भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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करना ध्यान कहलाता है। ध्यान का किसी निर्विशेष अथवा शून्य से कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार ध्यान सदा विष्णुरूप का ही किया जाता है। 'नृसिंहपुराण' में भगवान् के रूप के ध्यान का वर्णन है—"भगवान् के चरणकमलों का ध्यान दिव्य और प्राकृत सुख-दुःख की अनुभूति से सर्वथा परे है। इस ध्यान से परम पापात्मा भी जीवनभर के पापों से छूट सकते हैं।" 'विष्णुधर्म' में भगवद्गुणों के ध्यान के सम्बन्ध में कहा है—"निरन्तर कृष्णभावनाभावित रहकर भगवान् के दिव्य गुणों का स्मरण करने वाले जन सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर वैकुण्ठ-गमन के योग्य बन जाते हैं।" भाव यह है कि शुद्ध हुए बिना कोई भगवद्धाम में प्रवेश नहीं पा सकता और भगवान् के चिद्गुण, रूप, लीला, आदि का स्मरण रखने मात्र से सब प्रकार के पापों से बचा जा सकता है। 'पद्मपुराण' में क्रीड़ाध्यान का उल्लेख है—"सर्वमाधुर्य सार, परम अद्भुत और ललित हरिचरित्रका जो निरन्तर ध्यान करता है, वह भव- बन्धन से छूट जाता है।" सेवाध्यान कतिपय शास्त्रों में प्रमाण हैं कि जो मनुष्य केवल सेवाध्यान भी करता है, उसकी भी सर्वाभीष्ट सिद्धि होती है और वह अपने नेत्रों से भगवान् का साक्षात्कार करता है। इस सन्दर्भ में ब्रह्मवैवर्त पुराण के अन्तर्गत एक सुन्दर कथा है। दक्षिण भारत के प्रतिष्ठानपुर में एक ब्राह्मण रहता था। वह सम्पन्न तो नहीं था परन्तु यह सोचकर सदा आत्मतृप्त रहता था कि पूर्वजन्म के पाप और श्रीकृष्ण की इच्छा के कारण ही उसे पर्याप्त धन- वैभव नहीं मिला। अतः उसे अपनी दरिद्रता की लेशमात्र भी ग्लानि नहीं थी; वह बड़ी शान्ति से रहता था। वह परम उदार था और कभी-कभी महान् आत्मज्ञानियों के प्रवचन सुनने जाता। ऐसी ही एक सभा में, जहाँ वह बड़ी श्रद्धा से वैष्णव आचार का श्रवण कर रहा था, उसने सुना कि ये क्रियायें मानससेवा के रूप में भी की जा सकती हैं। तात्पर्य यह है कि यदि कोई प्रकट रूप में वैष्णव क्रियाओं को न कर सके तो वह सेवा का ध्यान ही करे। ऐसा करने से वही फल प्राप्त होगा । ब्राह्मण अकिंचिन था, इसलिए उसने निश्चय किया कि वह बड़े भारी ऐश्वर्य के साथ भगवान् की सेवा करने का ध्यान ही करेगा। वह इस प्रकार करने लगा। कभी वह