ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 149, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड १३९
भगवान् नारायण बोले—नारद! श्रुति कहती है कि सम्पूर्ण सृष्टियोंके आरम्भमें श्रीकृष्णसे ही सबकी उत्पत्ति होती है और समस्त प्रलयोंके अवसरपर प्राणी उन्हींमें लीन भी हो जाते हैं। अब पृथ्वीके जन्मका प्रसङ्ग सुनो। कुछ लोग कहते हैं, यह आदरणीया पृथ्वी मधु और कैटभके मेदसे उत्पन्न हुई है। इसका भाव यह है कि उन दैत्योंके जीवनकालमें पृथ्वी स्पष्ट दिखलायी नहीं पड़ती थी। वे जब मर गये, तब उनके शरीरसे मेद निकला—वही सूर्यके तेजसे सूख गया। अतः 'मेदिनी' इस नामसे पृथ्वी विख्यात हुई। इस मतका स्पष्टीकरण सुनो। पहले सर्वत्र जल-ही-जल दृष्टिगोचर हो रहा था। पृथ्वी जलसे ढकी थी। मेदसे केवल उसका स्पर्श हुआ। अतः लोग उसे 'मेदिनी' कहने लगे। मुने! अब पृथ्वीके सार्थक जन्मका प्रसङ्ग कहता हूँ। यह चरित्र सम्पूर्ण मङ्गल प्रदान करनेवाला है।
मैं पुष्करक्षेत्रमें था। महाभाग धर्मके मुखसे जो कुछ सुन चुका हूँ, वही तुमसे कहूँगा। महाविराट् पुरुष अनन्तकालसे जलमें विराजमान रहते हैं—यह स्पष्ट है। समयानुसार उनके भीतर सर्वव्यापी समष्टि मल प्रकट होता है। महाविराट् पुरुषके सभी रोमकूप उसके आश्रय बन जाते हैं। मुने! उन्हीं रोमकूपोंसे पृथ्वी निकल आती है। जितने रोमकूप हैं, उन सबमेंसे एक-एकसे जलसहित पृथ्वी बार-बार प्रकट होती और छिपती रहती है। सृष्टिके समय प्रकट होकर जलके ऊपर स्थिर रहना और प्रलयकाल उपस्थित होनेपर छिपकर जलके भीतर चले जाना—यही इसका नियम है। अखिल ब्रह्माण्डमें यह विराजती है। वन और पर्वत इसकी शोभा बढ़ाये रहते हैं। यह सात समुद्रोंसे घिरी रहती है। सात द्वीप इसके अङ्ग हैं। हिमालय और सुमेरु आदि पर्वत तथा सूर्य एवं चन्द्रमा प्रभृति ग्रह इसे सदा सुशोभित करते हैं। महाविराट्की आज्ञाके अनुसार ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवता प्रकट होते एवं समस्त प्राणी इसपर रहते हैं। पुण्यतीर्थ तथा पवित्र भारतवर्ष-जैसे देशोंसे सम्पन्न होनेका इसे सुअवसर मिलता है। यह पृथ्वी स्वर्णमय भूमि है। इसपर सात स्वर्ग हैं। इसके नीचे सात पाताल हैं। ऊपर ब्रह्मलोक है। ब्रह्मलोकसे भी ऊपर ध्रुवलोक है।
नारद! इस प्रकार इस पृथ्वीपर अखिल विश्वका निर्माण हुआ है। ये निर्मित सभी विश्व नश्वर हैं। यहाँतक कि 'प्राकृत प्रलय' का अवसर आनेपर ब्रह्मा भी चले जाते हैं। उस समय केवल महाविराट् पुरुष विद्यमान रहते हैं। कारण, सृष्टिके आरम्भमें ही परब्रह्म श्रीकृष्णने इन्हें प्रकट करके इस कार्यमें नियुक्त कर दिया है। सृष्टि और प्रलय प्रवाहरूपसे नित्य हैं—इनका क्रम निरन्तर चालू रहता है। ये समयपर नियन्त्रण रखनेवाली अदृष्ट शक्तिके अधीन होकर रहते हैं। प्रवाहक्रमसे पृथ्वी भी नित्य है। वाराहकल्पमें यह मूर्तिमान् रूपसे विराजमान हुई थी और देवताओंने इसका पूजन किया था। मुनि, मनु, गन्धर्व और ब्राह्मण—प्रायः सभी इसकी पूजामें सम्मिलित हुए थे। उस समय भगवान्का वाराहावतार हुआ था। श्रुतिके मतसे यह पृथ्वी उनकी पत्नीके रूपमें विराजमान हुई। इससे मङ्गलका जन्म हुआ और मङ्गलसे घटेशकी उत्पत्ति हुई।
नारदने पूछा—प्रभो! देवताओंने वाराहकल्पमें पृथ्वीकी किस रूपसे पूजा की थी? सबको आश्रय प्रदान करनेवाली इस साध्वी देवीकी उस कल्पमें स्वयं भगवान् वाराहने तथा अन्य सबने भी पूजा की थी। भगवन्! इसके पूजनका विधान, जलके नीचेसे इसके ऊपर उठनेका क्रम एवं मङ्गलके जन्मका कल्याणमय प्रसङ्ग विस्तारपूर्वक बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायण बोले—नारद! बहुत पहलेकी बात है। उस समय वाराहकल्प चल