भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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प्रकृतिखण्ड १५९


गया और इस समय ब्रह्मासहित उसने आपकी शरण ग्रहण कर ली है। जो व्यक्ति ध्यान अथवा वचनसे भी आपके शरणापन्न हो जाते हैं, उनपर विपत्ति और संकट अपना कुछ भी प्रभाव नहीं डाल सकते। वे जरा और मृत्युसे सर्वथा रहित हो जाते हैं। भगवन्! शरणागतिका फल तो प्रत्यक्ष ही है, फिर मैं क्या कहूँ? आपका स्मरण करते ही मनुष्य सदाके लिये अभय एवं मङ्गलमय बन जाते हैं। परंतु जगत्प्रभो! अब मेरे उस भक्तकी जीवनचर्या कैसे चलेगी—यह बतानेकी कृपा कीजिये; क्योंकि सूर्यके शापसे उसकी श्री नष्ट हो चुकी है। उसमें सोचने-समझनेकी शक्ति भी तनिक-सी नहीं रह गयी है।

भगवान् विष्णु बोले—शम्भो! दैवकी प्रेरणासे बहुत समय बीत गया। इक्कीस युग समाप्त हो गये। यद्यपि वैकुण्ठमें अभी आधी घड़ीका समय बीता है। अतः अब आप शीघ्र अपने स्थानपर पधारिये। किसीसे भी न रुकनेवाले अत्यन्त भयंकर कालने इस समय वृषध्वजको अपना ग्रास बना लिया है। यही नहीं, किंतु उसका पुत्र रथध्वज भी अब जगत्में नहीं है। इस समय रथध्वजके दो पुत्र हैं, उन महाभाग पुत्रोंके नाम हैं—धर्मध्वज और कुशध्वज। वे परम वैष्णवपुरुष सूर्यके शापसे श्रीहीन होकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं—ऐसा कहा जाता है। राज्य भी उनके हाथमें नहीं है। एकमात्र लक्ष्मीकी उपासना ही उनके जीवनका उद्देश्य बन गया है। अतः उनकी भार्याओंके उदरसे भगवती लक्ष्मी अपनी एक कलासे प्रकट होंगी। तब वे दोनों नरेश लक्ष्मीसे सम्पन्न हो जायँगे। शम्भो! अब आपके सेवक वृषध्वजका शरीर नहीं रहा। अतः आप यहाँसे पधार सकते हैं। देवताओ! अब आपलोग भी जानेका कष्ट करें।

नारद! इस प्रकार कहकर भगवान् श्रीहरि लक्ष्मीके सहित सभासे उठे और अन्तःपुरमें चले गये। देवताओंने भी बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने आश्रमकी यात्रा की। परिपूर्णतम शंकर उसी क्षण तपस्या करनेके विचारसे चल पड़े। (अध्याय १३)


वेदवतीकी कथा, इसी प्रसङ्गमें भगवान् रामके चरित्रका एक अंश-कथन, भगवती सीता तथा द्रौपदीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त

भगवान् नारायण कहते हैं—मुने! धर्मध्वज और कुशध्वज—इन दोनों नरेशोंने कठिन तपस्याद्वारा भगवती लक्ष्मीकी उपासना करके अपने प्रत्येक अभीष्ट मनोरथको प्राप्त कर लिया। महालक्ष्मीके वर-प्रसादसे उन्हें पुनः पृथिवीपति होनेका सौभाग्य प्राप्त हो गया। वे दोनों धनवान् और पुत्रवान् हो गये। कुशध्वजकी परम साध्वी भार्याका नाम मालावती था। समयानुसार उसके एक कन्या उत्पन्न हुई, जो लक्ष्मीका अंश थी। वह भूमिपर पैर रखते ही ज्ञानसे सम्पन्न हो गयी। उस कन्याने जन्म लेते ही सूतिकागृहमें स्पष्ट स्वरसे वेदके मन्त्रोंका उच्चारण किया और उठकर खड़ी हो गयी। इसलिये विद्वान् पुरुष उसे 'वेदवती' कहने लगे। उत्पन्न होते ही उस कन्याने स्नान किया और तपस्या करनेके विचारसे वह वनकी ओर चल दी। भगवान् नारायणके चिन्तनमें तत्पर रहनेवाली उस देवीको प्रायः सभीने रोका; परंतु उसने किसीकी भी नहीं सुनी। वह तपस्विनी कन्या एक मन्वन्तरतक पुष्करक्षेत्रमें तपस्या करती रही। उसका तप अत्यन्त कठिन था तो भी लीलापूर्वक चलता रहा। अत्यन्त तपोनिष्ठ रहनेपर भी उसका शरीर हृष्ट-पुष्ट बना रहा। उसमें