ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 544, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५३४ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
अनुसार जिनके श्वेत, रक्त, पीत और श्याम वर्ण हैं; सत्ययुगमें जिनका स्वरूप शुक्ल तेजोमय है तथा उस युगमें जो सत्यस्वरूप हैं; त्रेतायुगमें जिनकी अङ्गकान्ति कुंकुमके समान लाल है और जो ब्रह्मतेजसे जाज्वल्यमान रहते हैं, द्वापरयुगमें जो पीत कान्ति धारण करके पीताम्बरसे सुशोभित होते हैं; कलियुगमें कृष्णवर्ण होकर 'कृष्ण' नाम धारण करते हैं; इन सब रूपोंमें जो एक ही परिपूर्णतम परमात्मा हैं; जिनका श्रीविग्रह नूतन जलधरके समान अत्यन्त श्याम एवं सुन्दर है; उन नन्दनन्दन यशोदाकुमार भगवान् गोविन्दकी मैं वन्दना करता हूँ। जो गोपियोंका चित्त चुराते हैं तथा राधाके लिये प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं, जो कौतूहलवश विनोदके लिये मुरलीकी ध्वनिका विस्तार करते रहते हैं, जिनके रूपकी कहीं तुलना नहीं है, जो रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हो कोटि-कोटि कन्दर्पोंका सौन्दर्य धारण करते हैं; उन शान्त-स्वरूप परमेश्वरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो वृन्दावनमें कहीं राधाके पास क्रीड़ा करते हैं, कहीं निर्जन स्थलमें राधाके वक्षः-स्थलपर विराजमान होते हैं, कहीं राधाके साथ जलक्रीड़ा करते हैं, कहीं वनमें राधिकाके केश-कलापोंकी चोटी गूँथते हैं, कहीं राधिकाके चरणोंमें महावर लगाते हैं, कहीं राधिकाके चबाये हुए ताम्बूलको सानन्द ग्रहण करते हैं, कहीं बाँके नेत्रोंसे देखती हुई राधाको स्वयं निहारते हैं, कहीं फूलोंकी माला तैयार करके राधिकाको अर्पित करते हैं, कहीं राधाके साथ रासमण्डलमें जाते हैं, कहीं राधाकी दी हुई मालाको अपने कण्ठमें धारण करते हैं, कहीं गोपाङ्गनाओंके साथ विहार करते हैं, कहीं राधाको साथ लेकर चल देते हैं और कहीं उन्हें भी छोड़कर चले जाते हैं। जिन्होंने कहीं ब्राह्मणपत्नियोंके दिये हुए अन्नका भोजन किया है और कहीं बालकोंके साथ ताड़का फल खाया है; जो कहीं आनन्दपूर्वक गोप-किशोरियोंके चित्त चुराते हैं, कहीं ग्वालबालोंके साथ दूर गयी हुई गौओंको आवाज देकर बुलाते हैं, जिन्होंने कहीं कालियानागके मस्तकपर अपने चरणकमलोंको रखा है और जो कहीं मौजमें आकर आनन्द-विनोदके लिये मुरलीकी तान छेड़ते हैं तथा कहीं ग्वालबालोंके साथ मधुर गीत गाते हैं; उन परमात्मा श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ।
इस स्तवराजसे स्तुति करके इन्द्रने श्रीहरिको भयसे प्रणाम किया। पूर्वकालमें वृत्रासुरके साथ युद्धके समय गुरु बृहस्पतिने इन्द्रको यह स्तोत्र दिया था। सबसे पहले श्रीकृष्णने तपस्वी ब्रह्माको कृपापूर्वक एकादशाक्षर-मन्त्र, सब लक्षणोंसे युक्त कवच और यह स्तोत्र दिया था। फिर ब्रह्माने पुष्करमें कुमारको, कुमारने अङ्गिराको और अङ्गिराने बृहस्पतिको इसका उपदेश दिया था। इन्द्रद्वारा किये गये इस स्तोत्रका जो प्रतिदिन भक्तिपूर्वक पाठ करता है, वह इहलोकमें श्रीहरिकी सुदृढ़ भक्ति और अन्तमें निश्चय ही उनका दास्य-सुख प्राप्त कर लेता है। जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और