भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 810 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 259

प्रकृतिखण्ड

२४९

है। जो मानव 'स्वधा, स्वधा, स्वधा' इस पवित्र नामका त्रिकाल संध्याके समय पाठ करता है, उसे विनीत, पतिव्रता एवं प्रिय पत्नी प्राप्त होती है तथा सद्गुणसम्पन्न पुत्रका लाभ होता है। देवि! तुम पितरोंके लिये प्राणतुल्या और ब्राह्मणोंके लिये जीवनस्वरूपिणी हो। तुम्हें श्राद्धकी अधिष्ठात्री देवी कहा गया है। तुम्हारी ही कृपासे श्राद्ध और तर्पण आदिके फल मिलते हैं। तुम पितरोंकी तुष्टि, द्विजातियोंकी प्रीति तथा गृहस्थोंकी अभिवृद्धिके लिये मुझ ब्रह्माके मनसे निकलकर बाहर जाओ। सुव्रते! तुम नित्य हो, तुम्हारा विग्रह नित्य और गुणमय है। तुम सृष्टिके समय प्रकट होती हो और प्रलयकालमें तुम्हारा तिरोभाव हो जाता है। तुम ॐ, नमः, स्वस्ति, स्वाहा, स्वधा एवं दक्षिणा हो। चारों वेदोंद्वारा तुम्हारे इन छः स्वरूपोंका निरूपण किया गया है, कर्मकाण्डी लोगोंमें इन छहोंकी बड़ी मान्यता है*।

इस प्रकार देवी स्वधाकी महिमा गाकर ब्रह्माजी अपनी सभामें विराजमान हो गये। इतनेमें सहसा भगवती स्वधा उनके सामने प्रकट हो गयीं। तब पितामहने उन कमलनयनी देवीको पितरोंके प्रति समर्पण कर दिया। उन देवीकी प्राप्तिसे पितर अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे आनन्दसे विह्वल हो गये। यही भगवती स्वधाका पुनीत स्तोत्र है। जो पुरुष समाहित-चित्तसे इस स्तोत्रका श्रवण करता है, उसने मानो सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान कर लिया। उसको वेदपाठका फल मिलता है।

(अध्याय ४०-४१)


भगवती दक्षिणाके प्राकट्यका प्रसङ्ग, उनका ध्यान, पूजा-विधान तथा स्तोत्र-वर्णन एवं चरित्र-श्रवणकी फल-श्रुति

**भगवान् नारायण कहते हैं—**मुने! भगवती स्वाहा और स्वधाका परम मधुर उत्तम उपाख्यान सुना चुका। अब मैं भगवती दक्षिणाके आख्यानका वर्णन करूँगा। तुम सावधान होकर सुनो। प्राचीन कालकी बात है, गोलोकमें भगवान् श्रीकृष्णकी प्रेयसी एक गोपी थी। उसका नाम सुशीला था। उसे श्रीराधाकी प्रधान सखी होनेका सौभाग्य प्राप्त था। वह धन्य, मान्य एवं मनोहर अङ्गवाली गोपी परम सुन्दरी थी। सौभाग्यमें वह लक्ष्मीके समान थी। उसमें पातिव्रत्यके सभी शुभ लक्षण संनिहित थे। वह साध्वी गोपी विद्या, गुण और उत्तम रूपसे सदा सुशोभित थी। कलावती, कोमलाङ्गी, कान्ता, कमललोचना, सुश्रोणी, सुस्तनी, श्यामा और न्यग्रोधपरिमण्डला—ये सभी विशेषण उसमें उपयुक्त थे। उसका प्रसन्न मुख सदा मुस्कानसे भरा रहता था। रत्नमय अलंकार उसकी शोभा बढ़ाते थे। उसके शरीरकी कान्ति श्वेत चम्पाके समान गौर थी। बिम्बाफलके समान लाल-लाल ओष्ठ तथा मृगके सदृश मनोहर नेत्र थे। हंसके समान मन्दगतिसे चलनेवाली उस कामिनी


* स्वधा स्वधा स्वधेत्येवं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः। प्रियां विनीतां स लभेत् साध्वीं पुत्रं गुणान्वितम्॥
पितॄणां प्राणतुल्या त्वं द्विजजीवनरूपिणी। श्राद्धाधिष्ठातृदेवी च श्राद्धादीनां फलप्रदा॥
...........................................................................
नित्या त्वं नित्यरूपासि गुणरूपास सुव्रते। आविर्भावस्तिरोभावः सृष्टौ च प्रलये तव॥
ॐ स्वस्तिश्च नमः स्वाहा स्वधा त्वं दक्षिणा तथा। निरूपिताश्चतुर्वेदैः षट् प्रशस्ताश्च कर्मिणाम्॥
(प्रकृतिखण्ड ४१। ३०-३१, ३३-३४)