भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

सूत्र १६-१७ ] अध्याय ३ २७५ तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ॥ ३।१।१६॥ च=तथा; तत्र=उन यातनाके स्थानोंमें; अपि=भी; तद्व्यापारात्=उस यमराजके ही आज्ञानुसार कार्य होनेसे; अविरोधः=किसी प्रकारका विरोध नहीं है। व्याख्या—यातना भोगनेके लिये जो रौरव आदि सात नरक बताये गये हैं और वहाँ जो चित्रगुप्त आदि दूसरे अधिकारी हैं, वे ही यमराजके आज्ञानुसार कार्य करते हैं, इसलिये उनका किया हुआ कार्य भी यमराजका ही कार्य है। अतः यमराजके अधिकारमें पापियोंके दण्ड भोगनेकी जो बात कही गयी है, उसमें कोई विरोध नहीं है। सम्बन्ध—ऐसा मान लेनेपर भी पूर्वोक्त श्रुतिमें जो सबके चन्द्रलोकमें जानेकी बात कही गयी, उसकी संगति (कौ० १।२) कैसे होगी? इसपर कहते हैं— विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ॥ ३।१।१७॥ विद्याकर्मणोः=ज्ञान और शुभ कर्म—इन दोनोंका; तु=ही; प्रकृतत्वात्= प्रकरण होनेके कारण; इति=ऐसा कथन उचित ही है। व्याख्या—जिस प्रकार छान्दोग्योपनिषद् (५।१०।१)-में विद्या और शुभ कर्मोंका फल बतानेका प्रसंग आरम्भ करके देवयान और पितृयान-मार्गकी बात कही गयी है, उसी प्रकार वहाँ कौषीतकि- ब्राह्मणोपनिषद्में भी ज्ञान और शुभ कर्मोंका फल बतानेके प्रकरणमें ही उक्त कथन है। इसलिये यह समझना चाहिये कि जो शुभ कर्म करनेवाले अधिकारी मनुष्य इस लोकसे जाते हैं, वे ही सब-के-सब चन्द्रलोकको जाते हैं, अनिष्ट कर्म करनेवाले नहीं; क्योंकि उनका प्रकरण नहीं है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'कठोपनिषद्में जो पापियोंके लिये यमलोकमें जानेकी बात कही गयी है, वह छान्दोग्य-श्रुतिमें बतायी हुई तीसरी गतिके अन्तर्गत है या उससे भिन्न?' इसके उत्तरमें कहते हैं—