ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड २८३
चार अंगुल लंबे चार कीलोंसे छेद कर दिये जायँ। फिर उस पात्रको जलके ऊपर रख दिया जाय। उन छिद्रोंसे पानी आकर जितनी देरमें वह पात्र भर दे, उतने समयको एक दण्ड कहते हैं। दो दण्डका एक मुहूर्त और चार मुहूर्तोंका एक प्रहर होता है। आठ प्रहरोंसे एक दिन-रातकी पूर्ति होती है। पंद्रह दिन-रातको एक पक्ष कहते हैं। दो पक्षोंका एक मास और बारह मासका एक वर्ष होता है। मनुष्योंके एक मासमें जितना समय व्यतीत होता है, वह पितरोंका एक दिन-रात है। कृष्णपक्षमें उनका दिन कहा गया है और शुक्लपक्षमें रात्रि। मनुष्योंके एक वर्षमें देवताओंके एक दिन-रातकी पूर्ति होती है। उत्तरायणमें उनका दिन होता है और दक्षिणायनमें रात्रि। नरेश्वर! मनुष्य आदिकी अवस्था युग एवं कर्मके अनुरूप होती है। अब प्रकृति, प्राकृत पदार्थ एवं ब्रह्मा आदिकी आयुका परिमाण सुनो। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चारोंको एक चतुर्युग कहते हैं। इनकी काल-संख्या बारह हजार दिव्य वर्ष है। सावधान होकर सुनो, सत्ययुग आदिका कालमान क्रमशः चार, तीन, दो और एक दिव्य वर्ष है। उनकी संध्या और संध्यांशकाल दो हजार दिव्य वर्षोंके बताये गये हैं*। मनुष्योंके मानसे चारों युगोंका परिमाण तैंतालीस लाख बीस हजार वर्ष है। इनमें गणनाके विद्वानोंने सत्ययुगका मान मनुष्योंके वर्षसे सत्रह लाख अट्ठाईस हजार बताया है। इसी तरह त्रेताका कालमान बारह लाख छियानबे हजार मानव-वर्ष है। द्वापरका आठ लाख चौंसठ हजार तथा कलियुगका चार लाख बत्तीस हजार मानव-वर्ष है।
जैसे सात वार, सोलह तिथियाँ, दिन-रात, दो पक्ष, बारह मास और वर्ष चक्रवत् घूमते रहते हैं, उसी प्रकार चारों युगोंका चक्र भी सदा ही चलता रहता है। राजेन्द्र! जैसे युग परिवर्तित होते हैं, उसी प्रकार मन्वन्तर भी। इकहत्तर दिव्य युगोंका एक मन्वन्तर होता है। इसी क्रमसे चौदह मनु भ्रमण करते रहते हैं।
नरेश्वर! मैंने भगवान् शंकरके मुखसे धर्मात्मा मनुओंका जो आख्यान सुना है, वह बता रहा हूँ। तुम मुझसे सुनो। आदिमनु ब्रह्माजीके पुत्र हैं। इसलिये उन्हें स्वायम्भुव मनु कहा गया है। उनकी पत्नी पतिव्रता शतरूपा हैं। स्वायम्भुव मनु धर्मात्माओंमें वरिष्ठ और मनुओंमें गरिष्ठ हैं। वे तुम्हारे प्रपितामह लगते हैं। उन्होंने भगवान् शंकरका शिष्यत्व ग्रहण किया है। वे विष्णुव्रतका पालन करनेवाले जीवन्मुक्त एवं महाज्ञानी थे। उन्होंने भगवान् शंकरकी आज्ञासे भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये प्रतिदिन एक लाख बहुमूल्य रत्न, दस करोड़ स्वर्णमुद्रा, सोनेके सींगसे सुशोभित एवं सुपूजित एक लाख दिव्य धेनु, अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र, एक लाख श्रेष्ठ मणि, सब प्रकारकी
* इस विषयका स्पष्टीकरण यों समझना चाहिये। सत्ययुग चार हजार दिव्य वर्षोंका होता है। युगके आरम्भमें चार सौ दिव्य वर्षोंकी संध्या होती है और युगके अन्तमें चार सौ दिव्य वर्षोंका संध्यांशकाल होता है। इस प्रकार सत्ययुगका कालमान चार हजार आठ सौ दिव्य वर्ष है। त्रेताका संध्यामान तीन सौ दिव्य वर्ष, युगमान तीन सहस्र दिव्य वर्ष और संध्यांशमान तीन सौ दिव्य वर्ष। इस तरह त्रेताका सम्पूर्ण कालमान तीन हजार छः सौ दिव्य वर्ष है। द्वापरका संध्यामान दो सौ दिव्य वर्ष, युगमान दो हजार दिव्य वर्ष और संध्यांशमान दो सौ दिव्य वर्ष है। ये सब मिलाकर दो हजार चार सौ दिव्य वर्ष होते हैं। इसी तरह कलियुगका संध्यामान एक सौ दिव्य वर्ष, युगमान एक सहस्र दिव्य वर्ष और संध्यांशमान एक सौ दिव्य वर्ष है। इस प्रकार कलियुगका पूरा मान बारह सौ दिव्य वर्ष है। इन चार युगोंका सम्मिलित कालमान बारह हजार दिव्य वर्ष है।