ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 393, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ेंगणपतिखण्ड ३८३ शब्द और विजयसूचक बादलोंकी गड़गड़ाहट सुनायी पड़ी। उसी समय आकाशवाणी भी हुई कि 'तुम्हारी विजय होगी।' इस तरह अनेक प्रकारके शुभ शब्दोंको सुनते हुए भगवान् परशुरामने यात्रा आरम्भ की। चलते ही उन्होंने अपने आगे ब्राह्मण, वन्दी, ज्योतिषी और भिक्षुकको देखा। फिर नाना प्रकारके आभूषणोंसे सजी हुई एक पति-पुत्रसम्पन्ना सती नारी हाथमें प्रज्वलित दीपक लिये हुए मुस्कराती हुई सामने आयी। चलते- चलते परशुरामने अपने दाहिनी ओर यात्राके समय मङ्गलकी सूचना देनेवाले शव, शृगाली, जलसे पूर्ण घट, नीलकण्ठ, नेवला, कृष्णसार मृग, हाथी, सिंह, घोड़ा, गैंडा, द्विप, चमरी गाय, परात्परको नमस्कार करके अपने आश्रमको राजहंस, चक्रवाक, शुक, कोयल, मोर, खंजन, लौट आये। उस समय उनका दाहिना अङ्ग सफेद चील, चकोर, कबूतर, बगुलोंकी पंक्ति, फड़कने लगा, जो शुभ मङ्गलोंका सूचक था। बत्तख, चातक, गौरैया, बिजली, इन्द्रधनुष, सूर्य, रातमें उन्हें वाञ्छासिद्धिको प्रकट करनेवाला सूर्यकी प्रभा, तुरंतका काटा हुआ मांस, जीवित उत्तम स्वप्न भी दीख पड़ा। इससे उनका मन मछली, शङ्ख, सुवर्ण, माणिक्य, चाँदी, मोती, रात-दिन प्रसन्न और संतुष्ट रहने लगा। वे हीरा, मूँगा, दही, लावा, सफेद धान, सफेद स्वजनोंसे सारा वृत्तान्त पूर्णतया बतलाकर फूल, कुंकुम, पानका पत्ता, पताका, छत्र, दर्पण, आनन्दपूर्वक आश्रममें निवास करने लगे। श्वेत चँवर, सवत्सा गौ, रथारूढ़ भूपाल, दूध, तदनन्तर महाबली परशुरामने अपने शिष्योंको, घी, राशि-राशि अमृत, खीर, शालग्राम, पका पिताके शिष्योंको, भाइयोंको तथा बन्धु-बान्धवोंको हुआ फल, स्वस्तिक, शक्कर, मधु, बिलाव, बुला-बुलाकर उनके साथ तरह-तरहकी साँड़, भेड़ा, पर्वतीय चूहा, मेघाच्छन्न सूर्यका सलाह की और उनसे अपना पूर्वापरका वृत्तान्त उदय, चन्द्रमण्डल, कस्तूरी, पंखा, जल, हल्दी, कहकर शुभ मुहूर्तमें वे उन्हींके साथ विजययात्राके तीर्थकी मिट्टी, पीली या सफेद सरसों, दूब, लिये उद्यत हुए। ब्राह्मणका बालक और कन्या, मृग, वेश्या, भौंरा, उस समय परशुरामको मङ्गल शकुन दिखायी कपूर, पीला वस्त्र, गोमूत्र, गोबर, गौके खुरकी पड़ने लगे और जयकी सूचना देनेवाले शब्द धूलि, गोपदसे चिह्नित गोष्ठ, गौओंका मार्ग सुनायी दिये। तब उन्होंने मन-ही-मन सबका (डहर), रमणीय गोशाला, सुन्दर गोगति, भूषण, विचार करके निश्चय कर लिया कि मेरी विजय देवप्रतिमा, प्रज्वलित अग्नि, महोत्सव, ताँबा, होगी और शत्रुओंका संहार होगा। यात्राके स्फटिक, वैद्य, सिंदूर, माला, चन्दन, सुगन्ध, हीरा अवसरपर सहसा मुनिको अपने सामने मयूरकी और रत्न देखा। उन्हें सुगन्धित वायुका आघ्राण बोली, सिंहकी गर्जना, घण्टा और दुन्दुभीकी और ब्राह्मणोंका शुभाशीर्वाद प्राप्त हुआ। इस ध्वनि, संगीत, कल्याणकारी नवीन सांकेतिक प्रकार माङ्गलिक अवसर जानकर वे हर्षपूर्वक आगे