भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५६६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण मैं हूँ, वैसी ही तुम हो। हममें तुममें भेद नहीं है। मैं तुम्हारे प्राण हूँ और तुम भी मेरे लिये प्राणस्वरूपा हो। प्यारी गोपियो ! तुमलोगोंका यह व्रत लोकरक्षाके लिये है, स्वार्थसिद्धिके लिये नहीं; क्योंकि तुमलोग गोलोकसे मेरे साथ आयी हो और फिर मेरे साथ ही तुम्हें वहाँ चलना है। (तुम मेरी नित्यसिद्धा प्रेयसी हो। तुमने साधन करके मुझे पाया है, ऐसी बात नहीं है।) अब शीघ्र अपने घर जाओ। मैं जन्म-जन्ममें तुम्हारा ही हूँ। तुम मेरे लिये प्राणोंसे भी बढ़कर हो; इसमें संशय नहीं है। ऐसा कहकर श्रीहरि वहीं यमुनाजीके किनारे बैठ गये। फिर सारी गोपियाँ भी बारंबार उन्हें निहारती हुई बैठ गयीं। उन सबके मुखपर प्रसन्नता छा रही थी; मन्द मुस्कानकी प्रभा फैल रही थी। वे प्रेमपूर्वक बाँकी चितवनसे देखती हुई अपने नेत्र-चकोरोंद्वारा श्रीहरिके मुखचन्द्रकी सुधाका पान कर रही थीं। तत्पश्चात् वे बारंबार जय बोलकर शीघ्र ही अपने-अपने घर गयीं और श्रीकृष्ण भी ग्वाल-बालोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको लौटे। इस प्रकार मैंने श्रीहरिका यह सारा मङ्गलमय चरित्र कह सुनाया, गोपीचीर- हरणकी यह लीला सब लोगोंके लिये सुखदायिनी है। (अध्याय २७) श्रीकृष्णके रास-विलासका वर्णन नारदजीने पूछा- भगवन् ! तीन मास व्यतीत होनेपर उन गोपाङ्गनाओंका श्रीहरिके साथ किस प्रकार मिलन हुआ ? वृन्दावन कैसा है? रासमण्डलका क्या स्वरूप है? श्रीकृष्ण तो एक थे और गोपियाँ बहुत । ऐसी दशामें किस तरह वह क्रीड़ा सम्भव हुई? मेरे मनमें इस नयी-नयी लीलाको सुननेके लिये बड़ी उत्सुकता हो रही है। महाभाग ! आपके नाम और यशका श्रवण एवं कीर्तन बड़ा पवित्र है। कृपया आप उस रासक्रीड़ाका वर्णन कीजिये। अहो ! श्रीहरिकी रासयात्रा, पुराणोंके सारकी भी सारभूता कथा है। इस भूतलपर उनके द्वारा की गयी सारी लीलाएँ ही सुननेमें अत्यन्त मनोहर जान पड़ती हैं। सूतजी कहते हैं - शौनक ! नारदजीकी यह बात सुनकर साक्षात् नारायण ऋषि हँसे और प्रसन्न मुखसे उन्होंने कथा सुनाना आरम्भ किया। श्रीनारायण बोले- मुने ! एक दिन श्रीकृष्ण चैत्रमासके शुक्लपक्षकी त्रयोदशी तिथिको चन्द्रोदय होनेके पश्चात् वृन्दावनमें गये। उस समय जूही, मालती, कुन्द और माधवीके पुष्पोंका स्पर्श करके बहनेवाली शीतल, मन्द एवं सुगन्धित मलयवायुसे सारा वनप्रान्त सुवासित हो रहा था। भ्रमरोंके मधुर गुञ्जारवसे उसकी मनोहरता बढ़ गयी थी। वृक्षोंमें नये-नये पल्लव निकल आये थे और कोकिलकी कुहू-कुहू-ध्वनिसे वह वन मुखरित हो रहा था। नौ लाख रासगृहोंसे संयुक्त वह वृन्दावन बड़ा ही मनोहर जान पड़ता था। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और कुंकुमकी सुगन्ध सब ओर फैल रही थी। कर्पूरयुक्त ताम्बूल तथा भोग-द्रव्य सजाकर रखे गये थे। कस्तूरी और चन्दनयुक्त चम्पाके फूलोंसे रचित नाना प्रकारकी शय्याएँ उस स्थानकी शोभा बढ़ा रही थीं। रत्नमय प्रदीपोंका प्रकाश सब ओर फैला था। धूपकी सुगन्धसे वह वनप्रान्त महमह महक रहा था। वहीं सब ओरसे गोलाकार रासमण्डल बनाया गया था, जो नाना प्रकारके फूलों और मालाओंसे सुसज्जित था। चन्दन, अगुरु, कस्तूरी और केसरसे वहाँकी भूमिका संस्कार किया गया था। रासमण्डलके चारों ओर फूलोंसे भरे उद्यान तथा क्रीड़ासरोवर थे। उन सरोवरोंमें हंस, कारण्डव तथा जलकुकुट

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