ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 431, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें·· श्रीकृष्णजन्मखण्ड ४२१ श्रीकृष्णके द्वारा जो सात सुन्दर पुत्र हुए थे— वे लवण, इक्षु, सुरा, घृत, दधि, दुग्ध और जलरूप सात समुद्र हो गये (यह सब श्रीराधा और श्रीकृष्णकी लीला ही है, जो व्रजमें परम दिव्य पवित्रतम विलक्षण प्रेमरसधारा बहानेके लिये निमित्तरूपसे की गयी थी)। इसी निमित्तसे लीलामय श्रीराधा और श्रीकृष्ण वाराहकल्पमें पृथ्वीपर अवतीर्ण हुए। श्रीराधाजी गोकुलमें श्रीवृषभानुके घर प्रकट हुईं। यह कथा प्रसङ्गानुसार पहले भी आ चुकी है। (भगवान्, श्रीराधा- कृष्णके अवतार तथा व्रजकी मधुरतम लीलाका यह एक निमित्त कारणमात्र है।) (अध्याय १-३) पृथ्वीका देवताओंके साथ ब्रह्मलोकमें जाकर अपनी व्यथा-कथा सुनाना, ब्रह्माजीका उन सबके साथ कैलासगमन, कैलाससे ब्रह्मा, शिव तथा धर्मका वैकुण्ठमें जाकर श्रीहरिकी आज्ञासे गोलोकमें जाना और वहाँ विरजातट, शतशृङ्गपर्वत, रासमण्डल एवं वृन्दावन आदिके प्रदेशोंका अवलोकन करना, गोलोकका विस्तृत वर्णन नारदजीने पूछा-वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ नारायण ! किसकी प्रार्थनासे और किस कारण जगदीश्वर श्रीकृष्णने इस भूतलपर अवतार लिया था ? श्रीनारायणने कहा- प्राचीन कालकी बात है। वाराह-कल्पमें पृथ्वी असुरोंके अधिक भारसे आक्रान्त हो गयी थी; अतः शोकसे अत्यन्त पीड़ित हो वह ब्रह्माजीकी शरणमें गयी। उसके साथ असुरोंद्वारा सताये गये देवता भी थे, जिनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो रहा था। पृथ्वी उन देवताओंके साथ ब्रह्माजीकी दुर्गम सभामें गयी। वहाँ उसने देखा, देवेश्वर ब्रह्मा ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान हो रहे हैं तथा बड़े-बड़े ऋषि, मुनीन्द्र तथा सिद्धेन्द्रगण सानन्द उनकी सेवामें उपस्थित हैं। ब्रह्माजी 'कृष्ण' इस दो अक्षरके परब्रह्मस्वरूप मन्त्रका जप कर रहे थे। उनके नेत्र भक्तिजनित आनन्दके आँसुओंसे भरे थे तथा सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था। मुने ! देवताओंसहित पृथ्वीने भक्तिभावसे चतुराननको प्रणाम किया और दैत्योंके भार आदिका सारा वृत्तान्त कह सुनाया। आँसूभरे नेत्रों और पुलकित शरीरसे वह ब्रह्माजीकी स्तुति तथा रोदन करने लगी। तब जगद्धाता ब्रह्माने उससे पूछा- भद्रे ! तुम क्यों स्तुति करती और रोती हो ? बताओ, किस उद्देश्यसे तुम्हारा आगमन हुआ है ? विश्वास करो, तुम्हारा भला होगा। कल्याणि ! सुस्थिर हो जाओ, मेरे रहते तुम्हें क्या भय है? इस प्रकार पृथ्वीको आश्वासन देकर ब्रह्माजीने देवताओंसे आदरपूर्वक पूछा- 'देवगण ! किसलिये तुम्हारा मेरे समीप आगमन हुआ है?' ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर देवतालोग उन प्रजापतिसे बोले- प्रभो ! पृथ्वी दैत्योंके भारसे दबी हुई है तथा हम भी उनके कारण संकटमें पड़ गये हैं। दैत्योंने हमें ग्रस लिया। आप ही जगत्के स्रष्टा हैं, शीघ्र ही हमारा उद्धार कीजिये। ब्रह्मन् ! आप ही इस पृथ्वीकी गति हैं; इसे शान्ति प्रदान करें। पितामह ! यह पृथ्वी जिस भारसे पीड़ित है, उसीसे हम भी दुःखी हैं, अतः आप उस भारका हरण कीजिये।' देवताओंकी बात सुनकर जगत्स्रष्टा ब्रह्माने पृथ्वीसे पूछा- 'बेटी ! तुम भय छोड़कर मेरे पास सुखपूर्वक रहो। पद्मालोचने ! बताओ, किनका ऐसा भार आ गया है, जिसे सहन करनेमें तुम असमर्थ हो गयी हो। भद्रे ! मैं उस भारको दूर करूँगा। निश्चय ही तुम्हारा भला होगा। ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर पृथ्वीके मुखपर और नेत्रोंमें प्रसन्नता छा गयी। वह जिस-जिस