संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * धेनुक और प्रलम्बका वध तथा गिरियज्ञका अनुष्ठान * | २९७ |
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आँखें करके उसके मस्तकपर एक मुक्का मारा। उनके इस प्रहारसे प्रलम्बके दोनों नेत्र बाहर निकल आये, मस्तिष्क फट गया और वह दैत्य मुँहसे खून उगलता हुआ पृथ्वीपर गिरकर मर गया। अद्भुत कर्म करनेवाले बलदेवजीके द्वारा प्रलम्बको मारा गया देख ग्वाल-बाल ‘बहुत अच्छा हुआ, बहुत अच्छा हुआ’ कहते हुए उनकी प्रशंसा करने लगे। इस प्रकार प्रलम्बासूरके मारे जानेपर ग्वाल-बालोंके मुखसे अपनी प्रशंसा सुनते हुए बलरामजी श्रीकृष्णके साथ पुनः गौओंके समूहमें आये।
इस तरह नाना प्रकारकी लीलाएँ करते हुए बलराम और श्रीकृष्ण वनमें विहार करते रहे। इतनेमें ही वर्षा बीत गयी और शरद्-ऋतुका आगमन हुआ। जलाशयोंमें कमल खिलने लगे, आकाश और नक्षत्र निर्मल हो गये। ऐसे समयमें समस्त व्रजवासी इन्द्रोत्सवका आयोजन करने लगे। उन्हें उत्सवके लिये अत्यन्त उत्सुक देख परम बुद्धिमान् श्रीकृष्णने बड़े-बूढ़े गोपोंसे कौतूहलवश पूछा—‘यह इन्द्रोत्सव क्या वस्तु है, जिससे आपलोगोंको इतना हर्ष हुआ है?’ श्रीकृष्णको अत्यन्त आदरपूर्वक प्रश्न करते देख नन्द गोपने कहा—‘बेटा! देवराज इन्द्र मेघ और जलके स्वामी हैं। उन्हींसे प्रेरित होकर मेघ जलमय रसकी वृष्टि करते हैं। उस वृष्टिसे ही अन्न पैदा होता है, जिसे हम तथा अन्य देहधारी खाकर जीवन-निर्वाह करते और देवता आदिको भी तृप्त करते हैं। ये दूध और बछड़ोंवाली गौएँ इन्द्रके बढ़ाये हुए अन्नसे ही संतुष्ट हो हृष्ट-पुष्ट रहती हैं। जहाँ वर्षा करनेवाले मेघ होते हैं, वहाँ बिना खेतीकी भूमि नहीं दिखायी देती, कोई ऋणग्रस्त नहीं रहता और वहाँ एक भी भूखसे पीड़ित मनुष्य नहीं दृष्टिगोचर होता। मेघ सूर्यकी किरणोंद्वारा इस पृथ्वीका जल ग्रहण करते और फिर सम्पूर्ण लोकोंकी भलाईके लिये उसे बरसा देते हैं। अतः वर्षाकालमें सब राजालोग, हम तथा अन्य देहधारी भी बड़ी प्रसन्नताके साथ उत्सव मनाते और देवराज इन्द्रकी पूजा करते हैं।’
इन्द्रपूजाके विषयमें नन्दगोपका ऐसा कथन सुनकर भगवान् दामोदरने इन्द्रको कुपित करनेके उद्देश्यसे कहा—‘पिताजी! हमलोग न तो खेती करते हैं और न व्यापारसे ही जीविका चलाते हैं। हमारे देवता तो ये गौएँ ही हैं। क्योंकि हम सब लोग वनवासी हैं। आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति—ये चार प्रकारकी विद्याएँ हैं। इनमेंसे वार्ताका सम्बन्ध हमलोगोंसे है। अतः उसका वर्णन सुनिये। कृषि, वाणिज्य और पशुपालन—इन तीन वृत्तियोंपर वार्ता अवलम्बित रहती है। कृषि किसानोंकी वृत्ति है और वाणिज्य क्रय-विक्रय करनेवाले वैश्योंकी। हमलोगोंकी सबसे प्रधान वृत्ति है—गोपालन। इस प्रकार ये वार्ताके तीन भेद हैं। उपर्युक्त चार विद्याओंमेंसे