भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 474

४६४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

ले गये। उस अद्भुत दृश्यको देखकर गोप और गोपिकाएँ चकित हो गयीं। कंस भी वह सारा समाचार सुनकर बड़ा विस्मित हुआ। मुने! यशोदा मैया बालकको गोदमें उठाकर उसे स्तन पिलाने लगीं। उन्होंने ब्राह्मणोंके द्वारा बालकके कल्याणके लिये मङ्गल-पाठ करवाया। नन्दरायने बड़े आनन्दसे पूतनाके देहका दाह-संस्कार किया। उस समय उसकी चितासे चन्दन, अगुरु और कस्तूरीके समान सुगन्ध निकल रही थी।

नारदजीने पूछा—भगवन्! राक्षसी पूतनाके रूपमें वह कौन ऐसी पुण्यवती सती थी, जिसने श्रीहरिको अपना स्तन पिलाया? किस पुण्यसे भगवान्‌के दर्शन करके वह उनके परम धाममें गयी?

नारायण बोले—देवर्षे! बलिके यज्ञमें वामनका मनोहर रूप देखकर बलिकी कन्या रत्नमालाने उनके प्रति पुत्र-स्नेह प्रकट किया था। उसने मन-ही-मन यह संकल्प किया कि यदि इस पुत्रके समान मेरे पुत्र होता तो मैं उसके मुखमें अपना स्तन देकर उसे वक्षःस्थलपर बिठाती। भगवान्‌से उसका यह मनोरथ छिपा न रहा। उन्होंने इस प्रकार जन्मान्तरमें उसका स्तन-पान किया। भक्तोंकी वाञ्छा पूर्ण करनेवाले उन कृपानिधानने पूतनाको माताकी गति प्रदान की। मुने! राक्षसी पूतनाने श्रीकृष्णको विष लिपटा हुआ स्तन देकर उस द्वेष-भक्तिके द्वारा भी माताके समान गति प्राप्त कर ली। ऐसे परम दयालु भगवान् श्रीकृष्णको छोड़कर मैं और किसका भजन करूँ?* विप्रवर! इस प्रकार मैंने तुमसे श्रीकृष्णके गुणोंका वर्णन किया, जो पद-पदपर अत्यन्त मधुर हैं। इसके अतिरिक्त भी जो श्रीकृष्णकी मधुर लीलाएँ हैं, उनका तुम्हारे समक्ष वर्णन आरम्भ करता हूँ।

(अध्याय १०)


तृणावर्तका उद्धार तथा उसके पूर्वजन्मका परिचय

भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! एक दिन गोकुलमें सती साध्वी नन्दरानी यशोदा बालकको गोदमें लिये घरके कामकाजमें लगी हुई थीं। उस समय गोकुलमें बवंडरका रूप धारण करनेवाला तृणावर्त आ रहा था। मन-ही-मन उसके आगमनकी बात जानकर श्रीहरिने अपने शरीरका भार बढ़ा लिया। उस भारसे पीड़ित होकर मैया यशोदाने लालाको गोदसे उतार दिया और खाटपर सुलाकर वे यमुनाजीके किनारे चली गयीं। इसी बीचमें वह बवंडररूपधारी असुर वहाँ आ पहुँचा और उस बालकको लेकर घुमाता हुआ सौ योजन ऊपर जा पहुँचा। उसने वृक्षोंकी डालियाँ तोड़ दीं तथा इतनी धूल उड़ायी कि गोकुलमें अँधेरा छा गया। उस मायावी असुरने तत्काल यह सब उत्पात किया। फिर वह स्वयं भी श्रीहरिके भारसे आक्रान्त हो वहीं पृथ्वीपर गिर पड़ा। श्रीहरिका स्पर्श प्राप्त करके वह असुर भी भगवद्धामको चला गया। अपने कर्मोंका नाश करके सुन्दर दिव्य रथपर आरूढ़ हो गोलोकमें जा पहुँचा। वह पाण्ड्यदेशका राजा था और दुर्वासाके शापसे असुर हो गया था। श्रीकृष्णके चरणोंका स्पर्श पाकर उसने गोलोकधाममें स्थान प्राप्त कर लिया।

मुने! बवंडरका रूप समाप्त होनेपर भयसे विह्वल गोप-गोपियोंने जब खोज की, तब बालकको शय्यापर न देखकर सब लोग शोकसे व्याकुल हो


* दत्त्वा विपस्तनं कृष्णं पूतना राक्षसी मुने। भक्त्या मातृगतिं प्राप कं भजामि विना हरिम्॥
(श्रीकृष्णजन्मखण्ड १०।४४)