भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 171

प्रकृतिखण्ड १६१


समीप ठहरे थे। वहाँ ब्राह्मणरूपधारी अग्निसे उनकी भेंट हुई। भगवान् रामको दुःखी देखकर विप्ररूपधारी अग्निका मन संतप्त हो उठा। तब सर्वथा सत्यवादी उन अग्निदेवने सत्यप्रेमी भगवान् रामसे ये सत्यमय वचन कहे।

ब्राह्मणवेषधारी अग्निने कहा— भगवन्! मेरी कुछ प्रार्थना सुनिये। श्रीराम! यह सीताके हरणका समय उपस्थित है। ये मेरी माँ हैं; इन्हें मेरे संरक्षणमें रखकर आप छायामयी सीताको अपने साथ रखिये; फिर अग्निपरीक्षाके समय इन्हें मैं आपको लौटा दूँगा। परीक्षा-लीला भी हो जायगी। इसी कार्यके लिये मुझे देवताओंने यहाँ भेजा है। मैं ब्राह्मण नहीं, साक्षात् अग्नि हूँ।

भगवान् श्रीरामने अग्निकी बात सुनकर लक्ष्मणको बताये बिना ही व्यथित-हृदयसे अग्निके प्रस्तावको मान लिया। नारद! उन्होंने सीताको अग्निके हाथों सौंप दिया। तब अग्निने योगबलसे मायामयी सीता प्रकट की। उसके रूप और गुण साक्षात् सीताके समान ही थे। अग्निदेवने उसे रामको दे दिया। मायासीताको साथ ले वे आगे बढ़े। इस गुप्त रहस्यको प्रकट करनेके लिये भगवान् रामने उसे मना कर दिया। यहाँतक कि लक्ष्मण भी इस रहस्यको नहीं जान सके; फिर दूसरेकी तो बात ही क्या है? इसी बीच भगवान् रामने एक सुवर्णमय मृग देखा। सीताने उस मृगको लानेके लिये भगवान् रामसे अनुरोध किया। भगवान् राम उस वनमें जानकीकी रक्षाके लिये लक्ष्मणको नियुक्त करके स्वयं मृगको मारनेके लिये चले। उन्होंने बाणसे उसे मार गिराया। मरते समय उस मायामृगके मुखसे 'हा लक्ष्मण!'—यह शब्द निकला। फिर सामने श्रीरामको देख उनका स्मरण करते हुए उसने सहसा प्राण त्याग दिये। मृगका शरीर त्यागकर वह दिव्य देहसे सम्पन्न हो गया और रत्ननिर्मित दिव्य विमानपर सवार होकर वैकुण्ठधामको चला

गया। यह मारीच पूर्वजन्ममें वैकुण्ठधामके द्वारपर वहाँके द्वारपाल जय और विजयका किंकर था तथा वहीं रहता था। वह बड़ा बलवान् था। उसका नाम था 'जित'। सनकादिकोंके शापसे जय-विजयके साथ वह भी राक्षस-योनिमें आ गया था। उस दिन उसका उद्धार हो गया और वह उन द्वारपालोंके पहले ही वैकुण्ठके द्वारपर पहुँच गया।

तदनन्तर 'हा लक्ष्मण' इस कष्टभरे शब्दको सुनकर सीताने लक्ष्मणको रामके पास जानेके लिये प्रेरित किया। लक्ष्मणके चले जानेपर रावण सीताका अपहरण कर खेल-ही-खेलमें लङ्काकी ओर चल दिया। उधर लक्ष्मणको वनमें देखकर राम विषादमें डूब गये। वे उसी क्षण अपने आश्रमपर गये और सीताको वहाँ न देख विलाप करने लगे। फिर, सीताको खोजते हुए वे बारंबार वनमें चक्कर लगाने लगे। कुछ समय बाद गोदावरी नदीके तटपर उन्हें जटायुद्वारा सीताका समाचार मिला। तब वानरोंको अपना सहायक बनाकर उन्होंने समुद्रमें पुल बाँधा। उसके द्वारा लङ्कामें पहुँचकर उन रघुश्रेष्ठने अपने बाणसे बन्धु-बान्धवोंसहित रावणका वध कर डाला। तत्पश्चात् उन्होंने सीताकी अग्निपरीक्षा करायी। अग्निदेवने उसी क्षण वास्तविक सीताको भगवान् रामके सामने उपस्थित कर दिया। तब छायासीताने अत्यन्त नम्र होकर अग्निदेव और भगवान् श्रीराम—दोनोंसे कहा—'महानुभावो! अब मैं क्या करूँगी, सो बतानेकी कृपा कीजिये।'

तब भगवान् श्रीराम और अग्निदेव बोले— देवी! तुम तप करनेके लिये अत्यन्त पुण्यप्रद पुष्करक्षेत्रमें चली जाओ। वहीं रहकर तपस्या करना। इसके फलस्वरूप तुम्हें स्वर्गलक्ष्मी बननेका सुअवसर प्राप्त होगा।

भगवान् श्रीराम और अग्निदेवके वचन सुनकर छायासीताने पुष्करक्षेत्रमें जाकर तप

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