भारतकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 334

३४३ 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश तुला लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की भाई-बहिनों के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति अपने बाहु-बल का भरोसा अधिक रखता है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य तथा धर्म में वृद्धि होती है तथा आमदनी अच्छी बनी रहती है। ७७२ 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश तुला लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की भूमि, भवन तथा माता का अपूर्ण सुख रहता है तथा आय के पक्ष में भी कठिनाइयां आती हैं। सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सफलता, यश तथा सम्मान की प्राप्ति होती है। ७७३ 'तुला' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश तुला लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से असंतोषपूर्ण लाभ होता है तथा विद्याध्ययन में भी बड़ी कठिनाइयों से सफलता मिलती है। सातवीं दृष्टि से स्वराशि के एकादश भाव को देखने से बुद्धि-योग का तथा कठिन परिश्रम द्वारा श्रेष्ठ आमदनी का लाभ मिलता है, परन्तु दिमाग में कुछ परेशानियां भी रहती हैं। ७७४