भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४२ का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण कुण्डलियों में देखना चाहिए— जिस वर्ष में 'केतु'— (क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ८६६ (ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ८६७ (ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ८६८ (घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ८६९ (ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ८७० (च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ८७१ (छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ८७२ (ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ८७३ (झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ८७४ (ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ८७५ (ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ८७६ (ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ८७७ ● 'तुला' लग्न में 'सूर्य' 'तुला' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश तुला लग्न : प्रथमभाव : सूर्य शरीर-स्थान में अपने शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित नीच के शनि के प्रभाव से जातक की शरीर में सदा दुर्बलता तथा सौन्दर्य की कमी का अनुभव होता है। वह किसी की गुलामी करने में हानि समझता है। पराक्रम की भी कमी रहती है। सातवीं उच्च दृष्टि से मित्र मंगल की राशि में सप्तम भाव को देखने से स्त्री पक्ष से लाभ होता है। सुन्दर स्त्री मिलती है। भोग- शक्ति तथा व्यवसाय पक्ष को उन्नति होती है। 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश तुला लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का पर्याप्त सुख मिलता है और वह धनी तथा प्रभावशाली भी होता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से पुरातत्व तथा आयु के पक्ष में कुछ कमी बनी रहती है।