ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीकृष्णजन्मखण्ड ५६७ आदि पक्षी कलरव कर रहे थे। वे जलक्रीड़ाके योग्य सुन्दर तथा सुरत-श्रमका निवारण करनेवाले थे। उनमें शुद्ध स्फटिकमणिके समान स्वच्छ तथा निर्मल जल भरा था। उस रासमण्डलमें दही, अक्षत और जल छिड़के गये थे। केलेके सुन्दर खम्भोंद्वारा वह चारों ओरसे सुशोभित था। सूतमें बँधे हुए आमके पल्लवोंके मनोहर बन्दनवारों तथा सिन्दूर, चन्दनयुक्त मङ्गल-कलशोंसे उसको सजाया गया था। मङ्गल-कलशोंके साथ मालतीकी मालाएँ और नारियलके फल भी थे। उस शोभासम्पन्न रासमण्डलको देखकर मधुसूदन हँसे। उन्होंने कौतूहलवश वहाँ विनोदकी साधनभूता मुरलीको यह एक अद्भुत बात थी। चारों ओर देखकर वंशीध्वनिका अनुसरण करती हुई आगे बढ़ीं। मन-ही-मन महात्मा श्रीकृष्णके चरणारविन्दोंका चिन्तन करती जाती थीं। वे अपने सहज तेज तथा श्रेष्ठ रत्नसारमय भूषणोंकी कान्तिसे वनप्रान्तको प्रकाशित कर रही थीं। राधिकाकी सुशीला आदि जो अत्यन्त प्यारी तैंतीस सखियाँ थीं और समस्त गोपियोंमें श्रेष्ठ समझी जाती थीं; वे भी श्रीकृष्णके दिये हुए वरसे आकृष्ट-चित्त हो डरी हुई-सी घरसे बाहर निकलीं। कुलधर्मका त्याग करके निःशङ्क हो वनकी ओर चलीं। वे सब- की-सब प्रेमातिरेकसे मोहित थीं। फिर उन प्रधान गोपियोंके पीछे-पीछे दूसरी गोपियाँ भी जो जैसे थीं, वैसे ही—लाखोंकी संख्यामें निकल पड़ीं। वे सब वनमें एक स्थानपर इकट्ठी हुईं और कुछ देरतक प्रसन्नतापूर्वक वहीं खड़ी रहीं। वहाँ कुछ गोपियाँ अपने हाथोंमें माला लिये आयी थीं। कुछ गोपाङ्गनाएँ ब्रजसे मनोहर चन्दन हाथमें लेकर वहाँ पहुँची थीं। कई गोपियोंके हाथोंमें श्वेत चँवर शोभा पा रहे थे। वे सब बड़े हर्षके बजाया। वह वंशीकी ध्वनि उनकी प्रेयसी गोपाङ्गनाओंके प्रेमको बढ़ानेवाली थी। राधिकाने जब वंशीकी मधुर ध्वनि सुनी तो तत्काल ही वे प्रेमाकुल हो अपनी सुध- बुध खो बैठीं। उनका शरीर ठूँठे काठकी तरह स्थिर और चित्त ध्यानमें एकतान हो गया। क्षणभरमें चेत होनेपर पुनः मुरलीकी ध्वनि उनके कानोंमें पड़ी। वे बैठी थीं, फिर उठकर खड़ी हो गयीं। अब उन्हें बार-बार उद्वेग होने लगा, वे आवश्यक कर्म छोड़कर घरसे निकल पड़ीं। साथ वहाँ आयी थीं। कुछ गोपकन्याएँ कुंकुम, ताम्बूल-पात्र तथा काञ्चन, वस्त्र लिये आयी थीं।