ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२० संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
कथा सुनकर जिसके नेत्रोंमें आँसू छलक आते हों और शरीरमें रोमाञ्च छा जाता हो तथा मन उसीमें डूब जाता हो; उसीको विद्वान् पुरुषोंने सच्चा भक्त कहा है। जो मन, वाणी और शरीरसे स्त्री-पुत्र आदि सबको श्रीहरिका ही स्वरूप समझता है, उसे विद्वानोंने भक्त कहा है। जिसकी सब जीवोंपर दया है तथा जो सम्पूर्ण जगत्को श्रीकृष्ण जानता है, वह महाज्ञानी पुरुष ही वैष्णव भक्त माना गया है। जो निर्जन स्थानमें अथवा तीर्थोंके सम्पर्कमें रहकर आसक्तिशून्य हो बड़े आनन्दके साथ श्रीहरिके चरणारविन्दका चिन्तन करते हैं, वे वैष्णव माने गये हैं। जो सदा भगवान्के नाम और गुणका गान करते, मन्त्र जपते तथा कथा-वार्ता कहते-सुनते हैं, वे अत्यन्त वैष्णव हैं। मीठी वस्तुएँ पाकर श्रीहरिको प्रसन्नतापूर्वक भोग लगानेके लिये जिसका मन हर्षसे खिल उठता है, वह ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ भक्त है। जिसका मन सोते, जागते, दिन-रात श्रीहरिके चरणारविन्दमें ही लगा रहता है और जो बाह्य शरीरसे पूर्व कर्मोंका फल भोगता है, वह वैष्णव है। तीर्थ सदा वैष्णवोंके दर्शन और स्पर्शकी अभिलाषा करते हैं; क्योंकि उनके सङ्गसे उन तीर्थोंके वे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, जो उन्हें पापियोंके संसर्गसे मिले होते हैं। जितनी देरमें गाय दुही जाती है, उतनी देर भी जहाँ वैष्णव पुरुष ठहर जाता है, वहाँकी धरतीपर उतने समयके लिये सम्पूर्ण तीर्थ निवास करते हैं। वहाँ मरा हुआ पापी मनुष्य निश्चय ही पापमुक्त हो श्रीहरिके धाममें वैसे ही चला जाता है, जैसे अन्तकालमें श्रीकृष्णकी स्मृति होनेपर अथवा ज्ञानगङ्गामें अवगाहन करनेपर मनुष्य परम पदको प्राप्त हो जाता है। तथा जैसे तुलसीवनमें, गोशालामें, श्रीकृष्ण-मन्दिरमें, वृन्दावनमें, हरिद्वारमें एवं अन्य तीर्थोंमें भी मृत्यु होनेपर मनुष्यको परम धामकी प्राप्ति होती है। तीर्थोंमें स्नान करने या गोता लगानेसे पापियोंके पाप धुल जाते हैं। फिर उन तीर्थोंके पाप वैष्णवोंको छूकर बहनेवाली वायुके स्पर्शसे नष्ट होते हैं। जो भगवान् हृषीकेशकी और उनके पुण्यात्मा भक्तकी निन्दा करते हैं, उनके सौ जन्मोंका पुण्य निश्चय ही नष्ट हो जाता है। वैष्णवोंके स्पर्शमात्रसे पातकी मनुष्य पातकसे मुक्त हो जाता है। पातकीके स्पर्शसे उस भक्तमें जो पाप आता है, उसका नाश उसके अन्तः-करणमें बैठे हुए भगवान् मधुसूदन अवश्य कर देते हैं। ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने भगवान् विष्णु और वैष्णव भक्तके गुणोंका वर्णन किया है। अब मैं तुम्हें श्रीहरिके जन्मका प्रसङ्ग सुनाता हूँ, सुनो।
श्रीनारायणने कहा— एक बार गोलोकमें श्रीकृष्ण विरजादेवीके समीप थे। श्रीराधाको यह ठीक नहीं लगा। श्रीराधा सखियोंसहित वहाँ जाने लगीं। तब श्रीदामने उन्हें रोका। इसपर श्रीराधाने श्रीदामको शाप दे दिया कि ‘तुम असुरयोनिको प्राप्त हो जाओ।’ तब श्रीदामने भी श्रीराधाको यह शाप दिया कि ‘आप भी मानवी-योनिमें जायँ। वहाँ गोकुलमें श्रीहरिके ही अंश महायोगी रायाण नामक एक वैश्य होंगे। आपका छायारूप उनके साथ रहेगा। अतएव भूतलपर मूढ़ लोग आपको रायाणकी पत्नी समझेंगे, श्रीहरिके साथ कुछ समय आपका विछोह रहेगा।’
इससे श्रीदाम और श्रीराधा दोनोंको ही क्षोभ हुआ। तब श्रीकृष्णने श्रीदामको सान्त्वना देकर कहा कि ‘तुम त्रिभुवनविजेता सर्वश्रेष्ठ शङ्खचूड़ नामक असुर होओगे और अन्तमें श्रीशंकरके त्रिशूलसे भिन्न-देह होकर यहाँ मेरे पास लौट आओगे।’
श्रीराधाको बड़े ही प्रेमके साथ हृदयसे लगाकर भगवान्ने कहा—‘वाराहकल्पमें मैं पृथ्वीपर जाऊँगा और व्रजमें जाकर वहाँके पवित्र काननोंमें तुम्हारे साथ विहार करूँगा। मेरे रहते तुमको क्या भय है?’
उधर विरजादेवी नदी हो गयीं और उनके