भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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४१६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण


नारदजीने पूछा— प्रभो! परशुरामने जब विविध नैवेद्यों तथा पुष्पोंद्वारा भगवान् गणेशकी पूजा की थी, उस समय उन्होंने तुलसीको छोड़ क्यों दिया? मनोहारिणी तुलसी तो समस्त पुष्पोंमें मान्य एवं धन्यवादकी पात्र हैं; फिर गणेश उस सारभूत पूजाको क्यों नहीं ग्रहण करते?

श्रीनारायण बोले— नारद! ब्रह्मकल्पमें एक ऐसी घटना घटित हुई थी, जो परम गुह्य एवं मनोहारिणी है। उस प्राचीन इतिहासको मैं कहता हूँ, सुनो। एक समयकी बात है। नवयौवन-सम्पन्ना तुलसीदेवी नारायणपरायण हो तपस्याके निमित्तसे तीर्थोंमें भ्रमण करती हुई गङ्गा-तटपर जा पहुँचीं। वहाँ उन्होंने गणेशको देखा, जिनकी नयी जवानी थी; जो अत्यन्त सुन्दर, शुद्ध और पीताम्बर धारण किये हुए थे; जिनके सारे शरीरमें चन्दनकी खौर लगी थी; जो रत्नोंके आभूषणोंसे विभूषित थे; सुन्दरता जिनके मनका अपहरण नहीं कर सकती; जो कामनारहित, जितेन्द्रियोंमें सर्वश्रेष्ठ और योगीन्द्रोंके गुरु-के-गुरु हैं तथा मन्द-मन्द मुस्कराते हुए जन्म, मृत्यु और बुढ़ापाका नाश करनेवाले श्रीकृष्णके चरणकमलोंका ध्यान कर रहे थे; उन्हें देखते ही तुलसीका मन गणेशकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी उनसे लम्बोदर तथा गजमुख होनेका कारण पूछकर उनका उपहास करने लगी। ध्यान-भङ्ग होनेपर गणेशजीने पूछा—'वत्से! तुम कौन हो? किसकी कन्या हो? यहाँ तुम्हारे आनेका क्या कारण है? माता! यह मुझे बतलाओ; क्योंकि शुभे! तपस्वियोंका ध्यान भङ्ग करना सदा पापजनक तथा अमङ्गलकारी होता है। शुभे! श्रीकृष्ण कल्याण करें, कृपानिधि विघ्नका विनाश करें और मेरे ध्यान-भङ्गसे उत्पन्न हुआ दोष तुम्हारे लिये अमङ्गलकारक न हो।'

इसपर तुलसीने कहा— प्रभो! मैं धर्मात्मजकी नवयुवती कन्या हूँ और तपस्यामें संलग्न हूँ। मेरी यह तपस्या पति-प्राप्तिके लिये है; अतः आप मेरे स्वामी हो जाइये। तुलसीकी बात सुनकर अगाध बुद्धिसम्पन्न गणेश श्रीहरिका स्मरण करते हुए विदुषी तुलसीसे मधुरवाणीमें बोले।

गणेशने कहा— हे माता! विवाह करना बड़ा भयंकर होता है; अतः इस विषयमें मेरी बिलकुल इच्छा नहीं है; क्योंकि विवाह दुःखका कारण होता है, उससे सुख कभी नहीं मिलता। यह हरि-भक्तिका व्यवधान, तपस्याके नाशका कारण, मोक्षद्वारका किवाड़, भव-बन्धनकी रस्सी, गर्भवासकारक, सदा तत्त्वज्ञानका छेदक और संशयोंका उद्गमस्थान है। इसलिये महाभागे! मेरी ओरसे मन लौटा लो और किसी अन्य पतिकी तलाश करो। गणेशके ऐसे वचन सुनकर तुलसीको क्रोध आ गया। तब वह साध्वी गणेशको शाप देते हुए बोली—'तुम्हारा विवाह होगा।' यह सुनकर शिव-तनय सुरश्रेष्ठ गणेशने भी तुलसीको शाप दिया—'देवि! तुम निस्संदेह असुरद्वारा ग्रस्त होओगी। तत्पश्चात् महापुरुषोंके शापसे तुम वृक्ष हो जाओगी।' नारद! महातपस्वी गणेश इतना कहकर चुप हो गये। उस शापको सुनकर तुलसीने फिर उस सुरश्रेष्ठ गणेशकी स्तुति की। तब प्रसन्न होकर गणेशने तुलसीसे कहा।

गणेश बोले— मनोरमे! तुम पुष्पोंकी सारभूता होओगी और कलांशसे स्वयं नारायणकी प्रिया बनोगी। महाभागे! यों तो सभी देवता तुमसे प्रेम करेंगे, परंतु श्रीकृष्णके लिये तुम विशेष प्रिय होओगी। तुम्हारे द्वारा की गयी पूजा मनुष्योंके लिये मुक्तिदायिनी होगी और मेरे लिये तुम सर्वदा त्याज्य रहोगी। तुलसीसे यों कहकर सुरश्रेष्ठ गणेश पुनः तप करने चले गये। वे श्रीहरिकी आराधनामें व्यग्र होकर बदरीनाथके संनिकट गये। इधर तुलसीदेवी दुःखित हृदयसे पुष्करमें जा पहुँची