भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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पृष्ठ 350
३४०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

भाँति भूमिपर गिरकर मूर्च्छित हो गयीं। तब वहाँ उपस्थित सभी देवता, देवियाँ, पर्वत, गन्धर्व, शिव तथा कैलासवासी जन यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित हो गये। उस समय उनकी दशा चित्रलिखित पुत्तलिकाके समान जड़ हो गयी।

इस प्रकार उन सबको मूर्च्छित देखकर श्रीहरि गरुड़पर सवार हुए और उत्तरदिशामें स्थित पुष्पभद्राके निकट गये। वहाँ पुष्पभद्रा नदीके तटपर वनमें स्थित एक गजेन्द्रको देखा, जो निद्राके वशीभूत हो बच्चोंसे घिरकर हथिनीके साथ सो रहा था। उसका सिर उत्तर दिशाकी ओर था, मन परमानन्दसे पूर्ण था और वह सुरतके परिश्रमसे थका हुआ था। फिर तो श्रीहरिने शीघ्र ही सुदर्शनचक्रसे उसका सिर काट लिया और रक्तसे भीगे हुए उस मनोहर मस्तकको बड़े हर्षके साथ गरुड़पर रख लिया। गजके कटे हुए अङ्गके गिरनेसे हथिनीकी नींद टूट गयी। तब अमङ्गल शब्द करती हुई उसने अपने शावकोंको भी जगाया। फिर वह शोकसे विह्वल हो शावकोंके साथ बिलख-बिलखकर चीत्कार करने लगी। तत्पश्चात् जो लक्ष्मीके स्वामी हैं, जिनका स्वरूप परम शान्त है; जिनके करकमलोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म शोभा पाते हैं; जो पीताम्बरधारी, परात्पर, जगत्के स्वामी, निषेकका खण्डन करनेमें समर्थ, निषेकको उत्पन्न करनेवाले, सर्वव्यापक, निषेकके भोगके दाता और भोगके निस्तारके कारणस्वरूप हैं तथा जो गरुड़पर आरूढ़ हो मुस्कराते हुए सुदर्शनचक्रको घुमा रहे हैं—उन परमेश्वरका उसने स्तवन किया। विप्रवर! उसकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर भगवान्‌ने उसे वर दिया और दूसरे गजका मस्तक काटकर इसके धड़से जोड़ दिया। फिर उन ब्रह्मवेत्ताने ब्रह्मज्ञानसे उसे जीवित कर दिया और उस गजेन्द्रके सर्वाङ्गमें अपने चरणकमलका स्पर्श कराते हुए कहा—'गज! तू अपने कुटुम्बके साथ एक कल्पपर्यन्त जीवित रह।' यों कहकर मनके समान वेगशाली भगवान् कैलासपर आ पहुँचे। वहाँ पार्वतीके वासस्थानपर आकर उन्होंने उस बालकको अपनी छातीसे चिपटा लिया और उस हाथीके मस्तकको सुन्दर बनाकर बालकके धड़से जोड़ दिया। फिर ब्रह्मस्वरूप भगवान्‌ने ब्रह्मज्ञानसे हुंकारोच्चारण किया और खेल-खेलमें ही उसे जीवित कर दिया। पुनः श्रीकृष्णने पार्वतीको सचेत करके उस शिशुको उनकी गोदमें रख दिया और आध्यात्मिक ज्ञानद्वारा पार्वतीको समझाना आरम्भ किया।

**विष्णुने कहा—**शिवे! तुम तो जगत्की बुद्धिस्वरूपा हो। क्या तुम नहीं जानतीं कि ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सारा जगत् अपने कर्मानुसार फल भोगता है। प्राणियोंका जो स्वकर्मार्जित भोग है, वह सौ करोड़ कल्पोंतक प्रत्येक योनिमें शुभ-अशुभ फलरूपसे नित्य प्राप्त होता रहता है। सती! इन्द्र अपने कर्मवश कीड़ेकी योनिमें जन्म ले सकते हैं और कीड़ा पूर्वकर्मफलानुसार इन्द्र भी हो सकता है। पूर्वजन्मार्जित कर्मफलके बिना सिंह मक्खीको भी मारनेमें असमर्थ है और मच्छर अपने प्राक्तन कर्मके बलसे हाथीको भी मार डालनेकी शक्ति रखता है। सुख-दुःख, भय-शोक, आनन्द—ये कर्मके ही फल हैं। इनमें सुख और हर्ष उत्तम कर्मके और अन्य पापकर्मके परिणाम हैं*। कर्मका भोग शुभ-अशुभ-रूपसे इहलोक अथवा परलोकमें प्राप्त होता है, परंतु कर्मोपार्जनके योग्य पुण्यक्षेत्र भारत ही है। स्वयं श्रीकृष्ण कर्मके फलदाता, विधिके विधाता, मृत्युके भी मृत्यु, कालके काल, निषेकके


*सुखं दुःखं भयं शोकमानन्दं कर्मणः फलम्। सुकर्मणः सुखं हर्षमितरे पापकर्मणः॥
(गणपतिखण्ड १२। २७)

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