ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगणपतिखण्ड ३३५
हैं। अब कहाँ वह वृद्ध और कहाँ वह अतिथि ? नारद! यों कहकर सरस्वती चुप हो गयीं।
तब उस आकाशवाणीको सुनकर सती पार्वती भयभीत हो अपने महलमें गयीं। वहाँ उन्होंने पलंगपर सोये हुए बालकको देखा। वह आनन्दपूर्वक मुस्कराते हुए महलकी छतके भीतरी भागको निहार रहा था। उसकी प्रभा सैकड़ों चन्द्रमाओंके तुल्य थी। वह अपने प्रकाशसमूहसे भूतलको प्रकाशित कर रहा था। हर्षपूर्वक स्वेच्छानुसार इधर-उधर देखते हुए शय्यापर उछल-कूद रहा था और स्तनपानकी इच्छासे रोते हुए ‘उमा’ ऐसा शब्द कर रहा था। उस अद्भुत रूपको देखकर सर्वमङ्गला पार्वती त्रस्त हो शंकरजीके संनिकट गयीं और उन प्राणेश्वरसे मङ्गल-वचन बोलीं।
पार्वतीने कहा—प्राणपति! घर चलिये और मन्दिरके भीतर चलकर प्रत्येक कल्पमें आप जिसका ध्यान करते हैं तथा जो तपस्याका फलदाता है, उसे देखिये। जो पुण्यका बीज, महोत्सवस्वरूप, ‘पुत्’ नामक नरकसे रक्षा करनेका कारण और भवसागरसे पार करनेवाला है, शीघ्र ही उस पुत्रके मुखका अवलोकन कीजिये; क्योंकि समस्त तीर्थोंमें स्नान तथा सम्पूर्ण यज्ञोंमें दीक्षा-ग्रहणका पुण्य इस पुत्रदर्शनके पुण्यकी सोलहवीं कलाकी समानता नहीं कर सकता। सर्वस्व दान कर देनेसे जो पुण्य होता है तथा पृथ्वीकी प्रदक्षिणा करनेसे जिस पुण्यकी प्राप्ति होती है, वे सभी इस पुत्रदर्शन जन्य पुण्यके सोलहवें अंशके भी बराबर नहीं हैं।
पार्वतीके ये वचन सुनकर शिवजीका मन हर्षमग्न हो गया। वे तुरंत ही अपनी प्रियतमाके साथ अपने घर आये। वहाँ उन्होंने शय्यापर अपने पुत्रको देखा। उसकी कान्ति तपाये हुए स्वर्णके समान उद्दीप्त थी। (फिर सोचने लगे—) मेरे हृदयमें जो अत्यन्त मनोहर रूप विद्यमान था, यह तो वही है। तत्पश्चात् दुर्गाने उस पुत्रको शय्यापरसे उठा लिया और उसे छातीसे लगाकर वे उसका चुम्बन करने लगीं। उस समय वे आनन्द-सागरमें निमग्न होकर यों कहने लगीं—‘बेटा! जैसे दरिद्रका मन सहसा उत्तम धन पाकर संतुष्ट हो जाता है, उसी तरह तुझ सनातन अमूल्य रत्नकी प्राप्तिसे मेरा मनोरथ पूर्ण हो गया। जैसे चिरकालसे प्रवासी हुए प्रियतमके घर लौटनेपर स्त्रीका मन पूर्णतया हर्षमग्न हो जाता है, वही दशा मेरे मनकी भी हो रही है। वत्स! जैसे एक पुत्रवाली माता चिरकालसे बाहर गये हुए अपने इकलौते पुत्रको आया हुआ देखकर परितुष्ट होती है, वैसे ही इस समय मैं भी संतुष्ट हो रही हूँ। जैसे मनुष्य चिरकालसे नष्ट हुए उत्तम रत्नको तथा अनावृष्टिके समय उत्तम वृष्टिको पाकर हर्षसे फूल उठता है, उसी प्रकार तुझ पुत्रको पाकर मैं भी हर्ष-गद्गद हो रही हूँ। जैसे चिरकालके पश्चात् आश्रयहीन अंधेका मन परम निर्मल नेत्रकी प्राप्तिसे प्रसन्न हो जाता है, वही अवस्था (तुझे पाकर) मेरे मनकी भी हो रही है। जैसे दुस्तर अगाध सागरमें गिरे हुए अथवा विपत्तिमें फँसे हुए नौका आदि