भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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प्रकृतिखण्ड २८९

पारिजातपुष्प तथा विरजाके निर्मल जलसे उनके लिये नित्य अर्घ्य दिया जाता है। उस समय उनकी बड़ी शोभा होती है। वे सुप्रसन्न, स्वतन्त्र, समस्त कारणोंके भी कारण, सर्वान्तरात्मा, सर्वेश्वर, सर्वजीवन, सर्वाधार, परमपूज्य, सनातन ब्रह्मज्योति, सर्वसम्पत्तिस्वरूप, सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता, सर्वमङ्गलस्वरूप, सर्वमङ्गलकारण, सर्वमङ्गलदाता तथा समस्त मङ्गलोंके भी मङ्गल हैं।

श्रीकृष्णका दर्शन करके सशङ्कित हो राजा सुयज्ञ तुरंत रथसे उतर पड़े और नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए पुलकित शरीरसे भगवान्‌के चरणोंमें मस्तक रखकर उन्होंने प्रणाम किया। परमात्मा श्रीकृष्णने राजाको अपना दासत्व, शुभाशीर्वाद तथा वह सत्य एवं अविचल श्रीकृष्णभक्ति प्रदान की, जो हमलोगोंके लिये भी परम दुर्लभ है। तदनन्तर श्रीराधा अपने रथसे उतरकर श्रीकृष्णके वक्षमें विराजमान हो गयीं। उनकी अत्यन्त प्यारी गोपियाँ सफेद चँवर लिये उनकी सेवामें लग गयीं। उनके आनेपर श्रीकृष्ण भक्ति और आदरसे सहसा उठकर खड़े हो गये। उन्होंने मन्द मुसकानके साथ श्रीराधाके साथ वार्तालाप और उनका सम्मान किया। प्राचीनकालके वे वेदवेत्ता विद्वान् वेदोंके कथनानुसार पहले राधा नामका उच्चारण करके पीछे कृष्ण या माधव कहते हैं। जो इसके विपरीत उच्चारण करते या उन जगदम्बा श्रीकृष्णप्राणाधिका एवं प्रेममयी शक्ति श्रीराधिकाकी निन्दा करते हैं, वे चन्द्रमा तथा सूर्यकी स्थितिपर्यन्त कालसूत्र नरकमें यातना भोगते हैं। तत्पश्चात् सौ वर्षोंतक स्त्री-पुत्रसे रहित तथा रोगी होते हैं।

दुर्गे! इस प्रकार मैंने परम उत्तम राधिकाख्यानका वर्णन किया है। वह सती भगवती वैष्णवी, सनातनी, नारायणी, विष्णुमाया, मूलप्रकृति एवं ईश्वरी नाम धारण करनेवाली तुम्हीं हो। मायाका आश्रय लेकर मुझसे पूछ रही हो। तुम स्वयं ही सर्वज्ञा, सर्वरूपिणी, स्त्रीजातिकी अधिदेवी तथा पूर्वजन्मकी बातोंको याद रखनेवाली श्रेष्ठ पराशक्ति हो। राधिकाकी कथा तो मैंने सुना दी, अब और क्या सुनना चाहती हो ? (अध्याय ५४)


श्रीराधाके ध्यान, षोडशोपचार-पूजन, परिचारिकापूजन, परिहारस्तवन, पूजन-महिमा तथा स्तुति एवं उसके माहात्म्यका वर्णन

**श्रीपार्वतीने पूछा—**भगवान्! आप पुरुषोंके ईश्वर श्रीकृष्णके मन्त्रके होते हुए उन वैष्णवनरेश सुयज्ञने राधाका मन्त्र क्यों ग्रहण किया ? सुतपाने राजाको श्रीराधाकी पूजाका कौन-सा विधान बताया ? तथा किस ध्यान, किस स्तोत्र, किस कवच और किस मन्त्रका उपदेश दिया ? श्रीराधाकी पूजापद्धति क्या है ? ये सब बातें बताइये।

**श्रीमहेश्वर बोले—**प्रिये! राजाने यह प्रश्न किया था कि 'हे विप्र! हे मुने! मैं किसका भजन करूँ? किसकी आराधनासे शीघ्र गोलोक प्राप्त कर लूँगा?' उनके ऐसा कहनेपर उन ब्राह्मणशिरोमणिने राजेन्द्र सुयज्ञसे कहा—'महाराज! श्रीकृष्णकी सेवासे उनके लोकको तुम बहुत जन्मोंमें प्राप्त करोगे, अतः उनके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी परात्परस्वरूपा श्रीराधाका भजन करो। वे कृपामयी हैं। उनके प्रसादसे साधक शीघ्र ही उनके धामको प्राप्त कर लेता है'—ऐसा कहकर मुनिने उन्हें राधाके इस षडक्षर-मन्त्रका उपदेश दिया। वह मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ राधायै स्वाहा।' इसके बाद प्राणायाम, भूतशुद्धि, मन्त्रन्यास, करन्यास, अङ्गन्यास, उनके सर्व-दुर्लभ ध्यान, स्तोत्र और कवचकी भक्तिभावसे राजाको शिक्षा दी। राजाने उसी क्रमसे उस मन्त्रका जप किया। साथ ही श्रीकृष्णने पूर्वकालमें जिस ध्यानके द्वारा श्रीराधाका चिन्तन एवं पूजन किया था, उसी सामवेदोक्त ध्यानके अनुसार उनके स्वरूपका चिन्तन किया। वह ध्यान मङ्गलोंके लिये भी मङ्गलकारी है।

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