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ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished810 pages

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Page 575

श्रीकृष्णजन्मखण्ड ५६५

स्त्री नहीं है। तुम दीर्घकालतक यहाँ रहनेके पश्चात् श्रीकृष्णके साथ ही गोलोकमें चली जाओगी।

मुने! ऐसा कहकर पार्वतीदेवी तत्काल वहीं अन्तर्हित हो गयीं। फिर गोपकुमारियोंके साथ श्रीराधिका भी घर जानेको उद्यत हुईं। इतनेमें ही श्रीकृष्ण राधिकाके सामने उपस्थित हो गये। राधाने किशोर-अवस्थावाले श्यामसुन्दर श्रीकृष्णको देखा। उनके श्रीअङ्गोंपर पीताम्बर शोभा पा रहा था। वे नाना प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थे। घुटनोंतक लटकती हुई मालती-माला एवं वनमाला उनकी शोभा बढ़ा रही थी। उनका प्रसन्न मुख मन्द हास्यसे शोभायमान था। वे भक्तजनोंपर अनुग्रह करनेके लिये कातर जान पड़ते थे। उनके सम्पूर्ण अङ्ग चन्दनसे चर्चित थे। नेत्र शरद्-ऋतुके प्रफुल्ल कमलोंको लज्जित कर रहे थे। मुख शरद्-ऋतुकी पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति मनोहर था, मस्तकपर श्रेष्ठ रत्नमय मुकुट अपनी उज्ज्वल आभा बिखेर रहा था। दाँत पके हुए अनारके दाने-जैसे स्वच्छ दिखायी देते थे। आकृति बड़ी मनोहर थी। उन्होंने विनोदके लिये एक हाथमें मुरली और दूसरे हाथमें लीलाकमल ले रखा था। वे करोड़ों कन्दर्पोंकी लावण्य-लीलाके मनोहर धाम थे। उन गुणातीत परमेश्वरकी ब्रह्मा, शेषनाग और शिव आदि निरन्तर स्तुति करते हैं। वे ब्रह्मस्वरूप तथा ब्राह्मणहितैषी हैं। श्रुतियोंने उनके ब्रह्मरूपका निरूपण किया है। वे अव्यक्त और व्यक्त हैं। अविनाशी एवं सनातन ज्योतिः-स्वरूप हैं। मङ्गलकारी, मङ्गलके आधार, मङ्गलमय तथा मङ्गलदाता हैं।

श्यामसुन्दरके उस अद्भुत रूपको देखकर राधाने वेगपूर्वक आगे बढ़कर उन्हें प्रणाम किया। उन्हें अच्छी तरह देखकर प्रेमके वशीभूत हो वे सुध-बुध खो बैठीं। प्रियतमके मुखारविन्दकी बाँकी चितवनसे देखते-देखते उनके अधरोंपर मुस्कराहट दौड़ गयी और उन्होंने लज्जावश अञ्चलसे अपना मुख ढँक लिया। उनकी बारंबार ऐसी अवस्था हुई। श्रीराधाको देखकर श्यामसुन्दरके मुख और नेत्र प्रसन्नतासे खिल उठे। समस्त गोपिकाओंके सामने खड़े हुए वे भगवान् श्रीराधासे बोले।

**श्रीकृष्णने कहा—**प्राणाधिके राधिके! तुम मनोवाञ्छित वर माँगो। हे गोपकिशोरियो! तुम सब लोग भी अपनी इच्छाके अनुसार वर माँगो।

श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर श्रीराधिका तथा अन्य सब गोपकन्याओंने बड़े हर्षके साथ उन भक्तवाञ्छाकल्पतरु प्रभुसे वर माँगा।

**राधिका बोलीं—**प्रभो! मेरा चित्तरूपी चञ्चरीक आपके चरणकमलोंमें सदा रमता रहे। जैसे मधुप कमलमें स्थित हो उसके मकरन्दका पान करता है; उसी प्रकार मेरा मनरूपी भ्रमर भी आपके चरणारविन्दोंमें स्थित हो भक्तिरसका निरन्तर आस्वादन करता रहे। आप जन्म-जन्ममें मेरे प्राणनाथ हों और अपने चरणकमलोंकी परम दुर्लभ भक्ति मुझे दें। मेरा चित्त सोते-जागते, दिन-रात आपके स्वरूप तथा गुणोंके चिन्तनमें सतत निमग्न रहे। यही मेरी मनोवाञ्छा है।

**गोपियाँ बोलीं—**प्राणबन्धो! आप जन्म-जन्ममें हमारे प्राणनाथ हों और श्रीराधाकी ही भाँति हम सबको भी सदा अपने साथ रखें।

गोपियोंका यह वचन सुनकर प्रसन्नमुखवाले श्रीमान् यशोदानन्दनने कहा—'तथास्तु' (ऐसा ही हो)। तत्पश्चात् उन जगदीश्वरने श्रीराधिकाको प्रेमपूर्वक सहस्रदलोंसे युक्त क्रीडाकमल तथा मालतीकी मनोहर माला दी। साथ ही अन्य गोपियोंको भी उन गोपीवल्लभने हँसकर प्रसादस्वरूप पुष्प तथा मालाएँ भेंट कीं। तदनन्तर वे बड़े प्रेमसे बोले।

**श्रीकृष्णने कहा—**व्रजदेवियो! तीन मास व्यतीत होनेपर वृन्दावनके सुरम्य रासमण्डलमें तुम सब लोग मेरे साथ रासक्रीड़ा करोगी। जैसा

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