संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* पुरुषोत्तमक्षेत्रमें भगवान् नृसिंह तथा श्वेतमाधवका माहात्म्य * १२९
मर्त्यलोक, पाताल, दिशा, जल, गाँव तथा पर्वत—इन सब स्थानोंमें भगवान्के प्रसादसे मनुष्यकी अबाध गति होती है। इस चराचर जगत्में कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो भक्तवत्सल भगवान् नृसिंहके लिये असाध्य हो। मुनिवरो! सनातन कल्पराज (पूजाकी सर्वश्रेष्ठ विधि) एवं नरसिंहका तत्त्व, जिसे देवता या असुर भी नहीं जानते, तुम्हें बताता हूँ; सुनो। उत्तम साधकको चाहिये कि साग, जौकी लपसी, मूल, फल, खली अथवा सत्तूसे भोजनकी आवश्यकता पूर्ण करे अथवा दूध पीकर रहे। इन्द्रियोंको काबूमें रखकर धर्मपरायण रहे। वन, एकान्त प्रदेश, पर्वत, नदी-संगम, ऊसर, सिद्धक्षेत्र अथवा नृसिंहके मन्दिरमें जाकर या स्वयं स्थापना करके भगवान्की विधिपूर्वक पूजा करे। शुक्ल पक्षकी द्वादशीको उपवास करके जितेन्द्रियभावसे बीस लाख भगवन्नामका जप करे। ऐसा करनेवाला साधक उपपातक और महापातकोंसे युक्त होनेपर भी मुक्त हो जाता है। पहले भगवान् नृसिंहकी प्रदक्षिणा करके चन्दन और धूप आदिके द्वारा उनकी पूजा करे। मस्तक झुकाकर प्रभुको प्रणाम करे तथा उनके माथेपर कपूर और चन्दन मिले हुए चमेलीके फूल चढ़ावे। इससे सिद्धि प्राप्त होती है। किसी भी कार्यमें भगवान्की गति कुण्ठित नहीं होती। ब्रह्मा, रुद्र आदि देवता भी उनके तेजको नहीं सह सकते। फिर संसारमें सिद्ध, गन्धर्व, मानव, दानव, विद्याधर, यक्ष, किंनर और महानागोंकी तो बात ही क्या है। अन्य साधक जिन असुरोंका नाश करनेके लिये मन्त्र-जप करते हैं, वे सब नृसिंहभक्तोंको सूर्यके समान तेजस्वी देखकर तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं। महाबली भगवान् नरसिंह सदा अपने भक्तोंकी रक्षा करते हैं। अतः मुनीश्वरो! समस्त अभिलषित फलोंके दाता महापराक्रमी भगवान् नरसिंहकी सदा भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री, शूद्र और अन्त्यज भी सुरश्रेष्ठ नृसिंहका भक्तिपूर्वक पूजन करके कोटिजन्मोंके पाप और दुःखोंसे मुक्त हो जाते हैं। मनोवाञ्छित फल पाते हैं। देव, गन्धर्व एवं इन्द्रका पद भी प्राप्त कर लेते हैं। एक बार भी भगवान् नरसिंहका भक्तिपूर्वक दर्शन करनेसे करोड़ों जन्मोंके पापों और दुःखोंसे छुटकारा मिल जाता है। संग्राम, संकट, दुर्गमस्थान, चोर-व्याघ्र आदिकी पीड़ा, प्राणसंशय, विष, अग्नि, जल, राजभय, समुद्रभय तथा ग्रह-रोग आदिजनित कष्ट प्राप्त होनेपर जो पुरुष भगवान् नरसिंहका स्मरण करता है, वह सब प्रकारकी आपत्तियोंसे छुटकारा पा जाता है। जैसे सूर्योदय होनेपर महान् अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार भगवान् नरसिंहका दर्शन होनेपर सभी उपद्रव नष्ट हो जाते हैं।
अनन्त नामक वासुदेवका भक्तिपूर्वक दर्शन और उन्हें वन्दन करनेपर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो परम पदको प्राप्त होता है। मैंने, इन्द्रने तथा विभीषणने भी उनकी आराधना की है। फिर कौन मनुष्य उनकी आराधना न करेगा। जो मनुष्य श्वेतगङ्गामें स्नान करके श्वेतमाधव तथा मत्स्यमाधवका दर्शन करता है, वह श्वेतद्वीपमें जाता है।
**मुनियोंने कहा—**भगवन्! आप श्वेतमाधवके माहात्म्यका पूर्णरूपसे वर्णन कीजिये। साथ ही भगवान्की प्रतिमाका वृत्तान्त भी विस्तारके साथ बतलाइये। भूतलमें विख्यात भगवान्के पवित्र क्षेत्रमें श्वेतमाधवकी स्थापना किसने की थी?
**ब्रह्माजी बोले—**सत्ययुगमें श्वेत नामके एक बलवान् राजा थे। वे बड़े बुद्धिमान्, धर्मज्ञ, शूरवीर, सत्यप्रतिज्ञ और दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले थे। उनके राज्यमें दस हजार वर्षोंतक मनुष्योंकी आयु होती थी और किसी बालककी मृत्यु नहीं