भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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गणपतिखण्ड ३४१

निषेककर्ता, संहर्ताके भी संहारक, पालकके भी पालक, परात्पर, परिपूर्णतम गोलोकनाथ हैं। हम ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर जिस पुरुषकी कलाएँ हैं, महाविराट् जिसका अंश है, जिसके रोम-विवरमें जगत् भरे हैं, कोई-कोई उनके कलांश हैं और कोई-कोई कलांशके भी अंश हैं और जो सम्पूर्ण चराचर जगत्-स्वरूप हैं, उन्हीं श्रीकृष्णमें विनायक स्थित हैं।

इस प्रकार श्रीविष्णुका कथन सुनकर पार्वतीका मन संतुष्ट हो गया। तब वे उन गदाधर भगवान्को प्रणाम करके शिशुको दूध पिलाने लगीं। तदनन्तर प्रसन्न हुई पार्वतीने शंकरजीकी प्रेरणासे अञ्जलि बाँधकर भक्तिपूर्वक उन कमलापति भगवान् विष्णुकी स्तुति की। तब विष्णुने शिशुको तथा शिशुकी माताको आशीर्वाद दिया और अपने आभूषण कौस्तुभमणिको बालकके गलेमें डाल दिया। ब्रह्माने अपना मुकुट और धर्मने रत्नका आभूषण दिया। फिर क्रमशः देवियोंने तथा उपस्थित सभी देवताओं, मुनियों, पर्वतों, गन्धर्वों और समस्त महिलाओंने यथोचितरूपसे रत्न प्रदान किये। उस समय महादेवजीका हृदय अत्यन्त हर्षमग्न था। वे विष्णुका स्तवन करने लगे। नारद! वहाँ मरकर जीवित हुए बालकको देखकर शिव-पार्वतीने ब्राह्मणोंको असंख्य रत्न दान किये। मरे हुए बालकके जी उठनेपर हर्षगद्गद हुए हिमालयने वन्दियोंको एक सौ हाथी और एक सहस्र घोड़े प्रदान किये तथा देवगण हर्षित होकर ब्राह्मणोंको और सभी नारियोंने वन्दियोंको दान दिया। लक्ष्मीपति विष्णुने माङ्गलिक कार्य सम्पन्न कराया, ब्राह्मणोंको भोजनसे तृप्त किया और वेदों तथा पुराणोंका पाठ कराया। तत्पश्चात् शनैश्चरको लज्जायुक्त देखकर पार्वतीको क्रोध आ गया और उन्होंने उस सभाके बीच शनैश्चरको यों शाप देते हुए कहा—'तुम अङ्गहीन हो जाओ।' (अध्याय १२)


विष्णु आदि देवताओंद्वारा गणेशकी अग्रपूजा, पार्वतीकृत विशेषोपचारसहित गणेशपूजन, विष्णुकृत गणेशस्तवन और 'संसारमोहन' नामक कवचका वर्णन

**श्रीनारायणजी कहते हैं—**नारद! तदनन्तर विष्णुने शुभ समय आनेपर देवों तथा मुनियोंके साथ सर्वश्रेष्ठ उपहारोंसे उस बालकका पूजन किया और उससे यों कहा—'सुरश्रेष्ठ! मैंने सबसे पहले तुम्हारी पूजा की है; अतः वत्स! तुम सर्वपूज्य तथा योगीन्द्र होओ।' यों कहकर श्रीहरिने उसके गलेमें वनमाला डाल दी और उसे मुक्तिदायक ब्रह्मज्ञान तथा सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करके अपने समान बना दिया। फिर षोडशोपचारकी सुन्दर वस्तुएँ दीं और मुनियों तथा देवोंके साथ उसका इस प्रकार नामकरण किया—विघ्नेश, गणेश, हेरम्ब, गजानन, लम्बोदर, एकदन्त, शूर्पकर्ण और विनायक—उसके ये आठ नाम रखे गये। पुनः सनातन श्रीहरिने उन मुनियोंको बुलवाकर उसे आशीर्वाद दिलाया। तदनन्तर सभी देव-देवियोंने तथा मुनियों आदिने अनेक प्रकारके उपहार गणेशको दिये और फिर क्रमशः उन्होंने भक्तिपूर्वक उसकी पूजा की।

नारद! तदनन्तर जगज्जननी पार्वतीने, जिनका मुखकमल हर्षके कारण विकसित हो रहा था, अपने पुत्रको रत्ननिर्मित सिंहासनपर बैठाया। फिर उन्होंने आनन्दपूर्वक समस्त तीर्थोंके जलसे भरे हुए सौ कलशोंसे मुनियोंद्वारा वेद-मन्त्रोच्चारणपूर्वक उसे स्नान कराया और अग्निमें तपाकर शुद्ध किये हुए दो वस्त्र दिये। फिर पाद्यके लिये गोदावरीका जल, अर्घ्यके निमित्त गङ्गाजल और आचमनके हेतु दूर्वा, अक्षत, पुष्प और चन्दनसे युक्त पुष्करका जल लाकर दिया। रत्नपात्रमें रखे हुए