ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ४३३
वेश-भूषावाले गोपसमूहोंसे घिरे हुए उस अन्तःपुरको झुंड-की-झुंड गोपाङ्गनाएँ, जो श्रीराधाकी सखियाँ थीं, सुशोभित कर रही थीं। श्रीराधा और श्रीकृष्णके गुणगानसम्बन्धी पदोंका संगीत वहाँ सब ओर सुनायी पड़ता था। ऐसे अन्तःपुरको देखकर वे देवता विस्मयसे विमुग्ध हो उठे। उन्होंने वहाँ मधुर गीत सुना और उत्तम नृत्य देखा। वे सब देवता वहाँ स्थिरभावसे खड़े हो गये। उन सबका चित्त ध्यानमें एकतान हो रहा था। उन देवेश्वरोंको वहाँ रमणीय रत्नसिंहासन दिखायी दिया, जो सौ धनुषके बराबर विस्तृत था। वह सब ओरसे मण्डलाकार दिखायी देता था। श्रेष्ठ रत्नोंके बने हुए छोटे-छोटे कलश-समूह उसमें जुड़े हुए थे। विचित्र पुतलियों, फूलों तथा चित्रमय काननोंसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। ब्रह्मन्! वहाँ उनको एक अत्यन्त अद्भुत और आश्चर्यमय तेजःपुञ्ज दिखायी दिया, जो करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान था। वह दिव्य ज्योतिसे जाज्वल्यमान हो रहा था। ऊपर चारों ओर सात ताड़की दूरीमें उसका प्रकाश फैला हुआ था। सबके तेजको छीन लेनेवाला वह प्रकाशपुञ्ज सम्पूर्ण आश्रमको व्याप्त करके देदीप्यमान था। वह सर्वत्र व्यापक, सबका बीज तथा सबके नेत्रोंको अवरुद्ध कर देनेवाला था। उस तेजःस्वरूपको देखकर वे देवता ध्यानमग्न हो गये तथा भक्तिभावसे मस्तक एवं कंधे झुकाकर बड़ी श्रद्धाके साथ उसको प्रणाम करने लगे। उस समय परमानन्दकी प्राप्तिसे उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये थे और सारे अङ्ग पुलकित हो गये थे। वे ऐसे जान पड़ते थे मानो उनके अभीष्ट मनोरथ पूर्ण हो गये हों। उन तेजःस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार करके वे तीनों देवेश्वर उठकर खड़े हो गये और उन्हींका ध्यान करते हुए उस तेजके सामने गये। ध्यान करते-करते जगत्स्रष्टा ब्रह्माके दोनों हाथ जुड़ गये। नारद! उन्होंने शिवको दाहिने और धर्मको बायें कर लिया तथा वे भक्तिके उद्रेकसे चित्तको ध्यानमग्न करके उन परात्पर, गुणातीत, परमात्मा जगदीश्वर श्रीकृष्णकी स्तुति करने लगे।
ब्रह्माजी बोले— जो वर, वरेण्य, वरद, वरदायकोंके कारण तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्तिके हेतु हैं; उन तेजःस्वरूप परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। जो मङ्गलकारी, मङ्गलके योग्य, मङ्गलस्वरूप, मङ्गलदायक तथा समस्त मङ्गलोंके आधार हैं; उन तेजोमय परमात्माको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सर्वत्र विद्यमान, निर्लिप्त, आत्मस्वरूप, परात्पर, निरीह और अवितर्क्य हैं; उन तेजःस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार है। जो सगुण, निर्गुण, सनातन, ब्रह्म, ज्योतिःस्वरूप, साकार एवं निराकार हैं; उन तेजोरूप परमात्माको मैं नमस्कार करता हूँ। प्रभो! आप अनिर्वचनीय, व्यक्त, अव्यक्त, अद्वितीय, स्वेच्छामय तथा सर्वरूप हैं। आप तेजःस्वरूप परमेश्वरको मैं नमस्कार करता हूँ। तीनों गुणोंका विभाग करनेके लिये आप तीन रूप धारण करते हैं; परंतु हैं तीनों गुणोंसे अतीत। समस्त देवता आपकी कलासे प्रकट हुए हैं। आप श्रुतियोंकी पहुँचसे भी परे हैं; फिर आपको देवता कैसे जान सकते हैं? आप सबके आधार, सर्वस्वरूप, सबके आदिकारण, स्वयं कारणरहित, सबका संहार करनेवाले तथा अन्तरहित हैं। आप तेजःस्वरूप परमात्माको नमस्कार है। जो सगुण रूप है, वही लक्ष्य होता है और विद्वान् पुरुष उसीका वर्णन कर सकते हैं। परंतु आपका रूप अलक्ष्य है; अतः मैं उसका वर्णन कैसे कर सकता हूँ? आप तेजोरूप परमात्माको मेरा प्रणाम है। आप निराकार होकर भी दिव्य आकार धारण करते हैं। इन्द्रियातीत होकर भी इन्द्रिययुक्त होते हैं। आप सबके साक्षी हैं; परंतु आपका साक्षी कोई नहीं है। आप तेजोमय परमेश्वरको मेरा नमस्कार