भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 11

६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे आचार्य चरक और सुश्रुत के पश्चात् वाग्भट का काल प्रारम्भ हुआ। महाभारत के समय में आचार्य वाग्भट युधिष्ठिर के प्रधान चिकित्सक थे, ऐसा कुछ लोगों का कहना है। उस समय वाग्भट ने चरक और सुश्रुत के रचित ग्रन्थों के आधार पर 'अष्टांगहृदय' नामक ग्रन्थ रचा। 'अष्टांगहृदय' की महत्ता सूत्रों के लिए अधिक है। अतः समकक्ष होने से चरक, सुश्रुत और वाग्भट ये तीनों 'वृद्धत्रयी' कहे जाते हैं। वाग्भट के पश्चात् उत्तरोत्तर माधवाचार्य, भावमिश्र (प्रस्तुत ग्रन्थकार), शार्ङ्गधर आदि आचार्यों का काल हुआ। आचार्य भावमिश्र भावमिश्र काशी के निवासी थे। आपके पिता का नाम लटकन मिश्र था। सन् १५५० ई. के लगभग में पुर्तगीजों के भारतवर्ष में पदार्पण करने के बाद आपने चिकित्सा सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण प्रस्तुत भावप्रकाश ग्रन्थ का निर्माण किया। इसमें आपने फिरंग आदि नवीन व्याधियों का विस्तृत वर्णन करके उसकी आयुर्वेदिक चिकित्सा में उस युग के प्रचलित ओषधि चीनी मूल को चोपचीनी के नाम से व्यवहृत किया है। किं बहुना, अभी तक प्राचीन ग्रन्थों में जिन द्रव्यों का वर्णन नहीं पाया जाता था, उनका भी आपने शास्त्रीय नाम देकर वैद्यक चिकित्सा में बरतने का महत्त्वपूर्ण प्रथम प्रयास किया है, जिससे आयुर्वेद में आपका एक बहुत बड़ा प्रमुख स्थान है। कई ओषधियों का जैसे—वदक्शानी नास्पाती, खोरा सानी और पारसीक वचा, सुलेमानी, खजूर, अहिफेन और कपूर आदि का आपने इस ग्रन्थ में नया योग दिया है। पञ्चम संस्करण इस संस्करण का सम्पादन तथा परिष्कार डॉ. गंगासहाय पाण्डेय ए. एम. एस., भूतपूर्व अध्यापक—काशी हिन्दूविश्वविद्यालय ने अधिक परिश्रम और मनोयोग से किया है। पाण्डेय जी की लौहलेखनी से इस बार तो निघण्टु भाग का कलेवर ही बदल गया है। अल्प मूल्य में निघण्टु भाग छात्रों को सुलभ हो इस उद्देश्य से निघण्टु भाग का पृथक् संस्करण भी निकाला गया है। निघण्टु भाग की विशेषता प्रस्तुत संस्करण में विमर्श का आद्योन्त परिष्कार, अद्यतन वनौषधि अनुसंधान साहित्य का अन्तर्भाव एवं प्रत्येक वनस्पति का यथाशक्ति असंदिग्ध परिचय देने की चेष्टा की गई है। उन वनस्पतियों के शास्त्रोक्त विशिष्ट आमयिक प्रयोगों का भी यथास्थल उल्लेख किया गया है। संस्कृत के मूल श्लोकों का हिन्दी अनुवाद, भेषज द्रव्यों के भिन्न भारतीय भाषाओं में प्रचलित सही नाम, उनके अंग्रेजी व लैटिन के स्वीकृत नाम, वनस्पतियों के उत्पत्ति स्थान, उनका विशिष्ट परिचय, रासायनिक संगठन आदि का यथाशक्ति सही सही वर्णन दिया गया है। संदिग्ध एवं विवादास्पद स्थलों में विभिन्न विद्वानों के विचार एवं मतभेद के आधार के उल्लेख की चेष्टा की गई है। आशा है विद्वान् वैद्य, चिकित्सक, अध्यापक तथा छात्रों को इस संस्करण से विशेष लाभ होगा। —ब्रह्मशङ्कर शास्त्री