वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ सम्बन्ध— इस जीवात्माके जो वास्तविक ईश्वरसम्बन्धी गुण हैं, वे क्यों छिपे हुए हैं? इस जिज्ञासापर कहते हैं— देहयोगाद्वा सोऽपि॥ ३।२।६॥ सः=वह तिरोभाव; अपि=भी; देहयोगात्=शरीरके सम्बन्धसे; वा=ही है। व्याख्या— इस जीवात्मामें उस परब्रह्म परमात्माके स्वाभाविक गुण विद्यमान रहते हुए भी जो उन गुणोंका तिरोभाव हो रहा है, वे गुण प्रकट नहीं हो रहे हैं तथा यह जीवात्मा जो उन सब गुणोंसे सर्वथा अनभिज्ञ है, इसका मुख्य कारण जीवात्माका शरीरोंके साथ एकता मान लेना ही है। यही इसका बन्धन है और यह अनादिकालसे है। इसीके कारण जन्म-जन्मान्तरोंके कर्म-संस्कारोंसे परवश हुआ यह जीव नाना योनियोंमें जन्म लेता और मरता है तथा भाँति-भाँतिके दुःखोंका उपभोग कर रहा है। सम्बन्ध—यहाँतक स्वप्नावस्थापर विचार किया गया, उसमें प्रसंगवश जीवात्माके बन्धन और उससे छूटनेके उपायका भी संक्षेपमें वर्णन हुआ। अब जीवात्माकी सुषुप्ति-अवस्थापर विचार करनेके लिये अगला प्रसंग आरम्भ किया जाता है। प्रायः यह कहा जाता है कि सुषुप्ति-अवस्थामें जीवात्माका ब्रह्मसे संयोग होता है, इससे यह भ्रान्त धारणा हो सकती है कि सुषुप्ति भी समाधिके सदृश कोई सुखप्रद अवस्था है। अतः इस भ्रमका निवारण करनेके लिये कहते हैं— तदभावो नाडीषु तच्छ्रुतेरात्मनि च॥ ३।२।७॥ तदभावः=(सुषुप्ति-अवस्थामें) उस स्वप्नदृश्यका अभाव हो जाता है (उस समय जीवात्मा); नाडीषु=नाड़ियोंमें (स्थित हो जाता है); तच्छ्रुतेः=क्योंकि वैसा ही श्रुतिका कथन है; च=तथा; आत्मनि=आत्मामें भी (उसकी स्थिति बतायी गयी है)। व्याख्या—पूर्व सूत्रोंमें जो स्वप्नावस्थाका वर्णन किया गया है उसका उपभोग करते समय यह जीवात्मा कभी तो स्वप्नसे जग जाता है और कभी