगा जब पूर्ण रूप से भगवान् की इच्छा के परायण (शरणागत) हो जाय । निज प्रिय वस्तु का समर्पण श्रीमद्भागवत (११.११.४१) में भगवान् श्रीकृष्ण उद्धव से कहते हैं, "हे सखे ! अपने पास जो-जो परम श्रेष्ठ वस्तु हो या संसार में जो प्रिय हो, उसे मेरे अर्पण करने से अनन्त लाभ होता है ।" भगवान् की प्रीति के लिए सब चेष्टा करना भगवान् के लिए सब चेष्टा करने का दृष्टान्त 'नारदपंचरात्र' में है । उल्लेख है कि भक्ति के अभिलाषी को भगवान् की सेवा के लिए सब लौकिकी-वैदिकी क्रियायें करनी चाहियें । तात्पर्य यह है कि भक्ति के शास्त्रविहित विधान का पालन करने के साथ-साथ भक्त को अपने व्याव- हारिक जीवन के कर्त्तव्यों का आचरण भी कृष्णभावनाभावित होकर ही करना चाहिए । जैसे किसी भक्त का कोई बड़ा उद्योग हो, तो वह इस लौकिक सम्पत्ति के फलों को भगवान् की सेवा में लगा सकता है। शरणापत्ति हरिभक्तिविलास' का वचन है, "जिस शरणागत भक्त को यह दृढ़ विश्वास है कि मैं भगवान् का हूँ और जो इस भाव के अनुरूप वास्तव में मन, वचन और कर्म से क्रिया भी करता है, वह यथार्थ दिव्य आनन्दमय का आस्वादन करता है।" नृसिंहपुराण में भगवान् नृसिंह कहते हैं—"हे देवदेव ! जनार्दन ! मैं आप की शरण में आया हूँ, इस प्रकार कहकर जो

भगवत्सेवा के नाना रूप [ ८७ शरण में आ जाता है, अपने उस आश्रित का मैं सब क्लेशों से उद्धार करता हूँ।” तुलसीसेवन ‘स्कन्दपुराण’ में तुलसी का माहात्म्य है, “जिसके दर्शन से पापों और रोगों का नाश होता है, स्पर्श से शरीर शुद्ध होता है, वंदन करने और सींचने से यमभय जाता रहता है, संरोपण करने से जो भगवान् की भक्ति देने वाली है और श्रीकृष्ण के चरणों में अर्पित करने से जो पूर्ण भगवत्प्रेम का दान करती है, उस तुलसीदेवी के चरणों में सादर प्रणाम करता हूँ।” अवैष्णव हिन्दुओं के घरों में भी तुलसी की विशेष शुश्रूषा की जाती है। महानगरों में तुलसी रखना बड़ा कठिन है, परन्तु फिर भी लोग इसे बड़ी सावधानी से लगाते हैं। वे इसे जल से सींच कर प्रणाम करते हैं क्योंकि भक्तिपथ में तुलसीसेवा बहुत महत्त्वपूर्ण है। ‘स्कन्दपुराण’ में तुलसीमाहात्म्य का एक अन्य वाक्य है, “तुलसी सर्वमंगलमयी हैं। इसे देखने, स्पर्श, स्मरण, स्तुति, वन्दना, श्रवण अथवा रोपण करने से सब प्रकार का कल्याण होता है। इन नौ विधियों से तुलसीसेवन करने वाला शाश्वत् काल तक वैकुण्ठ-जगत् में वास करता है।

अध्याय १२ भक्ति के अंग (२) शास्त्र-श्रवण श्रील रूपगोस्वामी के अनुसार, जो ग्रन्थ भक्तिमार्ग को प्रकाशित करे, वह शास्त्र है। श्रील मध्वाचार्य का वचन है कि रामायण, महाभारत, पुराण, उपनिषद्, वेदान्तसूत्र आदि ग्रन्थ और इनके अनुगामी अन्य सब ग्रन्थ शास्त्र हैं। ‘स्कन्दपुराण’ में उल्लेख है, “जो वैष्णव शास्त्रों का निरन्तर पठन और श्रवण करते हैं, वे मनुष्यों में धन्य हैं, निस्सन्देह भगवान् श्रीकृष्ण उनसे प्रसन्न होते हैं। वैष्णवशास्त्रों की घर में अर्चना करने वाले पापों से छूट कर देवताओं के वन्दनीय बन जाते हैं।” नारदजी से कहा गया है, “हे नारद ! जो मनुष्य वैष्णवशास्त्रों को लिखकर घर में रखता है, उसके यहाँ साक्षात् श्रीमन्नारायण विराजते हैं।” श्रीमद्भागवत (१२.१३.१५) में कथन है, “यह श्रीमद्भागवत सारे वेदान्त का परम सार है। जो किसी प्रकार श्रीमद्भागवत में रस लेने लगता है, उसकी किसी अन्य साहित्य को पढने में रुचि नहीं होती। भाव यह है कि श्रीमद्भागवत के दिव्यरस से तृप्त हुआ भाग्यवान् ग्राम्यवार्ता में रस नहीं ले सकता।” मथुरामण्डल में वास ‘वराहपुराण’ में मथुरामण्डल की स्तुति है। भगवान् वराह पृथ्वी- वासियों से कहते हैं, “जो मथुरा को छोड़ अन्य स्थान में प्रेम करता है, वह मूढ़ मेरी माया द्वारा मोहित होकर संसार में चक्कर काटता रहेगा।” ‘ब्रह्माण्डपुराण’ में वचन है, “जो परमानन्दमयी सिद्धि तीनों लोकों के तीर्थों में जाने से भी नहीं मिलती, वह मथुरा के स्पर्शमात्र से प्राप्त हो जाती है।” शास्त्रों में स्थान-स्थान पर कहा गया है कि मथुरा

भक्ति के अंग (२) [ ८६ के श्रवण-स्मरण, कीर्तन, चाहने, दर्शन, गमन, स्पर्श, आश्रय लेने और सेवन करने से अभीष्ट-सिद्धि होती है । वैष्णवसेवन 'पद्मपुराण में वैष्णवसेवन की प्रशंसा में एक सुन्दर वाक्य है । शिवजी पार्वती से कहते हैं । "हे देवि ! सब प्रकार की आराधनाओं में भगवान् की अराधना सर्वोत्तम है । परन्तु भगवद्भक्तों की आराधना उससे भी बड़ी है ।" श्रीमद्भागवत (३.७.१६) में ऐसा ही वाक्य है, "मैं भक्तों का निष्कपट दास बनने का अभिलाषी हूँ, क्योंकि उनकी सेवा करने से भगवत्- चरणारविन्दों की शुद्धभक्ति सुलभ है। भक्तसेवन से सम्पूर्ण दुःखमय भव-उपाधियों का नाश होकर भगवान् में तीव्र रति का उदय हो जाता है ।" 'स्कन्दपुराण' में उल्लेख है—"शंख, चक्र, गदा और पद्म के चिन्ह से युक्त शरीर वाले, सिर पर तुलसीमंजरी धारण किए तथा गोपीचन्दन लगाए हुए भक्त का यदि एक बार भी दर्शन हो जाय तो फिर पाप कैसे रह सकता है ?" श्रीमद्भागवत (१.१६.३३) की उक्ति है, "जिनके स्मरणमात्र से घर-परिवार शुद्ध हो जाता है, उन भक्तों के दर्शन, स्पर्श, चरण-परवारने, आसन देने तथा सेवा करने से होने वाले पुण्य का तो कहना ही क्या है ।" 'आदिपुराण' में स्वयं श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "हे पार्थ ! जो अपने को मेरा भक्त कहता है, वह मेरा भक्त नहीं है। जो मेरे भक्त का भक्त है, वही मेरा यथार्थ भक्त है ।" कोई भी अपने निजी प्रयास से भगवान् को प्राप्त नहीं कर सकता । उनकी प्राप्ति उनके शुद्धभक्तों के माध्यम से ही होती है । अतएव वैष्णव आचार में पहली क्रिया भक्त को गुरु बनाकर उसका सेवन करना है । श्रील रूप गोस्वामी पुष्टि करते हैं कि भक्तिरसामृतसिन्धु में नाना शास्त्रों से समाहृत सारे उद्धरण महान् आचार्यों और भगवद्भक्तों को मान्य हैं। वैभव-महोत्सव पद्मपुराण में कहा गया है कि अपने वैभव के अनुसार सभी को भगवान् के सब उत्सवों और जयंतियों का आयोजन करना चाहिए । इनमें से ऊर्जव्रत का बड़ा माहात्म्य है। यह ऊर्जव्रत कार्तिक में मनाया जाता

६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु है। वृन्दावन में भगवान् के दामोदर रूप की अर्चना का विशेष आयोजन होता है। दामोदर नाम का सम्बन्ध श्रीकृष्ण की ऊखल-बन्धन लीला से है। कहा जाता है जैसे भगवान् दामोदर अपने भक्तों को अतिशय प्रिय हैं, वैसे ही दामोदर अथवा कार्तिक मास भी है। कार्तिक में ऊर्जव्रत की भक्ति का साधन विशेषतः मथुरा में करना चाहिए। बहुत से भक्त अद्यावधि इसका पालन करते हैं। वे कार्तिक में मथुरा अथवा वृन्दावन में वास करते हुए भक्तियोग का साधन करते हैं। पद्मपुराण में आया है, "अन्य स्थानों पर सेवा करने वाले को श्रीकृष्ण भोग और मोक्ष तो दे सकते हैं पर भक्ति नहीं देते, क्योंकि वह (भक्ति) भगवान् को वश में कर लेने वाली है। किन्तु मथुरा में कार्तिक मास में एक बार भी भगवान् दामोदर की सेवा कर लेने से मनुष्यों को वह भक्ति तत्काल ही प्राप्त हो जाती है। फिर उन्हें मुक्ति-भुक्ति की इच्छा नहीं रहती, वे केवल शुद्धभक्ति चाहते हैं।" तात्पर्य यह है कि यथार्थ उत्कण्ठा से रहित साधारण मनुष्यों को भगवान् अपनी भक्ति नहीं देते। परन्तु ऐसे व्यक्ति भी यदि कार्तिक मास में मथुरा में विधि से भक्ति का साधन करें तो वे सुगमता से भगवत्सेवा प्राप्त कर लेते हैं। जन्मदिन-यात्रा भगवान् के जन्मोत्सव आदि दिव्य क्रियाओं के सम्बन्ध में 'भविष्य- पुराण में उल्लेख है—"हे जनार्दन ! जिस दिन देवकी से आप प्रकट हुए, वह दिन बताइए, जिससे उस दिन हम महोत्सव मनायें। हे केशव ! हम आपके पूर्णतः शरणागत जन आपको इन महोत्सवों के द्वारा प्रसन्न करना चाहते हैं।" 'भविष्यपुराण' का यह वाक्य इस बात का प्रमाण है कि भगवत्- महोत्सव मनाने वाला अवश्य भगवान् की प्रीति-लाभ करता है। प्रगाढ़ भक्ति से श्रीमूर्त्ति-सेवन 'आदिपुराण' में उल्लेख है—"जो पुरुष निरन्तर नामकीर्तन और भगवत्सेवा में तन्मय होकर दिव्य सुख का आस्वादन करता है, वह भक्ति का पात्र है, उसे केवल मुक्ति कभी नहीं दी जाती।" मुक्ति का अर्थ है—भवबन्धन से छूट जाना। मुक्त हो जाने पर प्राकृत-जगत् में फिर जन्म नहीं लेना पड़ता। निर्विशेषवादी भगवान् में लीन होकर अपने स्वरूप को नष्ट करना चाहते हैं। परन्तु श्रीमद्भागवत

भक्ति के अंग (२) [ ६१ ] के अनुसार मुक्ति तो अपनी स्वाभाविक स्थिति को फिर से पा लेने की केवल प्रारम्भिक दशा है। भगवान् की भक्ति करना ही जीवमात्र की स्वाभाविक स्थिति है। 'आदिपुराण' के वाक्य से ज्ञान होता है कि भक्त केवल भक्ति करने में सन्तोष मानता है। वह भवबन्धन से कोई सी मुक्ति नहीं चाहता। भाव यह है कि जो भक्ति के परायण है वह भवबन्धन में नहीं है, चाहे ऐसा प्रतीत भले ही हो। भक्तगोष्ठी में श्रीमद्भागवत का आस्वादन श्रीमद्भागवत वैदिकज्ञानरूपी कल्पवृक्ष का परिपक्व अमृतफल है। वेद शब्द ज्ञान के सम्पूर्ण समवाय का वाचक है। मानवसमाज के लिए जिस भी ज्ञान की अपेक्षा है, वह सब श्रीमद्भागवत में पूर्ण रूप से प्राप्त है। वैदिक शास्त्रों में समाजशास्त्र, राजनीति, आयुर्वेद, धनुर्वेद आदि ज्ञान के अनेक वर्ग हैं। ज्ञान के इन सभी वर्गों का वेदों में सांगोपांग प्रतिपादन हुआ है। वेद अध्यात्मविद्या में पूर्ण हैं और श्रीमद्भागवत को इस वेद रूप कल्पवृक्ष का परिपक्व अमृतफल कहा गया है। किसी भी वृक्ष की महिमा उसके फलों से ही होती है। उदाहरणार्थ, आम का पेड़ बड़ा मूल्यवान् समझा जाता है क्योंकि आम फलों का राजा है। पका हुआ आम उस वृक्ष का सर्वोत्तम उपहार है। श्रीमद्भागवत भी इसी प्रकार वेदकल्पतरु का पक्व फल हैं। जैसे तोते की चोंच से कटा हुआ फल अधिक मधुर हो जाता है, वैसे ही शुकदेव गोस्वामी के दिव्य मुखारविन्द से गायी जा कर भागवती कथा भी अधिक रसमय़ी हो गयी है। श्रीमद्भागवत को अखण्ड शिष्यपरम्परा से ग्रहण करना चाहिए। पेड़ पर चढ़े मनुष्यों द्वारा एक शाखा से दूसरी शाखा पर क्रम से उतर कर भूमि पर गिरा हुआ पक्व फल नष्ट नहीं होता। परम्परा से ग्रहण करने पर श्रीमद्भागवत भी अखण्ड (अविकृत) रहती है। भगवद्गीता में उल्लेख है कि दिव्यज्ञान परम्परा से ही हो सकता है। शास्त्र के यथार्थ प्रयोजन को जानने वाले प्रामाणिक आचार्य ही ज्ञान का संचार कर सकते हैं। भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने कहा है कि श्रीमद्भागवत को भागवत पुरुष के मुख से सीखना चाहिए। भागवत का अर्थ है—"भगवान् का।" अतः भक्त को भी भागवत कहा जाता है और भगवान् की भक्ति से सम्बन्धित ग्रन्थ को भी भागवत कहा जाता है। श्रीचैतन्य महाप्रभु का आग्रह है कि श्रीमद्भागवत का यथार्थ रसास्वादन करने के लिए उसे

६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु भागवतपुरुष के मुखपद्म से ही सुने । श्रीमद्भागवत तो वास्तव में जीवन्मुक्तों के लिए भी आस्वाद्य हैं। स्वयं शुकदेव गोस्वामी ने कहा है कि यद्यपि वे माँ के गर्भ से मुक्त थे, परन्तु श्रीमद्भागवत का रसपान करने पर महा- भागवत भक्त बने। अतएव जो कृष्णभावनाभावित होने का अभिलाषी हो, वह भक्तगोष्ठी में श्रीमद्भागवत की कथा का आस्वादन करे। श्रीमद्भागवत (२.१.६) में शुकदेव गोस्वामी कहते हैं कि वे निर्विशेष ब्रह्म में अत्यन्त निष्ठ थे, परन्तु पिता व्यासदेव के मुख से जब उन्होंने श्रीभगवान् की दिव्य लीलाकथा सुनी तो श्रीमद्भागवत में अतिशय अनु- रक्त हो गए। व्यासदेव भी आत्मज्ञानी थे और इस प्रकार दिव्यज्ञान की अपनी इस प्रौढ़ रचना को उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से शुकदेव गोस्वामी को प्रदान किया। शुद्धभक्तों का संग शुद्धभक्तों की गोष्ठी में श्रीमद्भागवत की वार्ता का माहात्म्य शौनक मुनि ने नैमिषारण्य की सभा में सूत गोस्वामी के सामने अभिव्यक्त किया है। शुद्धभक्त के क्षणभर के सत्संग की इतनी अधिक महिमा है कि स्वर्ग- मोक्षदायक पुण्य भी उसकी तुलना नहीं कर सकते। भाव यह है कि श्रीमद्- भागवत के अनुरागीजन किसी प्रकार का स्वर्ग अथवा निर्विशेषवादियों द्वारा चिर अभिलाषित मुक्ति नहीं चाहते। अस्तु, शुद्धभक्त के सत्संग के दिव्य माहात्म्य के समान कोई भी प्राकृतसुख नहीं हो सकता। 'हरिभक्तिसुधोदय' में प्रह्लाद महाराज और उनके पिता हिरण्यक- शिपु में एक संवाद है। वहाँ हिरण्यकशिपु प्रह्लाद से कहता है, "हे वत्स ! संग की बड़ी महिमा है। मनुष्य जिसका संग करता है, मणि के समान वह उसके गुण को धारण कर लेता है।" इस नियम के अनुसार यदि हम सुमन जैसे निर्मल भगवद्भक्तों का संग करेंगे और यदि हमारा हृदय स्वच्छ होगा तो हमसे भी वही कर्म बनेंगे। एक सन्दर्भ में एक अन्य दृष्टान्त यह है—यदि मनुष्य समर्थ है और स्त्री भी रुग्ण नहीं है तो दोनों के संग से गर्भाधान हो जायगा। इसी प्रकार, यदि अध्यात्मविद्या के दाता और ग्राहक दोनों सच्चे अधिकारी हैं तो अच्छा परिणाम होगा। भगवन्नाम का कीर्तन श्रीमद्भागवत (२.१.११) में हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे महामन्त्र के कीर्तन की बड़ी महिमा

भक्ति के अंग (२) [ ६३ है । शुकदेव गोस्वामी परीक्षित महाराज से कहते हैं—"हे राजन ! यदि हरेकृष्ण महामन्त्र के कीर्तन में किसी का सहज अनुराग हो तो समझना चाहिए कि वह परम संसिद्धि को प्राप्त हो गया है ।" यह विशेष रूप से उल्लेख है कि कर्मफल के अभिलाषी सकाम कर्मी, परमेश्वर से एक होने की इच्छा वाले मुमुक्षु तथा सिद्धिकामी योगी केवल हरेकृष्ण महामन्त्र के कीर्तन से सम्पूर्ण संसिद्धियों को पा सकते हैं । शुकदेवजी ने इस कथन को 'निर्णीत' अर्थात् 'निश्चित' बताया है । शुकदेव मुक्तपुरुष थे; वे ऐसे किसी मत को स्वीकार नहीं करते, जो निर्णीत (सिद्ध) न हुआ हो । उन्होंने इस निर्णय पर बल दिया है कि जो मनुष्य दृढ़ता और स्थिरता से हरे- कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने लगा है, वह सकामकर्म, मनोधर्म और ध्यानयोग को लाँघ चुका है । 'आदिपुराण' में श्रीकृष्ण ने भी यही कहा है । वे अर्जुन से कहते हैं—"हे अर्जुन ! जो मेरे दिव्य नाम का गान करता है, वह मेरे ही सांनिध्य में रहता है । हे सखे ! मैं सत्य कहता हूँ । वह मुझे खरीद लेता है ।" 'पद्मपुराण' में उल्लेख है, "जिसने हजारों जन्मों तक भगवान् वासुदेव की सेवा की है, उसी की जिह्वा पर हरेकृष्ण महामन्त्र विराजता है ।" पद्मपुराण में कहा है, "भगवान् के पावन नाम और स्वयं भगवान् में कुछ भी भेद नहीं है । अतः भगवन्नाम भगवान् के समान ही पूर्ण, शुद्ध एवं नित्यमुक्त है । चैतन्यरसविग्रह कृष्णनाम चिन्तामणि-स्वरूप है; वह कोई प्राकृत ध्वनि नहीं है और न विकारी है ।" अतः जिसने अपनी इन्द्रियों को शुद्ध नहीं कर लिया है, ऐसा पुरुष कृष्णनाम का निरपराध उच्चारण नहीं कर सकता । भाव यह है कि प्राकृत विकारमयी कुंठित इन्द्रियाँ हरे- कृष्ण महामन्त्र का अच्छी प्रकार से उच्चारण नहीं कर सकतीं । परन्तु इस कीर्तन-पद्धति का सेवन करने से अन्तःकरण की शुद्धि होती है, जिससे अति शीघ्र अपराधरहित जप होने लगता है । भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु का आग्रह है कि मल से चित्तरूप दर्पण को स्वच्छ करने के लिए सब लोग हरेकृष्ण महामन्त्र का जप-कीर्तन करें । हृदयशुद्धि हो जाने पर ही कृष्णनाम की यथार्थ महिमा समझ में आती है । जो हृदय को अशुद्ध बनाए रखना चाहते हैं, वे हरेकृष्ण जप के दिव्य लाभ से वंचित रह जाते हैं । अतः भगवान् के प्रति सेवाभाव का उत्साह के साथ विकास करना चाहिए, क्योंकि उससे वह निरपराध जप कर सकेगा । इसलिए गुरुदेव के मार्गदर्शन में शिष्य को एक साथ भगवत्सेवा और हरे- कृष्ण जप करने की शिक्षा दी जाती है । हृदय में स्वरूपभूत रागानुगा

२. दक्षिण विभाग: विभाव, अनुभाव, सात्त्विक व व्यभिचारी भाव

६४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सेवाभाव की उद्भावना होते ही वह महामन्त्र कृष्णनाम के दिव्य स्वरूप को जान जाता है । श्रीमथुरामण्डल में स्थिति ‘पद्मपुराण’ में मथुरामण्डल, द्वारका आदि में वास के सम्बन्ध में एक वाक्य है, “अन्य तीर्थों की यात्रा का मुक्ति ही महाफल है । परन्तु यह मुक्ति परम संसिद्धि नहीं है । मुक्त होने के बाद भगवद्भक्ति के परायण होना है । ब्रह्मभूत हो जाने पर ही भक्तियोग की प्राप्ति होती है । अतः प्रेममयी भगवद्भक्ति ही जीवन का परम लक्ष्य है और क्षणभर के लिए भी मथुरावास करने वाले के लिए यह अत्यन्त सुलभ हो जाती है ।” आगे कहा है, “ऐसा कौन बुद्धिमान है जो मथुरा का सेवन नहीं करेगा ? मथुरा सकामकर्मियों और परमब्रह्म से एक होने जाने के अभि- लाषी मुमुक्षुओं को सर्वाभीष्ट का दान करने वाली है । फिर भक्ति चाहने वाले भक्तों को भक्ति क्यों नहीं देगी, अर्थात् अवश्य देगी ।” वैदिक शास्त्रों में अन्यत्र कहा है—“अहो ! वैकुण्ठ से भी अतिशय महिमामयी यह मथुरा कितनी धन्या है । यहाँ एक दिन रहने से भी हृदय में कृष्णभक्ति उदित हो जाती है ।”

अध्याय १३ भक्ति के पाँच शक्तिशाली साधन श्रील रूप गोस्वामी का कथन है कि मथुरावास, मूर्ति-अर्चन, श्रीमद्भागवत का आस्वादन, भक्तसेवन तथा हरेकृष्ण महामन्त्र का कीर्तन से भक्ति के ये पाँच साधन इतने शक्तिशाली हैं कि इनमें से किसी एक से तनिक सा सम्बन्ध भी कनिष्ठ भक्त तक में भक्तिभाव को उद्भावित कर देता है । श्रीमूर्त्ति-अर्चन के सम्बन्ध में रूप गोस्वामी लिखते हैं—"हे सखे ! यदि तुम्हें प्राकृत-जगत् में अपने बन्धु-बान्धवों की कुछ भी इच्छा है तो केशीघाट के समीप मुस्कराते हुए त्रिभंगललित मुद्रा में खड़े, तिरछी और दूर तक फैली हुई दृष्टि वाले, अधर पर वेणुवादन करते हुए और मोरपिच्छ के साथ चन्द्रके से चमकते हुए गोविन्द नामक कृष्णरूप को मत देखना ।" इस श्लोक का तात्पर्य यह है कि यदि कोई घर में अर्चना करता हुआ श्रीमूर्त्ति के अनुरक्त हो गया तो तथाकथित घर, परिवार और समाज की सुध-बुध भूल कर उनकी भक्ति में ही डूब जायगा । प्रत्येक गृहस्थ का प्रधान कर्तव्य है कि घर में कृष्णमूर्ति स्थापित करके अपने सब बन्धु-बान्धवों के साथ उनकी आराधना करे । इससे सब क्लब, सिनेमा, नृत्य आदि में जाने और धूम्रपान, मद्यपान जैसे अनर्थों से बच जायेंगे । घर में मूर्ति-अर्चना पर बल देने से इन सब अनर्थों को दूर किया जा सकता है । रूप गोस्वामी आगे लिखते हैं—"हे मूर्ख सखे ! जान पड़ता है कि तुम श्रीमद्भागवत की पावन पद्यावली का कुछ-कुछ श्रवण कर चुके हो, जिसमें सकामधर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सब का निरादर है । अब क्रमशः भगवल्लीलामय दसवें स्कन्ध के श्लोक तुम्हारे कर्णविवरों में प्रविष्ट होकर हृदय में अमृत का संचार करेंगे ।" श्रीमद्भागवत के उपक्रम में ही कहा गया है कि जब तक कोई

६६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु सकामकर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को कूड़े-करकट की भांति फेंक नहीं देता, तब तक वह श्रीमद्भागवत को हृदयंगम नहीं कर सकता । भागवत केवल भगवद्भक्ति को विषय करती है। अतः त्यागवृत्ति से भागवत का स्वाध्याय करने वाला ही दसवें स्कन्ध में वर्णित भगवच्चरित को समझ सकता है। भाव यह है कि भागवत में अनुराग के बिना दसवें स्कन्ध के रासलीला आदि परम गोपनीय प्रसंगों को समझने का प्रयास न करे। श्रीमद्भागवत के यथार्थ रूप का आस्वादन शुद्धभक्ति में स्थित होने पर ही हो सकता है। श्रील रूप गोस्वामी के पूर्वोक्त दोनों श्लोकों में अलंकारों का प्रयोग है, जो परोक्ष रूप से सांसारिक संग, मित्रता और प्रेम की भर्त्सना करते हैं। लोग प्रायः समाज, मित्रता और प्रेम की ओर आकृष्ट रहते हैं और इन प्राकृत दोषों के विकास के लिए व्यापक आयोजन करते हैं। परन्तु श्रीराधाकृष्ण मूर्ति के दिव्य दर्शन से विषयसंग के ये सब उद्यम समाप्त हो जाते हैं। श्रीरूप गोस्वामी के श्लोक में विरोधाभास अलंकार है; लगता है मानो वे मित्रता, प्रेम आदि प्राकृत संगों की प्रशंसा और गोविन्द मूर्ति के दर्शन की निन्दा कर रहे हों। यह अलंकार इस प्रकार का होता है कि जो वस्तु प्रशंसित प्रतीत होती है, उसकी वास्तव में निन्दा हुई होती है और प्रशंसा के योग्य वस्तु निन्दित हुई लगती है । श्लोक का वास्तविक तात्पर्य यह है कि यदि कोई प्राकृत मित्रता, प्रेम और समाज रूपी अनर्थों को भुलाना चाहता हो तो गोविन्दरूप का दर्शन अवश्य करे । श्रील रूप गोस्वामी ने इसी भांति दिव्य कृष्णकथा का वर्णन किया है। एक भक्त के हृदय का उद्गार है, “बड़ा आश्चर्य है कि अपने आंसुओं से घुले हुए भगवान् के इस रूप को जबसे मैंने देखा है, मेरा तन पुलकावली से मण्डित हो गया है और अपने सांसारिक कर्तव्य को भूल बैठा हूँ। उन्हें देखकर अब मेरा मन चुपचाप घर में नहीं लगता है। न जाने क्यों सदा उनके पास जाने को उत्कण्ठित रहता हूँ।” इस वाक्य का तात्पर्य यह है कि सौभाग्य से शुद्धभक्त का संग होने पर कृष्णकथा सुनने और कृष्ण- विषयक जानने को, अर्थात् पूर्णतः कृष्णभावनाभावित बनने के लिए उत्कण्ठित हो जाना चाहिए । इसी प्रकार, महामन्त्र के श्रवण-कीर्तन के सम्बन्ध में एक वाक्य है—“कहा जाता है कि सन्तजनों को नारदजी के करों में बज रही वीणा की दिव्यध्वनि कर्णगोचर होती है। जब से इस शीतल नाद ने मेरे कानों में प्रवेश किया है, मैं निरन्तर श्रीभगवान् की संनिधि अनुभव कर रहा हूँ,

भक्तियोग के पाँच शक्तिशाली साधन [ ६७ और किसी अनिर्वचनीय अपूर्व दशा को धारण करता हुआ मेरा मन विषयवासना से एकदम शान्त-सा हो चला है।" पुनः मथुरामण्डल के माहात्म्य का प्रतिपादन करते हैं, "श्यामल यमुना तट पर त्रिभंगललित मुद्रा में खड़े श्यामसुन्दर की मुझे स्मृति हो रही है। जहाँ अपार शोभा छिटकाती हुई, खिले हुए कदम्ब के ऊपर बैठ कर गुंजारते हुए भौंरों से युक्त, निरवधि मधुरिमा से मण्डित यह वनश्री मेरे मन में न जाने किस अनिर्वचनीय भक्तिभाव को उदित कर रही है।" श्रील रूप गोस्वामी द्वारा वर्णित मथुरा-वृन्दावन की इस असमोर्ध्व माधुरी का अनुभव अभक्तों तक को हो सकता है। यमुना के किनारे चौरासी कोस के मथुरामण्डल के लीलास्थल इतने सुन्दर हैं कि एक बार जो वहाँ चला जायगा वह फिर कभी इस प्राकृत-जगत् में लौटना नहीं चाहेगा। श्रीरूप गोस्वामी के ये वाक्य मथुरा-वृन्दावन के यथार्थ स्वरूप की अनुभूति से ओतप्रोत हैं। इन सब चिद्गुणों से सिद्ध होता है कि मथुरा-वृन्दावन की स्थिति संसार से लोकोत्तर है। अन्यथा, इन स्थानों में जाने पर हृदय में दिव्य भावों की उद्भावना नहीं होती। मथुरा-वृन्दावन में चरण रखते ही तत्काल ये भाव निश्चित रूप से उद्दिष्ट हो उठते हैं। इन भक्तियोग विषयक वाक्यों को सुनकर कभी-कभी प्रतीत होता है कि फल बढ़ा-चढ़ा कर कहा गया है। परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। यद्यपि यह सब के लिए सम्भव नहीं है, परन्तु शास्त्रों का प्रमाण है कि बहुत से भक्तों को ऐसे सत्संग का तत्काल फल हुआ है। उदाहरणार्थ, मन्दिर में सौरभ का आघ्राण करने मात्र से सनकादि चारों कुमार तत्काल भक्त बन गए। बिल्वमंगल ठाकुर कृष्णकथा को सुनते ही वेश्या को त्याग कर वृन्दावन को चल पड़े और परम वैष्णव बन गए। अतः ये वाक्य अतिश- योक्ति अथवा गल्प नहीं हैं। ये वास्तविक तथ्य हैं, परन्तु ये विशेष भक्तों के लिए ही प्रकट होते हैं, सब पर नहीं घटते। ये वर्णन चाहे बढ़े-चढ़े लगें, पर अपने ध्यान को नश्वर विषय-सौन्दर्य से हटाकर शाश्वत् कृष्ण- भावना माधुर्य में लगाने के लिए हमें इन वर्णनों को इसी रूप में अंगीकार करना चाहिए। जो पहले ही कृष्णभावनाभावित हैं, उसके लिए इनमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है। कतिपय विद्वानों का मत है कि केवल वर्णाश्रम-धर्म का पालन करने से भी शनैः-शनैः भक्तियोग के साधन की संसिद्धि हो सकती है। परन्तु महान् आचार्य इसे नहीं मानते। रामानन्द राय के साथ भक्ति के क्रमिक विकास से सम्बन्धित वार्ता में भगवान् चैतन्य महाप्रभु ने भी इस विचार का

६८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु निराकरण किया है। उन्होंने रामानन्द राय द्वारा प्रतिपादित वर्णाश्रमधर्म की महिमा को अस्वीकार कर दिया। वे कहते हैं कि वर्ण और आश्रम का यह आचरण केवल बाह्य है। इससे ऊँचा सिद्धान्त भी है। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं अन्य सब साधनों को त्याग कर कृष्णभावना का पथ अंगीकार करने के लिए जीव का आह्वान किया है। जीवन की परम संसिद्धि का एकमात्र यही मार्ग है। श्रीमद्भागवत (११.२०.६) में भी भगवान् कहते हैं, "वर्ण और आश्रम के कर्तव्यों का पालन तभी तक करे, जब तक मेरी लीला कथा में राग और आसक्ति नहीं हो जाती।" भाव यह है कि वर्णाश्रमधर्मरूपी कर्मकाण्ड अर्थ, इन्द्रियतृप्ति और मोक्ष के लिए है। ये सब उनके लिए हैं, जो कृष्णभावनाभावित नहीं हुए हैं। वास्तव में शास्त्रों में इन सब क्रियाओं का विधान जीव को कृष्णभावना तक लाने के लिए ही है। जिसे श्रीकृष्ण के लिए रागानुगा आसक्ति हो गयी है, उसे शास्त्रविहित कर्तव्यों से प्रयोजन नहीं रहता।

अध्याय १४ भक्ति की योग्यता कुछ विद्वानों का कहना है कि ज्ञान-वैराग्य भक्ति के अंग हैं; परन्तु यह सत्य नहीं है। वास्तव में भक्ति में प्रवेश के लिए उपयोगी होने पर ज्ञान-वैराग्य को प्रारम्भ में स्वीकार किया जा सकता हैं; पर अन्त में वह अवस्था भी आती है जब उन्हें त्याग दिया जाता है। भक्ति की लालसा के अतिरिक्त भक्ति का और कोई हेतु नहीं है। इसके लिए केवल सरल हृदय चाहिए। दक्ष भक्तों के मत में मनोधर्म (ज्ञान) और योगाभ्यास के कृत्रिम वैराग्य का मार्ग भवबन्धन से मुक्ति के लिए उपयुक्त हो सकता है; परन्तु ये दोनों चित्त को उत्तरोत्तर कठोर बनाने वाले हैं। इनके द्वारा भक्तिभाव का बिल्कुल भी वर्धन नहीं हो सकता। अतः भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में प्रवेश पाने के लिए ये साधन अनुकूल नहीं हैं। वस्तुतः कृष्णभावना- भक्तियोग ही भक्तियोग में प्रगति का एकमात्र मार्ग है। भक्ति अद्वय है, वही कारण है और वही कार्य है। श्रीभगवान् सबके परम कारण हैं। उन अद्वय की प्राप्ति के लिए भक्ति का अद्वय मार्ग ही अंगीकार करना होगा । भगवद्गीता में स्वयं श्रीभगवान् इसकी पुष्टि करते हैं, "केवल भक्ति से ही मेरा तत्त्व जाना जा सकता है।" गीतोपदेश के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, "तू मेरा भक्त है, इसलिए तेरे से यह सम्पूर्ण रहस्य कहूँगा।" वैदिकज्ञान का अन्तिम लाभ भगवान् के तत्त्व को जानना है और उनके वैकुण्ठ धाम में प्रवेश का पथ है भक्तियोग। सभी प्रामाणिक शास्त्र इसमें एकमत हैं। मनोधर्मी लोग भक्तिपथ का तिरस्कार करके दूसरों को दार्शनिक अन्वेषण में परास्त करने में ही लगे रहते हैं, इसलिए उनके हृदय में भक्तिभाव प्रकट नहीं होता। श्रीमद्भागवत (११.२०.३१) में श्रीकृष्ण कहते हैं, "हे उद्धव ! मेरे सच्चे भक्त के लिए ज्ञान-वैराग्य प्रायः श्रेयदायक नहीं होते। मेरा भक्त

१०० ] भक्तिरसामृतसिन्धु अपनी भक्ति के प्रभाव से सकामकमों, तप, त्याग, दान, योग, ज्ञान, वैराग्य आदि के लाभ को अपने-आप प्राप्त कर लेता है; परतत्त्व के पर्याप्त ज्ञान से युक्त हो जाता है।" यह भक्ति की कसौटी है। भक्त अन्धकार में नहीं रहता भगवान् स्वयं विशेष कृपा का परिवर्षण करते हुए उसे अन्तर से प्रबुद्ध करते हैं। श्रीमद्भागवत (११.२०.३२-३३) में श्रीकृष्ण उद्धव से आगे कहते हैं, "हे सखे ! मेरी सेवा में अनुरक्त मेरे भक्तों को तप, त्याग, दान, ज्ञान, वैराग्य आदि सम्पूर्ण सत्कर्मों का फल सुलभ हो जाता है। इस पर भी मेरी भक्ति के अतिरिक्त वे और कुछ नहीं चाहते। यदि कोई भक्त स्वर्ग में या मेरे वैकुण्ठधाम को जाना चाहे तो मेरी अहैतुकी कृपा उस से सारी कामनायें सहज ही पूरी हो सकती हैं।" कृष्णभावना के सेवन में लगे पुरुष में यदि कुछ विषयवासना शेष भी हो तो सद्गुरु के आदेशानुसार नियमित रूप से भक्ति का साधन करते रहने से वह इस प्रवृत्ति से शीघ्र मुक्त हो जाता है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि प्राकृत इन्द्रियतृप्ति में आसक्ति नहीं होनी चाहिए; परन्तु श्रीकृष्ण से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु का ग्रहण करे। जैसे भोजन आवश्यक है और यह स्वाभाविक ही है कि रसना स्वा- दिष्ट अन्न चाहती है। अतः जिह्वातृप्ति के स्थान पर श्रीकृष्ण की प्रीति के लिए कुछ स्वादु पदार्थ बनाए जा सकते हैं और श्रीकृष्ण को उन का अर्पण किया जा सकता है। तब यह वैराग्य हो जायगा। स्वादिष्ट पदार्थ बनायें, परन्तु श्रीकृष्ण को अर्पण किए बिना उन्हें खाना नहीं चाहिए। जो श्रीकृष्ण को अर्पित न हुए हों, उन पदार्थों को ग्रहण न करने का यह नियम वास्तव में वैराग्य है। साथ ही, इस वैराग्य के द्वारा इन्द्रियों के वेग को शान्त किया जा सकता है। निर्विशेषवादी, जो सब प्राकृत वस्तुओं से बचना चाहते हैं, चाहे कितना भी तप-त्याग क्यों न करें, पर भगवत्सेवा करने का अवसर कभी नहीं पाते। अतः उनका वैराग्य संसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ भक्ति से सम्बन्धरहित कृत्रिम वैराग्य का अभ्यास करते हुए निर्विशेषवादी फिर भवबन्धन में गिर गए हैं। वर्तमान काल में भी बहुत से नामधारी त्यागी हैं, जो संन्यास लेकर 'ब्रह्म सत्यं' का दम्भ करते हैं। इस प्रकार वे प्राकृत-जगत् को त्यागने का ढोंग तो करते हैं, परन्तु भक्ति के स्तर तक न पहुँचने के कारण लक्ष्य को नहीं पा सकते और परिणामतः परोपकार; राजनीतिक संघर्ष जैसी प्राकृत क्रियाओं में