ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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आरम्भ कर दिया। उसकी कठिन तपस्या बहुत लम्बे कालतक चलती रही। इसके बाद उसे स्वर्गलक्ष्मी होनेका सौभाग्य प्राप्त हो गया। समयानुसार वही छायासीता राजा द्रुपदके यहाँ यज्ञकी वेदीसे प्रकट हुई। उसका नाम ‘द्रौपदी’ पड़ा और पाँचों पाण्डव उसके पतिदेव हुए। इस प्रकार सत्ययुगमें वही कल्याणी वेदवती कुशध्वजकी कन्या, त्रेतायुगमें छायारूपसे सीता बनकर भगवान् श्रीरामकी सहचरी तथा द्वापरमें द्रुपदकुमारी द्रौपदी हुई। अतएव इसे ‘त्रिहायणी’ कहा गया है। तीनों युगोंमें यह विद्यमान रही है।
नारदजीने पूछा—संदेहोंके निराकरण करनेमें परम कुशल मुनिवर! द्रौपदीके पाँच पति कैसे हुए? मेरे मनकी यह शङ्का मिटानेकी कृपा करें।
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! जब लङ्कामें वास्तविक सीता भगवान् श्रीरामके पास विराजमान हो गयी, तब रूप और यौवनसे शोभा पानेवाली छायासीताकी चिन्ताका पार न रहा। वह भगवान् श्रीराम और अग्निदेवके आज्ञानुसार भगवान् शंकरकी उपासनामें तत्पर हो गयी। पति प्राप्त करनेके लिये व्यग्र होकर वह बार-बार यही प्रार्थना कर रही थी कि ‘भगवान् त्रिलोचन! मुझे पति प्रदान कीजिये।’ यही शब्द उसके मुँहसे पाँच बार निकले। भगवान् शंकर परम रसिक हैं। छायासीताकी यह प्रार्थना सुनकर वे मुस्कराते हुए बोले—‘तुम्हें पाँच पति मिलेंगे।’ नारद! इस प्रकार त्रेताकी जो छायासीता थी, वही द्वापरमें द्रौपदी बनी और पाँचों पाण्डव उसके पति हुए। यह सब जो बीचकी बातें थीं, सुना चुका। अब जो प्रधान विषय चल रहा था, वह सुनो।
भगवान् रामने लङ्कामें मनोहारिणी सीताको पा जानेके पश्चात् वहाँका राज्य विभीषणको सौंप दिया और वे स्वयं अयोध्या पधार गये। अयोध्या भारतवर्षमें है। ग्यारह हजार वर्षोंतक भगवान् श्रीरामने वहाँ राज्य किया। तत्पश्चात् वे समस्त पुरवासियोंसहित वैकुण्ठधामको पधारे। लक्ष्मीके अंशसे प्रादुर्भूत जो वेदवती थी, वह लक्ष्मीके विग्रहमें विलीन हो गयी। इस प्रकारका पवित्र आख्यान मैंने कह सुनाया। इस पुण्यदायी उपाख्यानके प्रभावसे सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं। अब धर्मध्वजकी कन्याका प्रसङ्ग कहता हूँ, सुनो। (अध्याय १४)
भगवती तुलसीके प्रादुर्भावका प्रसङ्ग
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! धर्मध्वजकी पत्नीका नाम माधवी था। वह राजाके साथ गन्धमादन पर्वतपर सुन्दर उपवनमें आनन्द करती थी। यों दीर्घकाल बीत गया, किंतु उन्हें इसका ज्ञान न रहा कि कब दिन बीता, कब रात। तदनन्तर राजा धर्मध्वजके हृदयमें ज्ञानका प्रादुर्भाव हुआ और उन्होंने हास-विलाससे विलग होना चाहा; परंतु माधवी अभी तृप्त नहीं हो सकी थी, फिर भी उसे गर्भ रह गया। उसका गर्भ प्रतिदिन बढ़ता और उसकी शोभा बढ़ाता रहा। नारद! कार्तिककी पूर्णिमाके दिन उसके गर्भसे एक कन्या प्रकट हुई। उस समय शुभ दिन, शुभ योग, शुभ क्षण, शुभ लग्न और शुभ ग्रहका संयोग था। ऐसे योगसे सम्पन्न शुक्रवारके दिन देवी माधवीने लक्ष्मीके अंशसे प्रादुर्भूत उस कन्याको जन्म दिया। कन्याका मुख ऐसा मनोहर था मानो शरद-ऋतुकी पूर्णिमाका चन्द्रमा हो। नेत्र शरत्कालीन प्रफुल्ल कमलके समान सुन्दर थे। अधर पके हुए बिम्बाफलकी तुलना कर रहे थे। मनको