ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १४८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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जलमय विग्रह धारण कर लिया है। सुरेश्वरो ! तुम्हें मेरे तथा इन राधाके शरीरसे क्या प्रयोजन है ? मनु, मुनि, मानव तथा अगणित वैष्णवजन मेरे मन्त्रोंसे पवित्र होकर मुझे देखनेके लिये मेरे धाममें आयेंगे। ऐसे ही तुम्हें भी यदि स्पष्ट दर्शन करनेकी इच्छा हो तो प्रयत्न करो। शम्भु वहीं रहकर मेरी आज्ञाका पालन करें। ब्रह्मन् ! जगद्गुरो ! तुम स्वयं विधाता हो। भगवान् शंकरसे कह दो कि 'वे वेदोंके अङ्गभूत परम मनोहर विशिष्ट शास्त्र अर्थात् तन्त्रशास्त्रका निर्माण करें। उसमें सम्पूर्ण अभीष्ट फल देनेवाले बहुत-से अपूर्व मन्त्र उद्धृत हों। स्तोत्र, ध्यान, पूजाविधि, मन्त्र और कवच—इन सबसे वह तन्त्रशास्त्र सम्पन्न हो। मेरे मन्त्र और कवचका निर्माण करके तुम उसका यत्नपूर्वक गोपन करो। जो मुझसे विमुख हों, उन्हें इसका उपदेश नहीं करना चाहिये। सैकड़ों और सहस्रोंमें कोई एक भी तो मेरा सच्चा उपासक होगा। वे भक्तजन ही मेरे मन्त्रसे पवित्र हों। यदि शंकर देवसभामें ऐसा शास्त्र निर्माण करनेके लिये सुदृढ़ प्रतिज्ञा करते हैं तो उन्हें तुरन्त ही मेरे दर्शन प्राप्त हो जायेंगे।'
आकाशवाणीके द्वारा इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीहरि चुप हो गये। उनकी वाणी सुनकर जगत्की व्यवस्था करनेवाले ब्रह्माने प्रसन्नतापूर्वक उसे भगवान् शंकरसे कहा। ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ तथा ज्ञानके अधिष्ठाता भगवान् शंकरने ब्रह्माकी बात सुननेके पश्चात् हाथमें गङ्गा-जल ले लिया और आज्ञापालन करनेके लिये प्रतिज्ञा कर ली। फिर तो वे भगवती जगदम्बाके मन्त्रोंसे सम्पन्न उत्तम तन्त्रशास्त्रके निर्माणमें लग गये। 'प्रतिज्ञापालन करनेके लिये मैं वेदके सारभूत महान् तन्त्रशास्त्रका निर्माण करूँगा'—यह विचार उनके हृदयमें गूँजने लगा। उन्होंने अपना विचार व्यक्त किया कि 'यदि कोई मनुष्य गङ्गाका जल हाथमें लेकर प्रतिज्ञा करेगा और फिर उस अपनी की हुई प्रतिज्ञाका पालन नहीं करेगा तो वह 'कालसूत्र' नामक नरकका भागी होगा और ब्रह्माकी पूरी आयुतक उसे वहाँ रहना पड़ेगा।'
ब्रह्मन् ! गोलोकमें देवताओंकी सभा जुड़ी थी। उसमें भगवान् शंकर जब इस प्रकारकी बात कह चुके, तब अकस्मात् परब्रह्म परिपूर्णतम भगवान् श्रीकृष्ण भगवती श्रीराधाके साथ वहाँ प्रकट हो गये। उन पुरुषोत्तम भगवान् श्रीहरिके प्रत्यक्ष दर्शन करनेपर देवताओंकी प्रसन्नताकी सीमा नहीं रही। वे उनकी स्तुति करने लगे।
इसके बाद उपस्थित देवताओंने अत्यन्त आनन्दमें भरकर फिरसे उत्सव मनाया। तत्पश्चात् समयानुसार भगवान् शंकरने शास्त्रदीपका— शास्त्रीय मतको प्रकाशित करनेवाले सात्त्विक तन्त्रशास्त्रका निर्माण किया।
नारद ! इस प्रकार सम्पूर्ण परम गोप्य प्रसङ्ग मैं तुम्हें सुना चुका। यह सबके लिये अत्यन्त दुर्लभ है। वे ही पूर्णब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण जलरूप होकर गङ्गा बन गये थे। गोलोकसे प्रकट होनेवाली गङ्गाका यही रहस्य है। यों भगवान् श्रीराधाकृष्ण ही गङ्गाके रूपमें प्रकट हुए हैं।
श्रीराधा और श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट हुई यह गङ्गा भुक्ति और मुक्ति दोनोंको देनेवाली हैं। परमात्मा श्रीकृष्णकी व्यवस्थाके अनुसार जगह-जगह रहनेका सुअवसर इन्हें प्राप्त हो गया। श्रीकृष्णस्वरूपा इन आदरणीया गङ्गादेवीको सम्पूर्ण ब्रह्माण्डके लोग पूजते हैं। (अध्याय १०)