भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 486 में से

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पृष्ठ 126

सूत्र १४ ] अध्याय १ १२३ वालोंके पाठमें 'अन्नस्य अन्नम्' इस अंशका ग्रहण नहीं हुआ है; अतः उनके अनुसार चारका ही वर्णन होनेपर पाँचकी संख्या-पूर्तिमें एककी कमी रह जाती है। अतः सूत्रकार कहते हैं कि काण्वशाखाके पाठमें अन्नका ग्रहण न होनेसे जो एककी कमी रहती है, उसकी पूर्ति ४।४।१६ के मन्त्रमें वर्णित 'ज्योति' के द्वारा कर लेनी चाहिये। वहाँ उस ब्रह्मको 'ज्योतिकी भी ज्योति' बताया गया है। सत्रहवें मन्त्रका वर्णन तो संकेतमात्र है, इसलिये उसमें पाँच संख्याकी पूर्ति करना आवश्यक नहीं है, तो भी ग्रन्थकारने किसी प्रकार भी प्रसंगवश उठनेवाली शंकाका निराकरण करनेके लिये यह सूत्र कहा है। सम्बन्ध — यहाँ यह शंका होती है कि 'श्रुतियोंमें जगत्‌के कारणका अनेक प्रकारसे वर्णन आया है। कहीं सत्‌से सृष्टि बतायी गयी है, कहीं असत्‌से तथा जगत्‌की उत्पत्तिके क्रममें भी भेद है। कहीं पहले आकाशकी उत्पत्ति बतायी है, कहीं तेजकी, कहीं प्राणकी और कहीं अन्य किसीकी। इस प्रकार वर्णनमें भेद होनेसे वेदवाक्योंद्वारा यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि जगत्‌का कारण केवल परब्रह्म परमेश्वर ही है तथा सृष्टिका क्रम अमुक प्रकारका ही है।' इसपर कहते हैं— कारणत्वेन चाकाशादिषु यथाव्यपदिष्टोक्तेः ॥ १ । ४। १४॥ आकाशादिषु=आकाश आदि किसी भी क्रमसे रचे जानेवाले पदार्थोंमें; कारणत्वेन=कारणरूपसे; च=तो; यथाव्यपदिष्टोक्तेः=सर्वत्र एक ही वेदान्त-वर्णित ब्रह्मका प्रतिपादन किया गया है; इसलिये (परब्रह्म ही जगत्‌का कारण है)। व्याख्या — वेदमें जगत्‌के कारणोंका वर्णन नाना प्रकारसे किया गया है तथा जगत्‌की उत्पत्तिका क्रम भी अनेक प्रकारसे बताया गया है, तथापि केवल परब्रह्मको ही जगत्‌का कारण माननेमें कोई दोष नहीं है; क्योंकि जगत्‌के दूसरे कारण जो आकाश आदि कहे गये हैं, उनका भी परम कारण परब्रह्मको ही बताया गया है। इससे ब्रह्मकी ही कारणता सिद्ध होती है, अन्य किसीकी नहीं। जगत्‌की उत्पत्तिके क्रममें जो भेद आता है, वह इस प्रकार