भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 342
३३२संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भारतवर्षमें भक्तिपूर्वक अतिथिका पूजन कर लिया, उसके द्वारा मानो भूतलपर सम्पूर्ण महादान कर लिये गये; क्योंकि वेदोंमें वर्णित जो नाना प्रकारके पुण्य हैं, वे तथा उनके अतिरिक्त अन्य पुण्यकर्म भी अतिथि-सेवाकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकते। इसलिये जिसके घरसे अतिथि अनादृत होकर लौट जाता है, उस गृहस्थके पितर, देवता, अग्नि और गुरुजन भी तिरस्कृत हो उस अतिथिके पीछे चले जाते हैं। जो अपने अभीष्ट अतिथिकी अर्चना नहीं करता, वह बड़े-बड़े पापोंको प्राप्त करता है।

ब्राह्मणने कहा— वेदज्ञे! आप तो वेदोंके ज्ञानसे सम्पन्न हैं, अतः वेदोक्त विधिसे पूजन कीजिये। माता! मैं भूख-प्याससे पीड़ित हूँ। मैंने श्रुतियोंमें ऐसा वचन भी सुना है कि जब मनुष्य व्याधियुक्त, आहाररहित अथवा उपवास-व्रती होता है, तब वह स्वेच्छानुसार भोजन करना चाहता है।

पार्वतीजीने पूछा— विप्रवर! आप क्या भोजन करना चाहते हैं? वह यदि त्रिलोकीमें परम दुर्लभ होगा तो भी आज मैं आपको खिलाऊँगी। आप मेरा जन्म सफल कीजिये।

ब्राह्मणने कहा— सुव्रते! मैंने सुना है कि उत्तम व्रतपरायणा आपने पुण्यक-व्रतमें सभी प्रकारका भोजन एकत्रित किया है, अतः उन्हीं अनेक प्रकारके मिष्ठान्नोंको खानेके लिये मैं आया हूँ। मैं आपका पुत्र हूँ। जो मिष्ठान्न तीनों लोकोंमें दुर्लभ हैं, उन पदार्थोंको मुझे देकर आप सबसे पहले मेरी पूजा करें। साध्वि! वेदवादियोंका कथन है कि पिता पाँच प्रकारके होते हैं। माताएँ अनेक तरहकी कही जाती हैं और पुत्रके पाँच भेद हैं। विद्यादाता (गुरु), अन्नदाता, भयसे रक्षा करनेवाला, जन्मदाता (पिता) और कन्यादाता (श्वशुर)—ये मनुष्योंके वेदोक्त पिता कहे गये हैं। गुरुपत्नी, गर्भधात्री (जननी), स्तनदात्री (धाय), पिताकी बहिन (बुआ), माताकी बहिन (मौसी), माताकी सपत्नी (सौतेली माता), अन्न प्रदान करनेवाली (पाचिका) और पुत्रवधू—ये माताएँ कहलाती हैं। भृत्य, शिष्य, दत्तक, वीर्यसे उत्पन्न (औरस) और शरणागत—ये पाँच प्रकारके पुत्र हैं। इनमें चार धर्मपुत्र कहलाते हैं और पाँचवाँ औरस पुत्र धनका भागी होता है*। माता! मैं आप पुत्रहीनाका ही अनाथ पुत्र हूँ, वृद्धावस्थासे ग्रस्त हूँ और इस समय भूख-प्याससे पीड़ित होकर आपकी शरणमें आया हूँ। गिरिराजकिशोरी! अन्नोंमें श्रेष्ठ पूड़ी, उत्तम-उत्तम पके फल, आटेके बने हुए नाना प्रकारके पदार्थ, काल-देशानुसार उत्पन्न हुई वस्तुएँ, पक्वान्न, चावलके आटेका बना हुआ तिकोना पदार्थविशेष, दूध, गन्ना, गुड़के बने हुए द्रव्य, घी, दही, अगहनीका भात, घृतमें पका हुआ व्यञ्जन, गुड़मिश्रित तिलोंके लड्डू, मेरी जानकारीसे बाहर सुधा-तुल्य अन्य वस्तुएँ, कर्पूर आदिसे सुवासित सुन्दर श्रेष्ठ ताम्बूल, अत्यन्त निर्मल तथा स्वादिष्ट जल—इन सभी सुवासित पदार्थोंको, जिन्हें खाकर मेरी सुन्दर तोंद हो जाय, मुझे प्रदान कीजिये।

आपके स्वामी सारी सम्पत्तियोंके दाता तथा त्रिलोकीके सृष्टिकर्ता हैं और आप सम्पूर्ण ऐश्वर्योंको प्रदान करनेवाली महालक्ष्मीस्वरूपा हैं; अतः आप मुझे रमणीय रत्नसिंहासन, अमूल्य रत्नोंके आभूषण, अग्निशुद्ध सुन्दर वस्त्र, अत्यन्त दुर्लभ श्रीहरिका मन्त्र, श्रीहरिमें सुदृढ़ भक्ति,


* विद्यादातान्नदाता च भयत्राता च जन्मदः। कन्यादाता च वेदोक्ता नराणां पितरः स्मृताः॥
गुरुपत्नी गर्भधात्री स्तनदात्री पितुः स्वसा। स्वसा मातुः सपत्नी च पुत्रभार्यान्नदायिका॥
भृत्यः शिष्यश्च पोष्यश्च वीर्यजः शरणागतः। धर्मपुत्राश्च चत्वारो वीर्यजो धनभागिति॥
(गणपतिखण्ड ८। ४७–४९)