वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ न तृतीये तथोपलब्धेः ॥ ३।१।१८॥ तृतीये=वहाँ कही हुई तीसरी गतिमें; न=(यमलोकगमनरूप गतिका) अन्तर्भाव नहीं होता; तथा उपलब्धेः=क्योंकि उस वर्णनमें ऐसी ही बात मिलती है। व्याख्या—वहाँ छान्दोग्योपनिषद् (५।१०।८)-में यह बात कही गयी है कि ‘अथैतयोः पथोर्न कतरेण च नतानीमानि क्षुद्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयँ स्थानम्।’ अर्थात् देवयान और पितृयान—इन दोनों मार्गोंमेंसे किसी भी मार्गसे जो ऊपरके लोकोंमें नहीं जाते, वे क्षुद्र तथा बार-बार जन्मने-मरनेवाले प्राणी होते हैं; ‘उत्पन्न होओ और मरो’—यह मृत्युलोक ही उनका तीसरा स्थान है। इत्यादि। इस वर्णनमें यह पाया जाता है कि उनका किसी भी परलोकमें गमन नहीं होता, वे इस मृत्युलोकमें ही जन्मते-मरते रहते हैं। इसलिये इस तीसरी गतिमें यमयातनारूप नरकलोकवाली गतिका अन्तर्भाव नहीं है। सम्बन्ध—इन तीन गतियोंके सिवा चौथी गति जिसमें नरकयातना आदिका भोग है तथा जो ऊपर कही हुई तीसरी गतिसे भी अधम गति है, उसका वर्णन कहाँ आता है, इसपर कहते हैं— स्मर्यतेऽपि च लोके ॥ ३।१।१९॥ स्मर्यते=स्मृतियोंमें इसका समर्थन किया गया है; च=तथा; लोके= लोकमें; अपि=भी (यह बात प्रसिद्ध है)। व्याख्या—श्रीमद्भगवद्गीता (१४।१८)-में कहा है कि— ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥ ‘सत्त्वगुणमें स्थित रहकर मरनेवाले लोग ऊपरके लोकोंमें जाते हैं (देवयान और पितृयान—दोनों मार्ग इसके अन्तर्गत हैं), राजसी लोग बीचमें अर्थात् इस मनुष्यलोकमें ही जन्मते-मरते रहते हैं (यह छान्दोग्यमें बतायी हुई तीसरी गतिके अन्तर्गत है)। निन्दनीय तमोगुणकी वृत्तिमें स्थित तामसी जीव