भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु 'वराहपुराण' में श्रीकृष्णमूर्ति के स्पर्श की महिमा है। कोई भक्त कहता है, “हे वसुन्धरे ! वृन्दावन में जो श्रीगोविन्ददेव का दर्शन कर लेता है, वह यमपाश में नहीं पड़ता, वरन् देवगति को जाता है।” भाव यह है कि यदि कोई साधारण व्यक्ति भी कुतूहलवश वृन्दावन जाकर दैववश गोविन्दजी का दर्शन कर ले तो उसके लिए वैकुण्ठ नहीं तो कम से कम उच्च लोकों की प्राप्ति तो निश्चित है। अतः वृन्दावन में गोविन्द मूर्ति के दर्शन मात्र से महान् पुण्य होता है। आरति दर्शन 'स्कन्दपुराण' में मूर्ति की आरति दर्शन का यह माहात्म्य है— “आरति के समय भगवान् के मुखारविन्द का दर्शन करने वाले के करोड़ों वर्षों से संचित पापपुंज भस्म हो जाते हैं। उसके ब्रह्महत्या जैसे जघन्य पाप भी नहीं ठहर पाते।” उत्सवों का आयोजन जैसा पूर्वकथन है, श्रीकृष्णजन्माष्टमी, रामनवमी, प्रमुख वैष्णवों की जन्मतिथि, झूलनयात्रा, दोलयात्रा आदि महोत्सवों को अवश्य मनाना चाहिए। उत्सव में भगवान् को रथ पर विराजमान किया जाता है और फिर नगर के विभिन्न मार्गों पर उनकी शोभायात्रा निकाली जाती है, जिससे लोगों को मन्दिर में दर्शन का लाभ सुलभ हो जाय। 'भविष्यपुराण' कहता है—“जो चाण्डाल आदि कौतुक में भी रथ पर विराजमान श्रीभगवान् को देख लेते हैं, वे विष्णु-पार्षद बन जाते हैं।” 'अग्निपुराण' का वाक्य है, “जो मन्दिर में श्रीमूर्र्ति की पूजा को देखकर प्रसन्न होता है, वह पंचरात्र में वर्णित क्रियायोग के फल को प्राप्त करता है।” क्रियायोग प्रायः भक्तियोग जैसी अभ्यास की पद्धति है। परन्तु वह विशेष रूप से ध्यानयोगियों के लिए विहित है। भाव यह है कि इस क्रमिक पद्धति से ध्यानयोगी अन्त में भगवद्भक्ति के स्तर पर आरूढ़ हो जाते हैं।