भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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गणपतिखण्ड ३८५

अपनेको शस्त्रसे घायल और जंजीरसे बँधा हुआ देखकर उनकी नींद टूट गयी और वे प्रातःकाल श्रीहरिका स्मरण करते हुए उठ बैठे। इस स्वप्नसे उन्हें अत्यन्त हर्ष हुआ। तत्पश्चात् उन्होंने अपना प्रातःकालिक नित्य कर्म सम्पन्न किया और मनमें ऐसा समझ लिया कि निश्चय ही सारे शत्रुओंको जीत लूँगा।

(अध्याय ३३)


परशुरामका कार्तवीर्यके पास दूत भेजना, दूतकी बात सुनकर राजाका युद्धके लिये उद्यत होना और रानी मनोरमासे स्वप्नदृष्ट अपशकुनका वर्णन करना, रानीका उन्हें परशुरामकी शरण ग्रहण करनेको कहना, परंतु राजाका मनोरमाको समझाकर युद्धयात्राके लिये उद्यत होना

श्रीनारायण कहते हैं—नारद! तदनन्तर भृगुवंशी परशुरामने प्रातःकालिक नित्यकर्म समाप्त करके भाई-बन्धुओंके साथ परामर्श किया और कार्तवीर्यके आश्रमपर दूत भेजा। उस दूतने शीघ्र ही जाकर राजाधिराज कार्तवीर्यसे कहा। उस समय राजा मन्त्रियोंसे घिरे हुए राजसभामें बैठे थे।

परशुरामका दूत बोला—महाराज! नर्मदा-तटके निकट अक्षयवटके नीचे भृगुवंशी परशुराम भाइयोंसहित पधारे हुए हैं। वे इक्कीस बार पृथ्वीको राजाओंसे शून्य करेंगे। अतः आप वहाँ चलिये अथवा भाई-बन्धुओंके साथ युद्ध कीजिये। इतना कहकर परशुरामका दूत उनके पास लौट गया। इधर राजा कवच धारण करके रण-यात्राके लिये उद्यत हुआ। तब महारानी मनोरमाने अपने प्राणपतिको युद्धमें जानेके लिये उद्यत देख उसे रोक दिया और अपने पास ही बैठा लिया। मुने! मनोरमाको देखकर राजाके नेत्र और मुख प्रसन्नतासे खिल उठे। फिर तो उसने सभाके बीच रानीसे अपने मनकी बात कही।

कार्तवीर्यार्जुन कहने लगा—प्रिये! जमदग्निके महान् पराक्रमी पुत्र परशुराम भाइयोंके साथ नर्मदा-तटपर ठहरे हुए हैं। वे मुझे युद्धके लिये ललकार रहे हैं। उन्हें शंकरजीसे शस्त्र और श्रीहरिका मन्त्र तथा कवच प्राप्त हो गया है; अतः वे इक्कीस बार भूमिको भूपालोंसे हीन कर देना चाहते हैं। इस समाचारसे मेरे प्राण काँप उठे हैं, मन बारंबार क्षुब्ध हो रहा है और मेरा बायाँ अङ्ग निरन्तर फड़क रहा है। प्रिये! मैंने एक स्वप्न भी देखा है, सुनो।

मैंने देखा है—मैं तेलसे सराबोर हूँ, लाल वस्त्र धारण किये हुए हूँ, शरीरपर लाल चन्दन लगा है, लोहेके आभूषणोंसे भूषित हूँ, अड़हुलके फूलोंकी माला पहने हूँ और गधेपर चढ़कर हँस रहा हूँ तथा बुझे हुए अंगारोंकी राशिसे क्रीड़ा कर रहा हूँ। पतिव्रते! पृथ्वीपर अड़हुलके पुष्प बिखरे हुए हैं और वह राखसे आच्छादित हो गयी है। आकाश चन्द्रमा और सूर्यसे रहित होकर संध्याकालीन लालिमासे व्याप्त हो गया है। मैंने एक विधवा स्त्रीको देखा, जो लाल वस्त्र पहने थी, केश खुले थे, नाक कट गयी थी और वह अट्टहास करती हुई नाच रही थी। महारानी! मैंने एक चिता देखी, जिसपर बाण बिछे थे और वह अग्निसे रहित एवं भस्मसे संयुक्त थी। फिर राखकी वर्षा, रक्तकी वर्षा और अंगारोंकी वर्षा होते हुए देखा। पृथ्वी पके हुए ताड़के फलोंसे आच्छादित और हड्डियोंसे संयुक्त थी। फिर खोपड़ियोंकी ढेरी दीख पड़ी, जो कटे हुए बालों और नखोंसे युक्त थी। फिर रातके समय नमकका पहाड़, कौड़ियोंकी ढेरी और धूल तथा तेलकी कन्दरा दृष्टिगोचर हुई। फिर फूलोंसे लदे हुए