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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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७८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु की वार्ता करते हैं। वहाँ रहकर उन महापुरुषों के मुखचन्द्र से निस्यन्दित कृष्णलीलारससुधा की धाराओं का कर्णपुटों से अहर्निश पान करता रहे । जो अतृप्त होकर निरन्तर इस अमृत का पान करते हैं, उनको भूख-प्यास, भय-शोक और भव-मोह स्पर्श नहीं कर पाते ।" भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु ने भी श्रवण को वर्तमान कलियुग में स्वरूप-साक्षात्कार का साधन बतलाया है। इस काल में पूर्व युगों के विधि- विधानों और वेद-स्वाध्याय का ठीक-ठीक अनुष्ठान सम्भव नहीं रहा है। फिर भी यदि कोई महाभागवतों और आचार्यचरणों द्वारा उच्चरित शब्द- ब्रह्म का श्रवण करे तो केवल इतने से भवरोग शान्त हो जायगा। अतएव भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभु की आज्ञा है कि उन्हीं अधिकारी पुरुषों से श्रवण करे, जो भगवद्भक्त हों। व्यवसायी कथा वाचकों से सुनने का कोई लाभ नहीं। आत्मज्ञानी पुरुषों से सुनने पर चन्द्रमा से निस्यन्दित सुधाधारा जैसी अमृत की कल्लोलिनी नदियां हमारे कर्णरन्ध्रों में प्रविष्ट होंगी। उपरोक्त श्लोक चन्द्रमा के इस अलंकार से युक्त है। जैसा भगवद्गीता में कहा गया है, "कृष्णभावनाभावित हो जाने पर ही विषयी अपनी विषयवासना को लात मार सकता है।" जब तक वह किसी उत्तम कार्य में नहीं लग जाता, तब तक जीव अपने तुच्छ कार्य से विरत नहीं हो सकता। प्राकृत-जगत् में जीव प्रकृति की मायिक क्रियाओं में फँसा पड़ा है, परन्तु श्रीकृष्ण की दिव्य क्रियाओं के आस्वादन का अवसर मिलने पर वह दूसरे सब अल्प सुखों को भूल जाता है। जब श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र के युद्धप्रांगण में बोलते हैं तो विषयी इसे केवल दो मित्रों का साधारण वार्तालाप समझता है, जबकि वास्तव में तो श्रीकृष्ण के मुखचन्द्र से अमृत की कल्लोलिनी सी झरती है। अर्जुन ने इस दिव्यनाद का श्रवण किया और परिणाम में भवरोग के सम्पूर्ण मोह से मुक्त हो गया । श्रीमद्भागवत (१२.३.१५) में उल्लेख है, "उत्तमश्लोक भगवान् श्रीकृष्ण की शुद्धभक्ति के अभिलाषी को नित्य-निरन्तर उनके दिव्य गुणों और चरित का श्रवण करना चाहिए, जिससे हृदय के सारे अमंगल का नाश होता है।" भगवत्कृपा की बाट देखना श्रीमद्भागवत (१०.१४.८) में ही कहा है—"हे नाथ ! जो निरन्तर आपकी अहैतुकी कृपा की प्रतीक्षा में अपने पूर्वकृत पापों को भोगता हुआ