ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८८ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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विमानद्वारा राजाको साथ ले गोलोकमें चली गयीं। राजाने विरजा नदी तथा मनोहर शतशृङ्ग पर्वतसे घिरे हुए, श्रीवृन्दावनसे युक्त तथा रासमण्डलसे मण्डित गोलोकका दर्शन किया। वह धाम गौओं, गोपियों और गोपसमूहोंसे सेवित तथा रत्नेन्द्रसारसे निर्मित अत्यन्त मनोहर भवनोंद्वारा सुशोभित हो रहा था। भाँति-भाँतिके चित्र-विचित्र दृश्य उसकी शोभा बढ़ाते थे तथा वह कल्पवृक्षयुक्त सैंतीस उपवनोंसे शोभायमान था। उन उपवनोंमें पारिजातके वृक्ष भी भरे हुए थे। सारा गोलोक कामधेनुओंसे आवेष्टित था। आकाशकी भाँति विपुल विस्तारसे युक्त तथा चन्द्रमण्डलके समान गोलाकार था। वैकुण्ठसे पचास करोड़ योजन ऊपर वह शून्यमें बिना किसी आधारके स्थित है और भगवान्की इच्छासे ही सुस्थिर है। आत्माकाशके समान नित्य है और हमलोगोंके लिये भी परम दुर्लभ है। मैं, नारायण, अनन्त, ब्रह्मा, विष्णु, महाविराट् धर्म, क्षुद्र विराट्, गङ्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, तुम (पार्वती), विष्णुमाया, सावित्री, तुलसी, गणेश, सनत्कुमार, स्कन्द, नर-नारायण ऋषि, कपिल, दक्षिणा, यज्ञ, ब्रह्मपुत्र, योगी, वायु, वरुण, चन्द्रमा, सूर्य, रुद्र, अग्नि तथा कृष्णमन्त्रके उपासक भारतीय वैष्णव—इन सबने ही गोलोकको देखा है। दूसरोंने इसे कभी नहीं देखा है।
उस गोलोकधाममें श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण निरामय रत्नसिंहासनपर विराजमान हैं। रत्नोंके हार, किरीट तथा रत्नमय भूषणोंसे वे विभूषित हैं। अग्निशुद्ध, अत्यन्त निर्मल चिन्मय पीताम्बर उनके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाता है। उनके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित हैं। वे किशोर गोपबालकके रूपमें दिखायी देते हैं। नूतन जलधरके समान श्याम कान्ति, श्वेत कमलके समान नेत्र, शरत्की पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलको तिरस्कृत करनेवाला मन्द हास्यसे सुशोभित मुख, मनोहर आकृति, दो भुजाएँ और हाथोंमें मुरली—यही उनके रूपकी झाँकी है। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही वे दिव्य विग्रह धारण करते हैं। श्रीकृष्ण स्वेच्छामय (परम स्वतन्त्र), प्रकृतिसे परे, परब्रह्मस्वरूप निर्गुण परमात्मा हैं। ध्यानसे भी वे वशमें आनेवाले नहीं हैं। उनकी आराधना बहुत कठिन है। वे हमारे लिये भी परम दुर्लभ हैं। उनके प्रिय सखा बारह ग्वालबाल सफेद चँवर लिये उनकी सेवा करते हैं। प्रेमपीडिता, सुस्थिरयौवना, वह्निशुद्ध चिन्मय वस्त्रधारिणी, रत्नभूषणभूषिता एवं परम मनोहारिणी गोपिकाएँ मन्द-मन्द मुस्कराती हुई उनकी छवि निहारती रहती हैं। रासमण्डलके मध्यभागमें परात्पर पुरुष श्रीकृष्णके राजा सुयज्ञने इसी रूपमें दर्शन किये। श्रीराधाने ही वहाँ उन्हें अपने प्राणवल्लभके दर्शन कराये थे। चारों वेद मनोहर मूर्ति धारण करके उनके दर्शन करते थे। राग-रागिनियाँ भी मूर्तिमती होकर वाद्ययन्त्र और मुखसे उन्हें अत्यन्त मनोहर संगीत सुनाती थीं। शिवे! नित्य सनातनी प्रकृतिके साथ तुम भी सदा उनके चरणारविन्दोंकी सेवा करती हो। वे तुलसीदलसे मण्डित होते हैं तथा कस्तूरी, कुङ्कुम, गन्ध, चन्दन, दूर्वा, अक्षत,